प्राचीनकाल में घरेलू जड़ी-बूटियों एवं रसोई में स्थित मसालों के माध्यम से ही पारिवारिक स्वास्थ्य को दादी-नानियाँ संतुलित रखा करती थी। ये घरेलू जड़ी-बूटियां हमारे स्वास्थ्य के लिये अमृत के समान असरदार हुआ करती थी। इन दिनों बाजारू औषधियों से होने वाले साइड इफेक्ट को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता जबकि हमारी पारम्परिक औषधियां सर्वथा दुष्प्रभावों से मुक्त हुआ करती हैं।
हम अपने घरेलू उद्यान या गमलों में अगर कुछ औषधीय गुणों से सम्पन पौधों को लगा दें तो निस्संदेह वर्षपर्यन्त इन पौधों की सहायता से सर्दी, जुकाम, उल्टी, दस्त, रक्तचाप, मौसमी बुखार, मुंह के छाले अनेक व्याधियों से सहज ही छुटकारा पा सकते हैं। यहां पर कुछ ऐसे ही घरेलू पौधों के विषय में जानकारियां प्रस्तुत हैं।
अजवायन:- पत्ता अजवायन को आयुर्वेद शास्त्र में पूर्व यवानी के नाम से जाना जाता है। वनस्पति शास्त्र में इसका वानस्पतिक नाम ’कोलिअस अंबोइनिकस‘ है। इसे गमले में भी लगाया जा सकता है। यह पौधा फैलता है तथा खूबसूरती भी प्रदान करता है। इसकी पत्तियों में अजवायन के समान ही गंध आती है। नर्सरियों में इसका पौधा आसानी से उपलब्ध हो जाता है। बिना किसी अतिरिक्त देखभाल के इसका पौधा फैलता चला जाता है। उल्टी होने पर, अपच होने पर डकार आने पर इसकी पत्तियों के रस को लेना हितकर होता है।
ग्वारपाठा:- आयुर्वेद शास्त्र में ग्वारपाठा को घृतकुमारी के नाम से जाना जाता है। वनस्पति शास्त्र में इसे एलोवेरा कहा जाता है। इस पौधे को गमले में भी लगाया जा सकता है। यह पौधा अत्यन्त चिकना होता है। इसकी पत्तियों के अंदर घी जैसा चिकना पदार्थ भरा रहता है।
महिलाओं की बीमारी कष्टार्तव, अनार्तव, ल्यूकोरिया आदि में यह अमोघ औषधि मानी जाती है। कष्टार्तव एवं अनार्तव अर्थात् पीरियड कष्ट से होना तथा पीरियड के अवधि में पीरियड (मासिक धर्म) का न होने की स्थिति में इसके तने से बनाये गये क्वाथ को 20-30 मिलीलिटर की मात्रा में देते रहने से बहुत शीघ्र लाभ होता है। विभिन्न प्रकार के उदर रोगों, प्लीहावृद्धि, उदरकृमि, रक्तविकार व यकृतविकार भी घृतकुमारी के सेवन से ठीक होते हैं।
गिलोय:- आयुर्वेद शास्त्र में गिलोय को गुडुचि, चक्रांगी, अमृता आदि नामों से भी पुकारा जाता हैं। इसका वानस्पतिक नाम टिनोस्पोरा-कॉर्डिफोलिया है। इसकी पत्ती खूबसूरत हृदयाकार की होती है। इसे भी गमलों में लगाया जा सकता है। इसकी बेल (लता) होती है। गिलोय की बेल स्वास्थ्य की दृष्टि से अमृत के समान मानी जाती है। इसके तने को गन्ने की तरह भी चूसा जा सकता है। एसिडिटी, रक्त विकार, बुखार, मधुमेह (डायबिटिज) एवं सामान्य कमजोरी को समूल नाश करने के लिए इसका प्रयोग किया जाता है।
शतावरी:- वनस्पति शास्त्र में इसे ऐस्पेरेगम रैसी मौसम कहा जाता है। गमलों मंे लगायी जा सकने वाली यह एक खूबसूरत बेल है। इसकी चढ़ान तीस-फुट ऊंची तक होती है। इसके पौधों की जड़ में लगने वाली कन्द अत्यंत ही चिकित्सोपयोगी होती है। शतावरी की बेल बिना किसी विशेष देखभाल व परवरिश के भी खूब बढ़ती रहती है।
प्रसूता महिलाओं के स्तनों में दूध की मात्रा को बढ़ाने के लिये इसके कन्द का चूर्ण दो-तीन ग्राम की मात्रा में एक सप्ताह तक नित्य तीन बार तक देते रहने से लाभ होता है। मिरगी, नकसीर, मूर्च्छा, उच्च रक्तचाप, स्वप्नदोष, रक्तप्रदर, शुक्राल्पता, एसिडिटी व मानसिक कमजोरी में शतावरी का चूर्ण अत्यंत ही लाभकारी होता है।
तुलसी:-
इसे हिन्दू धर्म का एक धार्मिक पौधा माना जाता है। इसका वनस्पतिक नाम ’ऑसिमम-सैंक्टम‘ है। तुलसी के पौधे के अनेक प्रकार हैं। श्यामा तुलसी की पत्तियां खांसी, जुकाम, उदर कृमि, चर्म विकार, दंतवेदना, कान दर्द, दमा, अग्निमांद्य, हृदय दौर्बल्यता, मलेरिया आदि को सहजता से दूर कर सकती हैं। जिस स्थान पर तुलसी का पौधा लगा होता है वहां मच्छर एवं अन्य विषाक्त जीव-जन्तु नहीं आते। इसे भी गमले में आराम से लगाया जा सकता है।
इस प्रकार गमलों में स्वास्थ्यरक्षक पौधों को लगाकर इनका लाभ उठाया जा सकता है। आप भी इन्हें लगाकर देखें।
