मनुष्य जन्म से भ्रष्ट नहीं होता है। जन्म से तो वह शुद्ध होता है। बड़ा होने के बाद वह जिसके संग रहता है उसी का रंग उस पर आता है। अर्थात जैसा संग होगा, वैसा ही व्यक्ति बनेगा। सत्संग से जीवन सुधरता है और कुसंग से भ्रष्ट होता है। ज्ञान, सदाचरण, भक्ति, वैराग्य आदि में जो महापुरुष हमसे बढ़कर हो, उन्हीं का आदर्श अपनी दृष्टि के समक्ष रखें। नित्य व्यक्ति को यही इच्छा करनी चाहिए कि वह शंकराचार्य जैसा ज्ञान, मीरा जैसी भक्ति और शुक्रदेव जैसा वैराग्य प्राप्त करे। महापुरुषों के आदर्शों को जीवन में उतारना ही सच्चा सत्संग है। जब भक्त का हृदय प्रेम से भर जाता है, तो वे निष्काम होने पर ही सक्षम बनते हैं। निरक्षर साक्षर बनता है। ईश्वर प्रेम के भूखे हैं, वस्तु तथा पदार्थ के नहीं। अत: ज्ञान से प्रेम श्रेष्ठ है। प्रेम में ऐसी शक्ति है कि वह जड़ को भी चेतन बना देती है। निष्काम को सक्षम बना देता है। वस्तु को परिवर्तन करने की शक्ति ज्ञान में नहीं, प्रेम में है। सामूहिक तपस्या और साधना का एक अपना ही महत्व है, जिससे मनुष्य में अच्छे संस्कार बनते हैं और उसी से ही जीवन की रचना होती है। एक अच्छे युग का निर्माण होता है और इस श्रेष्ठ कार्य के लिए एक अच्छे व्यक्ति की आवश्यकता होती है। आज हम नये और अच्छे युग की कल्पना तो कर रहे हैं, लेकिन मात्र कैलेंडर बदलने से ही युग नहीं बदल सकता। जब भी हम एक नये युग की कल्पना करते हें तो हमारे सामने वर्तमान युग की कमजोरियां नजर आती हैं। जब हम इनकी ओर ध्यान देते हैं तो इन्हें दूर करने का विचार हमारे मन में आता है। अत: आज हमें नैतिक मूल्यों की पुन: स्थापना करने की जरूरत है।