जोड़ों का दर्द, नहीं है लाइलाज

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आज पूरे विश्व में 40 प्रतिशत से अधिक लोग जोड़ों के दर्द से परेशान हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक 30 साल से अधिक उम्र की तकरीबन 20 प्रतिशत शहरी आबादी किसी न किसी जोड़ के दर्द से पीडि़त है। महिलाओं में यह रोग अधिक पाया जाता है।
आमतौर पर कोई भी इस रोग का शिकार हो सकता है लेकिन दुर्घटनाग्रस्त लोग, मोटे और आरामपरस्त, कम्प्यूटर ऑपरेटर, दुपहिया चालक, क्लर्क, घरेलू एवं अनियमित माहवारी वाली महिलाएं तथा और भी अनेकों लोग जोड़ों के दर्द से पीडि़त हैं।
इस रोग के उत्पन्न होने का कारण देह में एकत्रित विजातीय द्रव्य का हड्यिों के जोड़ में प्रविष्ट हो जाना है। इससे जोड़ों में सूजन और पीड़ा पैदा हो जाती है जिससे कई बार ज्वर भी हो जाता है।
इस रोग का उपचार करने के लिये शरीर और जोड़ों में एकत्रित मल को तेजी से निकालना आवश्यक है। यह दूषित मल शरीर के सभी मार्गों से निकालना पड़ता है। मल और मूत्र निकालने वाले दोनों मार्ग तो शरीर की सफाई के प्रधान साधन होते ही हैं पर त्वचा और सांस भी इस कार्य में सहयोग देते हैं। रोगी को कभी-कभी एनिमा भी देना चाहिये। भोजन में फल और तरकारियों का प्रयोग अधिक करना चाहिए।
इस रोग का उपचार करने में तुलसी बड़ी कारगर भूमिका निभाती है क्योंकि तुलसी में वात विकार को मिटाने का प्राकृतिक गुण होता है। तुलसी का तेल बनाकर दर्द वाली जगह लगाने से तुरंत आराम मिलता है।
यदि नाडि़यों में दर्द हो तो तुलसी के काढे़ का प्रयोग करें। यह बहुत हितकारी होता है। तुलसी के रस को पीने से भी जोड़ों का दर्द ठीक होता है।
तुलसी की जड़, पत्ते, डण्ठल, मंजरी व बीज, इन पांचों का समान भाग लेकर, कूट छानकर 6 ग्राम मात्रा उतने ही पुराने गुड़ के साथ मिला लें। इसका प्रातः व सायंः दूध के साथ सेवन करें। बकरी का दूध मिल जाये तो और भी अच्छा है।
जोड़ों का दर्द होने पर क्या करें
 तकलीफ होने पर नमक मिले गरम पानी का सेवन व हल्के गुनगुने सरसों के तेल की मालिश करें।
 मोटापे पर नियंत्रण रखें।
 नियमित सूक्ष्म व्यायाम व योगाभ्यास करें।
 शरीर में यूरिक एसिड अधिक होने पर चिकित्सक से सलाह अवश्य लें।
क्या न करें-
 भोजन में खट्टे फलों का प्रयोग न करें।
 उठक-बैठक व्यायाम न करें ।
 पालथी मारकर न बैठें।
 मोटे तकिये व बिस्तर का प्रयोग न करें।
 मनमर्जी से दवाओं का प्रयोग न करें।
अक्सर यह रोग गांवों के लोगों में कम दिखाई देता है क्योंकि वे प्राकृतिक वातावरण में रहते हैं और मेहनत अधिक करते हैं। शहरी लोग भी यदि हल्का-फुल्का व्यायाम करते रहें तो जोड़ों के दर्द से बचे रहेंगे। 

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