राजस्थान के भरतपुर जिले की बयाना तहसील के कुछ गांव आजकल किसी रिपोर्ट के आंकड़े नहीं बल्कि एक धीमी त्रासदी की तरह सामने आते हैं। कभी यहां पान की बेलें सिर्फ खेतों में नहीं, लोगों की जिंदगी में भी लहलहाती थीं। आज वही बेलें सिकुड़ गई हैं और उनके साथ सिकुड़ गई है एक पूरे समुदाय की आर्थिक और सामाजिक दुनिया। एक आज ये गांव खाली हो रहे हैं। वहां के ग्रामीण कामकाज के लिए बड़े शहरों में पलायन कर गए हैं। खाली पड़े मकान गांवों को भुतहा सा दर्शाते हैं।
पिछले दिनों मैंने जब इस इलाके के बारे में सुना था तो एक बात बार-बार मन में आ रही थी कि क्या सचमुच यह सिर्फ मौसम की मार है? या फिर हम अपनी जिम्मेदारियों को ‘जलवायु परिवर्तन’ जैसे बड़े शब्दों के पीछे छिपा रहे हैं? यह सच है कि मौसम बदल गया है। सर्दियां पहले जैसी नहीं रही हैं, गर्मियां झुलसा देती हैं और बारिश अपने समय पर नहीं आती। पान जैसी नाजुक फसल के लिए यह बदलाव जानलेवा साबित हुआ है। मैं जब इस इलाके में गया तो गांवों की समृद्ध अर्थ व्यवस्था को उजड़े हुए पाया। खरैरी, बागरैन और खानखेड़ा गांवों के किसान बताते हैं कि पहले पान की एक बेल पंद्रह फीट तक जाती थी, अब सात-आठ फीट पर ही दम तोड़ देती है। पत्ते कम हो गए हैं, और जो हैं, वे भी अक्सर दागदार या जले हुए मिलते हैं।
लेकिन यहां कहानी यहीं खत्म नहीं होती है। असल कहानी वहां से शुरू होती है, जहां किसान मौसम से लड़ते-लड़ते थक जाता है और फिर उसे अहसास होता है कि इस लड़ाई में वह अकेला है। कोई उसके साथ नहीं है। पान की खेती आज भी फसल बीमा के दायरे से बाहर है। यह एक ऐसी हकीकत है जिसे सुनकर हैरानी नहीं बल्कि चिंता होनी चाहिए। बड़ा सवाल यह है कि जब जोखिम बढ़ रहा है, तब सुरक्षा का दायरा क्यों नहीं बढ़ता? क्या हमारी नीतियां केवल गेहूं-चावल जैसी मुख्यधारा की फसलों तक सीमित रह गई हैं? या फिर हम उन फसलों को नजरअंदाज कर रहे हैं, जो भले ही राष्ट्रीय आंकड़ों में बड़ी न दिखें लेकिन स्थानीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं?
बयाना का खरैरी गांव इसका जीता-जागता उदाहरण है। कभी यहां पान की वजह से इतनी रौनक थी कि बैंक की मुख्य शाखा तक खुल गई थी। आज हालात ऐसे हैं कि यह बैंक भी अपना बोरिया-बिस्तर समेट चुका है। यह सिर्फ एक आर्थिक गिरावट नहीं, बल्कि एक पूरे दौर के खत्म होने की निशानी है।
इसके बाद आता है पलायन। गांव के युवा अब खेतों में नहीं, शहरों की भीड़ में मिलते हैं। बड़े शहरों में कोई सिक्योरिटी गार्ड है, कोई हलवाई के यहां काम कर रहा है, कोई ऑटो चला रहा है। यह बदलाव सिर्फ पेशे का नहीं है बल्कि पहचान का भी है। जो लोग कभी अपने खेतों के दम पर समृद्ध थे, वे अब शहरों में मजदूरों की कतार का हिस्सा बन गए हैं।
सवाल यह भी है कि क्या हम गांवों को धीरे-धीरे खाली होते देखने के आदी हो चुके हैं? सरकार की भूमिका पर बात करना यहां जरूरी है लेकिन इसे केवल आलोचना के रूप में नहीं बल्कि जिम्मेदारी के रूप में देखना चाहिए। अगर किसी क्षेत्र में सदियों पुरानी खेती खत्म होने के कगार पर है तो क्या यह सिर्फ किसानों की समस्या है? या यह नीति-निर्माताओं के लिए भी एक चेतावनी है? पान की खेती को अगर बीमा, अनुदान, प्रशिक्षण और बाजार से जोड़ा जाता तो शायद हालात यह न होते। आसपास मंडी नहीं है, परिवहन की सुविधा कमजोर है—ऐसे में किसान अपनी उपज बेचने के लिए दूर-दराज के शहरों पर निर्भर है। इससे लागत बढ़ती जाती है, मुनाफा घटता जाता है और अंतत: किसान खेती छोड़ देता है। हमें कई सवालों पर विचार करने की जरूरत है। क्या हम केवल संकट के बाद राहत देने वाली व्यवस्था बनकर रह जाएंगे? क्या हमारी कृषि नीति में विविधता के लिए जगह है?
और क्या हम परंपरागत खेती को बचाने के प्रति सचमुच गंभीर हैं? अगर सोचें तो इन सवालों के जवाब और समस्या का समाधान बहुत जटिल नहीं हैं लेकिन इरादा तो होना चाहिए।
पान जैसी खेती को विलुप्त होने से बचाने के लिए प्रयास करने की जरूरत है। इसके लिए सरकार और नीति नियंताओं को मिल कर प्रयास करने होंगे। सबसे पहले जरूरी है कि पान जैसी फसलों को फसल बीमा के दायरे में लाना जाए। ऐसा करके हम किसानों को कोई अहसान नहीं करेंगे बल्कि यह तो न्यूनतम सुरक्षा है, जो उन्हें मिलनी ही चाहिए। इसके साथ-साथ जलवायु के अनुरूप खेती के तरीकों पर स्थानीय स्तर पर प्रशिक्षण और शोध की जरूरत है। इसके अलावा, छोटे-छोटे कृषि केंद्र और मंडियां विकसित करनी होंगी जिससे किसानों को बाजार से जोड़ा जा सके। बयाना के गांवों का अनुभव कड़वा है। जब खेतों में पान के पत्ते जलते है तो वहां सिर्फ फसल नहीं जलती, उसके साथ कई उम्मीदें, परंपराएं और भविष्य भी झुलस जाता है। ऐसा न हो, इसके लिए जरूरी कदम उठाने ही होंगे।
अमरपाल सिंह वर्मा
