नेता प्रतिपक्ष और किसी भी सदस्य को नियम के खिलाफ जाकर बोलने का विशेषाधिकार नहीं: बिरला
Focus News 12 March 2026 0
नयी दिल्ली, 12 मार्च (भाषा) लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने बृहस्पतिवार को कहा कि उन्होंने निष्पक्षता और नियमों के अनुरूप सदन की कार्यवाही संचालित करने का प्रयास किया है तथा किसी भी सदस्य को नियमों से परे जाकर बोलने का विशेषाधिकार नहीं है।
बिरला ने विपक्ष द्वारा उनके खिलाफ लाए गए संकल्प को सदन द्वारा अस्वीकार किए जाने पर सदस्यों का आभार व्यक्त किया और कहा कि वह पूरी निष्ठा और संवैधानिक मर्यादा के साथ जिम्मेदारी निभाने का प्रयास करेंगे।
बिरला ने कहा, ‘‘यह सदन भारत के 140 करोड़ नागरिकों की संप्रभु इच्छा का प्रतिनिधित्व करता है…हमेशा यह प्रयास किया है कि सदन के अंदर प्रत्येक सदस्य नियमों और प्रक्रियाओं के तहत अपने मुद्दों पर विचार व्यक्त करें और सभी सदस्यों को इसके लिए पर्याप्त अवसर मिले। यह सदन समाज की अंतिम पंक्ति में खड़े हर उस व्यक्ति की आवाज बने जिसे आज हमारी सबसे अधिक आवश्यकता है।’’
उन्होंने कहा, ‘‘मैंने दोनों कार्यकाल में उन सभी माननीय सदस्यों से बोलने का आग्रह किया जिन्होंने सदन में एक बार भी नहीं बोला था। क्योंकि इस सदन में बोलने से लोकतंत्र का संकल्प और मजबूत होता है और सरकार की जवाबदेही भी तय होती है।’’
बिरला का कहना था, ‘‘मैंने हमेशा यह प्रयास किया है कि सदन की कार्यवाही निष्पक्षता, अनुशासन, संतुलन और नियमों के साथ संचालित हो। सदन में सभी को साथ लेकर सामन्जस्य से व्यवस्था एवं कार्यकुशलता बनाये रखना अध्यक्ष का मुख्य कार्य है। मेरा हमेशा यह प्रयास रहता है कि सदन की गरिमा, मर्यादा और प्रतिष्ठा में उत्तरोत्तर वृद्धि होती रहे।’’
लोकसभा अध्यक्ष ने इस बात का उल्लेख किया कि विपक्ष की ओर से अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दिए जाने के बाद से नैतिक कर्त्तव्य का निर्वहन करते हुए उन्होंने सदन की कार्यवाही से अपने आपको अलग कर लिया था।
उन्होंने कहा, ‘‘मैं आपको विश्वास दिलाता हूं कि इस विश्वास को अपनी जिम्मेदारी मानते हुए पूरी निष्ठा, निष्पक्षता और संवैधानिक मर्यादा के साथ आगे निभाने का प्रयास करूंगा।’’
बिरला ने कहा, ‘‘चर्चा के दौरान कुछ माननीय सदस्यों ने कहा कि प्रतिपक्ष के नेता को बोलने से रोका जाता है व उन्हें बोलने का पर्याप्त अवसर नहीं दिया जाता है। मैं यह स्पष्ट करना चाहता हूं कि चाहे सदन के नेता हों, चाहे नेता प्रतिपक्ष हों, मंत्रिगण या अन्य कोई सदस्य हो, सभी को सदन के नियमों के तहत निर्धारित प्रक्रिया का पालन करते हुए ही बोलने का अधिकार मिलता है।’’
उन्होंने इस बात पर जोर दिया, ‘‘कुछ माननीय सदस्यों का यह मानना है कि प्रतिपक्ष के नेता सदन में कभी भी उठकर किसी भी विषय पर कुछ भी बोल सकते हैं। उन्हें लगता हैं कि यह उनका विशेषाधिकार है। मैं यह स्पष्ट करना चाहता हूं कि सदन नियमों से चलता है और सदन के कार्य संचालन नियम सदन द्वारा ही बनाए गए हैं।’’
बिरला के अनुसार, सदन में जब भी लोक महत्व के किसी विषय पर यदि प्रधानमंत्री या मंत्रियों को वक्तव्य देना होता है, तो उन्हें नियम 372 के तहत अध्यक्ष से पूर्व सम्मति प्राप्त करनी होती है।
उन्होंने कहा कि किसी भी सदस्य को नियमों से परे जाकर बोलने का विशेषाधिकार इस सदन में नहीं है।
बिरला ने कुछ पूर्ववर्ती अध्यक्षों के निर्णयों का भी उल्लेख किया।
उन्होंने कहा, ‘‘चर्चा के दौरान यह भी कहा गया कि अध्यक्ष पीठ के द्वारा प्रतिपक्ष के कुछ सदस्यों का माइक बन्द कर दिया जाता है। इस बारे में मैं पहले भी यह स्पष्ट रूप से बता चुका हूं कि आसन के पास माननीय सदस्यों के माइक ऑन या ऑफ करने का कोई बटन नहीं है। प्रतिपक्ष के कुछ सदस्य भी पीठासीन अधिकारी के रूप में कार्य करते हैं और वे इस बात से भलीभांति अवगत हैं।’’
लोकसभा अध्यक्ष ने कहा कि चर्चा के दौरान महिला सदस्यों के सम्मान को लेकर भी विचार व्यक्त किए गए।
उनका कहना था, ‘‘मेरे मन में हमेशा हमारी महिला सदस्यों के प्रति सर्वोच्च सम्मान का भाव रहा है। मेरा हमेशा से यह प्रयास रहा है कि हर महिला सदस्य को सदन में बोलने का अवसर मिले। मुझे इस बात का गर्व है कि मेरे अध्यक्षीय कार्यकाल में प्रत्येक महिला सदस्य ने सदन में अपने बहुमूल्य विचार रखें हैं, चाहे वे प्रथम बार ही चुनकर आईं हो।’’
उन्होंने बजट सत्र के पहले चरण की घटना का उल्लेख करते हुए कहा, ‘‘जिस प्रकार से प्रतिपक्ष की कुछ सदस्य सत्तापक्ष की तरफ जाकर नारेबाजी कर रही थीं और जिस प्रकार से बैनर दिखाया जा रहा था, उस समय कोई भी अप्रत्याशित स्थिति बन सकती थी। ऐसे किसी अप्रत्याशित स्थिति की संभावना को टालने एवं व्यवस्था बनाए रखने के लिए मुझे सदन के नेता (प्रधानमंत्री) से सदन में न आने का आग्रह करना पड़ा।’’
बिरला के अनुसार, ऐसी प्रतिकूल स्थिति में सदन की व्यवस्था और प्रतिष्ठा बनाये रखने के लिए जो उचित था, उन्होंने वही किया।
कुछ सदस्यों के निलंबन के विषय को लेकर उन्होंने कहा कि यह विचार करना होगा कि ऐसी स्थिति ही क्यों उत्पन्न हुई कि इस सदन को व्यवस्था बनाए रखने के लिए निलंबन जैसे कठोर निर्णय लेने पड़े।
