जीवन में जरूरी है जिद भी लेकिन केवल सकारात्मक जिद

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यदि हम ध्यानपूर्वक देखें तो पाते हैं कि कुछ लोग ज़िद्दी ज़रूर हैं लेकिन उनकी ज़िद से समाज या राष्ट्र को कोई हानि नहीं होती अपितु कुछ न कुछ लाभ ही होता है। तो क्या ज़िद्दी, हठी अथवा दुराग्रही होना एक अच्छी आदत है?
 कुछ लोग अत्यंत ज़िद्दी स्वभाव के होते हैं। यदि हम ध्यानपूर्वक देखें तो ज़िद के दो कारण नज़र आते हैं या दो प्रकार की ज़िद हो सकती है। एक है ग़लत ज़िद तथा दूसरी है सही ज़िद।
प्रायः सही शिक्षा-दीक्षा या उचित परिवेश और संस्कारों के अभाव में व्यक्ति ग़लत विचारों या बातों के प्रति पूर्वाग्रही या ज़िद्दी हो जाता है। यह ग़लत या नकारात्मक ज़िद है। कुछ लोग अपने झूठे अहंकार की पुष्टि के लिए ज़िद्दी बन जाते हैं। अपनी कमियों को छुपाने के लिए भी कुछ लोग ज़िद्दी हो जाते हैं और फिर यह उनकी आदत बन जाती है जो जीवन के हर क्षेत्रा में व्याप्त हो जाती है और इससे छुटकारा पाना असंभव हो जाता है। दूसरी ओर कुछ लोग ज़िद्दी तो हैं पर वे लोग ग़लत ज़िद करने की बजाय ग़लत चीज़ या विचार के प्रति ज़िद्दी होते हैं।
इस प्रकार के जिन लोगों को हम प्रायः ज़िद्दी कहकर संबोधित करते हैं वे ज़िद्दी नहीं अपितु कुछ सिद्धांतों पर चलने वाले, अनुशासनप्रिय, स्वाभिमानी, ईमानदार, दिखावा न करने वाले तथा समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने वाले होते हैं। इस प्रकार ज़िद के दो रूप हमारे सामने हैं। एक है नकारात्मक ज़िद तथा दूसरी है सकारात्मक ज़िद। नकारात्मक ज़िद जहाँ व्यक्ति और समाज दोनों के लिए घातक है, वहीं सकारात्मक ज़िद सबके लिए उपयोगी है।
लोकमान्य तिलक भी बहुत ज़िद्दी थे। उन्होंने कहा, ’स्वतंत्राता मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और इसे मैं लेकर ही रहूँगा।‘ वे अपने सिद्धांतों पर अडिग रहे, अंग्रेज़ सरकार की ग़लत नीतियों और शोषण के लिए उनकी आलोचना करते रहे। अनेक बार जेल गए पर अपनी ज़िद नहीं छोड़ी। गाँधी जी भी कम ज़िद्दी नहीं थे। ऐसे ज़िद्दी कि दुनियां की सबसे ताक़तवर हुकूमत को घुटने टेकने के लिए विवश कर दिया।
स्वतन्त्रता प्राप्ति के लिए पूरा राष्ट्र ही तो ज़िद्दी हो गया था। लोग इतने ज़िद्दी हो गए थे कि आज़ादी पाने के लिए ख़ुद को मिटा डाला। क्या उनके इस योगदान या उनकी इस ज़िद को साधारण ज़िद कहेंगे? कुछ ऐसे ज़िद्दी भी थे कि हिंसा के जवाब में भी हिंसा नहीं की। वे अहिंसा के प्रति ज़िद्दी थे, सत्य के प्रति आग्रही थे। जीवन मूल्यों के प्रति ज़िद भी कहीं ग़लत हो सकती है? कहाँ मुसोलिनी और हिटलर की ज़िद और कहाँ तिलक, गाँधी और सुभाष की ज़िद?
तो क्या हम सब ज़िद्दी बन जाएँ? हाँ, अपनी बात मनवाने के लिए ज़िद करें। ज़रूर करें। दूसरों से ही नहीं, स्वयं से भी ज़िद करें। अच्छा बनना है तो बुरा न बनने की ज़िद करें। अच्छा बनने की ज़िद करें। मात्रा अच्छा बनने का संकल्प लें। हर सकारात्मक ज़िद एक संकल्प ही तो है। नकारात्मक भावों को मिटाने की ज़िद करें। अनुशासनहीनता दूर करने की ज़िद करें। किसी अच्छे कार्य को पूरा करने के लिए ज़िद्दी बन जाएँ। अन्याय और शोषण को मिटाने के लिए अपनी ज़िद कभी न छोड़ें। जहाँ ज़िद करने की ज़रूरत नहीं, वहाँ ज़िद न करने की ज़िद करने का संकल्प लें।
झूठी प्रतिष्ठा बनाए रखने के लिए ज़िद करने की अपेक्षा ग़लत मूल्यों और परंपराओं को मिटाने की ज़िद करना अच्छा है। आप अपने अच्छे स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि और दीर्घायु के प्रति ज़िद्दी होकर अच्छा स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि और दीर्घायु प्राप्त करने की दिशा में अग्रसर हों न कि ग़लत ज़िद के कारण अपने स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि और आयु को दाँव पर लगाएँ।
 ज़िद का सकारात्मक रूप ही रूपांतरण कर आनंद प्रदान करता है। जीवन को आनंदस्वरूप बनाना है तो हर नकारात्मक विचार के विरोधी भाव पर ज़िद करके बैठ जाइये। सकारात्मक सात्त्विक ज़िद मनुष्य का रूपांतरण करने में सक्षम है अतः यह जीवन जीने की, उसको सँवारने-सजाने की एक कला है।

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