‘आज विदुर जी से मिलना चाहिए। – यह विचार श्रीकृष्ण के मन में आए और चल पड़े मिलने। जब वहां पहुंचे तो पता चला कि विदुर जी तो अभी-अभी बाहर गए हैं। श्रीकृष्ण की आवाज विदुरानी के कानों में पड़ी। उस समय वह नहा रही थीं। जैसे ही कृष्ण के आने का आभास हुआ वह बिना वस्त्र पहने ही भागते हुए उनके सामने आ खड़ी हुई। कृष्ण को बैठने का निवेदन किया। श्रीकृष्ण ने कहा- ‘जाओ! पहले कपड़े पहन आओ। तब उसे होश आया। वह कृष्ण प्रेम में इतनी बांवरी हो चुकी थी कि पता ही नहीं चला कि वह निर्वस्त्र है। वहां न पाप था न पुण्य। केवल प्रेम का दीवानापन। वह कपड़े पहनकर आई। क्षमा मांगी और कृष्ण को आसन पर बैठाया। घर में खिलाने को और कुछ नजर नहीं आया। विदुरानी केले उठा लाई। कृष्ण के सामने बैठ गई। वह केले छीलती गई। छिलके कृष्ण जी को पकड़ाती गई। वह भी प्रेमपूर्वक खाते गए। वह दीवानी केले का गूदा फैंकती गई। इतनी अभिभूत कि अपने आप में ही नहीं थी वह। तभी विदुर जी आ पहुंचे। देखा। श्रीकृष्ण छिलके खा रहे थे। फल जमीन पर पड़े थे। उन्होंने कहा- ‘पगली! क्या कर रही है। इन्हें खाने को फल दो, छिलके नहीं। ‘अहो! मुझे तो पता ही नहीं चला। कहते हुए विदुरानी ने नया केला छीलकर गूदा उन्हें पकड़ाया। छिलका फैंक दिया। श्रीकृष्ण ने जब गूदा खाया तो बोले- ‘भाई विदुर! इसमें वह स्वाद नहीं जो छिलके में था…। प्रेम के दीवानेपन में मिले छिलके अधिक स्वादिष्ट थे