मासिक धर्म अवकाश से संबंधित याचिका ठुकराए जाने पर वकीलों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की राय बंटी

0
zcdfrt5t5r

नयी दिल्ली, 14 मार्च (भाषा) देशभर में मासिक धर्म अवकाश की नीति लाने के अनुरोध से संबंधित याचिका पर सुनवाई से उच्चतम न्यायालय के इनकार के बाद वकीलों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने अलग-अलग राय व्यक्त की है। कुछ लोगों ने स्वैच्छिक प्रावधानों का समर्थन किया, जबकि कई ने महिलाओं के स्वास्थ्य और गरिमा की सुरक्षा के लिए मजबूत कानूनी प्रावधानों पर जोर दिया।

उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को इस जनहित याचिका पर सुनवाई से इनकार करते हुए कहा कि ऐसी स्थिति में महिलाओं को नौकरी देना मुश्किल हो सकता है और इस तरह का प्रावधान अनजाने में लैंगिक रूढ़ियों को और मजबूत कर सकता है।

वरिष्ठ अधिवक्ता करुणा नंदी ने ‘पीटीआई-भाषा’ से बातचीत में कहा कि सीमित प्रावधान, जैसे एक दिन का सवेतन मासिक धर्म अवकाश, एक व्यावहारिक शुरुआत हो सकती है।

उन्होंने कहा, “मासिक धर्म के दर्द की स्थिति सामान्य ऐंठन से लेकर एंडोमेट्रियोसिस जैसी गंभीर समस्या तक हो सकती है। यह समस्या महिलाओं को पढ़ाई और नौकरी दोनों स्थितियों में प्रभावित करती है। इसलिए महिलाओं की स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों और अलग-अलग परिस्थितियों को ध्यान में रखकर नीतियां बनाई जानी चाहिए।”

सामाजिक कार्यकर्ता योगिता भयाना ने इस चिंता की आलोचना की कि मासिक धर्म अवकाश से महिलाओं के रोजगार के अवसर कम हो सकते हैं।

भयाना ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, “इस तरह की सोच बहुत ही गलत है। महिलाएं पहले से ही गर्भावस्था और बच्चों की देखभाल जैसी जैविक वास्तविकताओं से गुजरती हैं। अगर इन्हीं कारणों से उन्हें अवसरों से वंचित किया जाता है, तो सरकार को कंपनियों को निर्देश देना चाहिए कि वे महिलाओं के रोजगार के अवसरों में बाधा न डालें।”

भयाना ने कहा कि कई महिलाओं को मासिक धर्म के दौरान तेज दर्द होता है और उन्हें छुट्टी लेने का विकल्प दिया जाना चाहिए।

उन्होंने कहा, “कई महिलाएं ऐसी होती हैं जिन्हें इस दौरान गंभीर दर्द होता है और वे काम पर ध्यान नहीं लगा पातीं। भले ही वे कार्यालय पहुंच जाएं, उस दिन उनकी कामकाजी क्षमता बहुत कम रहती है। इसलिए स्वैच्छिक अवकाश लेने का विकल्प जरूर दिया जाना चाहिए।”

सामाजिक कार्यकर्ता रंजना कुमारी ने कहा कि यह मुद्दा मुख्य रूप से राज्य सरकारों के अधिकार क्षेत्र में आता है।

उन्होंने कहा, “यह विषय राज्यों के दायरे में आता है। शायद यही कारण है कि उच्चतम न्यायालय औद्योगिक नीति जैसे मुद्दे पर चर्चा करने को तैयार नहीं है। हर राज्य को इस संबंध में कानून बनाना चाहिए या कार्यकारी आदेश जारी करना चाहिए, ताकि मासिक धर्म के दौरान अस्वस्थ रहने वाली महिलाओं को छुट्टी मिल सके। यह महिलाओं के जीवन का एक बहुत महत्वपूर्ण पहलू है।”

कुमारी ने कहा कि मासिक धर्म अवकाश उपलब्ध होना चाहिए, लेकिन इसे हर महिला के लिए अनिवार्य नहीं बनाया जाना चाहिए।

उन्होंने कहा, “मैं मासिक धर्म अवकाश के पक्ष में हूं, लेकिन यह स्वैच्छिक होना चाहिए। यह नहीं कहा जा सकता कि हर महिला को हर महीने तीन दिन की छुट्टी लेनी ही होगी। कई महिलाओं को इसकी जरूरत नहीं होती। जब किसी महिला को दर्द या अन्य जटिलताएं हों, तब यह अवकाश उपलब्ध होना चाहिए।”

अधिवक्ता सुनीता शर्मा ने उच्चतम न्यायालय की चिंताओं का समर्थन करते हुए कहा कि अनिवार्य मासिक धर्म अवकाश से अनजाने में महिलाओं के रोजगार के अवसर प्रभावित हो सकते हैं।

उन्होंने कहा, “मुझे लगता है कि यह बात सही है, क्योंकि महिलाओं को यह क्यों दिखाना चाहिए कि हम पुरुषों की तुलना में कमजोर हैं और हम उन तीन-चार दिनों को संभाल नहीं सकतीं?”

सुनीता ने कहा कि मासिक धर्म एक व्यक्तिगत मामला है और इसे कार्यस्थल का सार्वजनिक मुद्दा नहीं बनाया जाना चाहिए।

उन्होंने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, “भारतीय परिदृश्य में यह आपके शरीर से जुड़ा बहुत ही व्यक्तिगत विषय है। पूरी दुनिया को यह क्यों पता होना चाहिए कि आप मासिक धर्म से गुजर रही हैं और इसी वजह से आप कार्यालय नहीं आ सकतीं?”

दिल्ली विश्वविद्यालय की विधि प्रोफेसर सीमा सिंह ने कहा कि इस मुद्दे के कई सामाजिक और आर्थिक पहलू हैं।

उन्होंने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, “यह बहुत संवेदनशील मुद्दा है और इसके कई आयाम हैं। यह केवल मासिक धर्म स्वच्छता या मासिक धर्म वाली महिला के स्वास्थ्य के अधिकार से जुड़ा मामला नहीं है, बल्कि इससे जुड़े कई अन्य मुद्दे भी हैं।”

उन्होंने कहा कि व्यापक सामाजिक स्वीकार्यता के बिना अनिवार्य प्रावधान लागू करने से महिलाओं के रोजगार के अवसर प्रभावित हो सकते हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *