अहिंसा के ‘महावीर’

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दुनिया भर के 193 देश में से 54 देश इस समय अंदरूनी संघर्ष, हिंसा या अंतरराष्ट्रीय युद्ध अथवा आतंकवाद से त्रस्त हैं। अखबारों, टीवी चैनलों, सोशल मीडिया या अन्य मंचों से लगातार खून खराबे एवं विनाशकारी धमाकों के समाचार मिल रहे हैं। ऐसे में जब विश्व के विभिन्न कोनों से युद्ध, हिंसा और संघर्ष की खबरें लगातार सामने आ रही हों, जब मानवता भय और असुरक्षा के साये में जी रही हो, तब इतिहास के उन प्रकाशमान व्यक्तित्वों की स्मृति अत्यंत आवश्यक हो जाती है, जिन्होंने शांति, करुणा और सह-अस्तित्व का मार्ग दिखाया। 

   जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर महावीर स्वामी ऐसे ही युगद्रष्टा थे, जिन्होंने अपने समय में हिंसा एवं खून खराबे से त्रस्त दुनिया को अहिंसा, शांति, अस्तेय, अपरिग्रह, अनेकांतवाद एवं ब्रह्मचर्य का संदेश दिया उनकी जयंती आज केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि पूरी मानवता के लिए आत्ममंथन का अवसर है।

   महावीर स्वामी का जन्म 599 ईसा पूर्व वैशाली के कुंडलपुर में हुआ था। उनका बचपन का नाम वर्धमान था। राजसी वैभव में जन्म लेने के बावजूद उनके भीतर सांसारिक सुखों के प्रति कोई विशेष आकर्षण नहीं था। बचपन से ही उनमें करुणा, संयम और वैराग्य के गुण स्पष्ट दिखाई देते थे। जीवन के गूढ़ प्रश्नों-दुख, मृत्यु और आत्मा की मुक्ति ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया। यही बेचैनी उन्हें 30 वर्ष की आयु में गृहत्याग की ओर ले गई।

   बाद में महावीर बने  वर्धमान ने संन्यास ग्रहण करने के बाद बारह वर्षों तक कठोर तपस्या की यह तप केवल शरीर को कष्ट देने का अभ्यास नहीं था, बल्कि आत्मा की शुद्धि का मार्ग था। उन्होंने अपने भीतर के क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार को जीतने का प्रयास किया। अंततः उन्हें कैवल्य ज्ञान प्राप्त हुआ और वे ‘महावीर’ कहलाएअर्थात वह जिसने स्वयं पर विजय प्राप्त कर ली हो।

महावीर स्वामी के उपदेशों में जैन धर्म की मूल शिक्षाएं निहित हैं, जो मानव जीवन को संतुलित और शांतिपूर्ण बनाने का मार्ग दिखाती हैं। जैन धर्म के प्रमुख सिद्धांतों में अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह को पंचमहाव्रत कहा गया है।

अहिंसा जैन धर्म का सबसे केंद्रीय और महत्वपूर्ण सिद्धांत है। इसका अर्थ केवल किसी प्राणी की हत्या न करना मात्र नहीं, बल्कि किसी भी जीव को मन, वचन और कर्म से कष्ट न पहुंचाना है। आज जब युद्धों में निर्दोष लोग मारे जा रहे हैं, जब समाज में छोटी-छोटी बातों पर हिंसा हो रही है, तब यह सिद्धांत हमें याद दिलाता है कि सच्ची मानवता करुणा में निहित है।

महावीर की नज़र में सत्य का अर्थ है-विचार, वाणी और आचरण में सत्यनिष्ठा। आज के समय में जब झूठ और भ्रम फैलाना आसान हो गया है, सत्य का पालन करना एक साहसिक कार्य बन गया है। महावीर का यह संदेश हमें नैतिकता की ओर लौटने के लिए प्रेरित करता है।

‘अस्तेय’ यानी चोरी न करना, केवल भौतिक वस्तुओं तक सीमित नहीं है। यह दूसरों के अधिकारों और अवसरों का सम्मान करने का भी संदेश देता है। आधुनिक समाज में भ्रष्टाचार और शोषण इसी सिद्धांत के उल्लंघन का परिणाम हैं।

ब्रह्मचर्य आत्मसंयम और इंद्रिय-निग्रह का प्रतीक है। यह हमें सिखाता है कि जीवन में संतुलन और अनुशासन कितना आवश्यक है।

‘अपरिग्रह’ यानी संग्रह न करना, आज के उपभोक्तावादी युग में अत्यंत प्रासंगिक है। संसाधनों की अंधाधुंध होड़, लालच और असमानता ही कई बार संघर्ष और युद्ध का कारण बनती है। यदि मनुष्य अपनी आवश्यकताओं को सीमित कर ले, तो समाज में संतुलन स्थापित हो सकता है।

  महावीर स्वामी का दिया हुआ जैन धर्म का एक और महत्वपूर्ण सिद्धांत है अनेकांतवाद। इसका अर्थ है कि सत्य के अनेक पक्ष होते हैं। कोई भी व्यक्ति या विचार पूर्ण सत्य का अकेला स्वामी नहीं हो सकता। आज जब दुनिया विचारधाराओं की कट्टरता और असहिष्णुता से जूझ रही है, यह सिद्धांत संवाद, सहिष्णुता और सह-अस्तित्व की राह दिखाता है।

   निसंदेह महावीर स्वामी का जीवन इस बात का उदाहरण है कि परिवर्तन भीतर से शुरू होता है। उन्होंने न कोई युद्ध लड़ा, न किसी सत्ता को चुनौती दी, फिर भी उनके विचारों ने करोड़ों लोगों के जीवन को प्रभावित किया। यह इस बात का प्रमाण है कि विचारों की शक्ति किसी भी हथियार से अधिक प्रभावशाली होती है।

   आज के वैश्विक परिदृश्य में, जहां युद्ध और शक्ति प्रदर्शन को ही श्रेष्ठता का प्रतीक माना जा रहा है, महावीर का यह संदेश अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है कि “क्षमा ही वीर का आभूषण है।” यह हमें सिखाता है कि सच्ची बहादुरी दूसरों को हराने में नहीं, बल्कि अपने भीतर की हिंसा को समाप्त करने में है।

   वर्तमान समय में महावीर स्वामी की प्रासंगिकता और आवश्यकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। जब दुनिया परमाणु हथियारों की होड़ में लगी हो, जब राष्ट्र अपने हितों के लिए मानवता को दांव पर लगाने से भी पीछे न हटें, तब महावीर का अहिंसा का सिद्धांत ही एकमात्र ऐसा मार्ग है जो हमें विनाश से बचा सकता है। यदि दुनिया से चीखों ,चीत्कारों, रुदन और पीड़ा का अंत करना है तो महावीर स्वामी के बताए रास्ते पर चलना ही एकमात्र उपाय है। 

  आज आवश्यकता इस बात की है कि हम महावीर स्वामी को केवल एक धार्मिक प्रतीक के रूप में न देखें, बल्कि उनके विचारों को अपने जीवन में उतारें। यदि व्यक्ति स्तर पर अहिंसा, सत्य और अपरिग्रह का पालन किया जाए, तो समाज और राष्ट्र स्तर पर भी शांति स्थापित हो सकती है।

महावीर जयंती का पर्व हमें केवल उनके जीवन की स्मृति नहीं दिलाता, बल्कि एक संकल्प लेने का अवसर देता है-अहिंसा का, सहिष्णुता का और मानवता के उत्थान का। यही वह मार्ग है जो आज के हिंसक और अस्थिर विश्व को शांति और स्थिरता की ओर ले जा सकता है।

   इसमें दो राय नहीं कि महावीर स्वामी केवल अतीत के महापुरुष नहीं हैं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के मार्गदर्शक हैं। उनकी शिक्षाएं समय की सीमाओं से परे हैं। आज जब दुनिया को सबसे अधिक आवश्यकता शांति और सह-अस्तित्व की है, तब महावीर का दर्शन ही वह प्रकाश है, जो हमें सही दिशा दिखा सकता है।

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