प्रभु श्रीराम : जन-जन के आराध्य,राजनीति के महानायक

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सूर्यवंश के प्रतापी राजा अयोध्या नरेश राम। शबरी की भक्ति के प्रतिफल राम। जन-जन के आराध्य राम। राजा दशरथ के आज्ञाकारी पुत्र राम। और प्राचीन भारतीय राजतंत्र से लेकर वर्तमान में लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीति के महानायक। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि भारतीय संस्कृति राम के बिना अधूरी है। त्रेता युग में प्रभु श्रीराम का सम्पूर्ण  जीवन हमारी भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग रहा। जो समस्त राष्ट्र और विश्व को आलोकित करता था और आज भी कर रहा है। भगवान राम के प्रति जन आस्था का आलम ऐसा है कि बीते दिनों में भगवान राम लोगों की आस्था से लेकर देश की राजनीतिक केंद्र बन गए हैं। यही वजह है कि बीते कई दशकों से भगवान श्रीराम विभिन्न राजनीतिक दलों के लिए अलग-अलग विमर्श हैं। और यह दुर्भाग्य कहा जाएगा कि भगवान राम के देश में राम राजनीति में किसी दल के लिए सत्ता के “संबल” है, तो किसी के लिए “अछूत”।

 

              प्राचीन भारतीय हिन्दु धर्म शास्त्रों के अनुसार त्रेतायुग में भगवान विष्णु ने पृथ्वी पर श्रीराम के रूप में अवतार लिया था। रावण के अत्याचारों को समाप्त करने तथा धर्म की पुनःर्स्थापना के लिये  श्री रामचन्द्र भगवान का जन्म चैत्र शुक्ल की नवमी के दिन पुनर्वसु नक्षत्र तथा कर्क लग्न में राजा दशरथ के घर में हुआ था।  हिन्दू धर्म में रामनवमी के दिन मर्यादा के प्रतीक भगवान श्री राम की पूजा अर्चना की जाती है। रामनवमी का सनातन धर्म में विशेष धार्मिक और पारंपरिक महत्व है जो हिंदू धर्म के लोगों के द्वारा पूरी भक्ति, आस्था एवं उत्साह के साथ मनाया जाता है। भगवान विष्णु के अवतार श्रीराम का धरती पर अवतार लेने का एकमात्र उद्देश्य अधर्म का नाश कर धर्म की पुनः स्थापना करना था। जिससे सामान्य मानव शांति, प्रेम एवं सुख के साथ अपना जीवन व्यतीत कर सके, साथ ही भगवान की भक्ति भी हो सके। इसके साथ ही राम राज्य की “संकल्पना” भी त्रेता युग की ही देन है, जो वर्तमान की भी आवश्यकता है।

 

               देश और दुनिया में तीर्थ नगरी के रूप में चर्चित अयोध्या में राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा के बाद से जन-जन के आराध्य भगवान श्री राम भारतीय राजनीति के केंद्र में हैं। केंद्र की सत्ता पर काबिज भाजपा “रामराज्य” और विकसित भारत 2047 के एजेंडे को लेकर आगे बढ़ रही है। इसके उलट कांग्रेस सहित समूचा विपक्ष इसे भाजपा का “चुनावी नैरेटिव” बता रहा है। राष्ट्रपति मुर्मू की हालिया अयोध्या यात्रा में राम के प्रति देश की प्रथम नागरिक के समर्पण और श्रद्धा ने इस धार्मिक-राजनीतिक बहस को और तेज कर दिया है। श्रीमती मुर्मु ने राम जन्मभूमि मंदिर में आरती की तथा श्री राम यंत्र स्थापना समारोह में भाग लिया। वैदिक मंत्रों के बीच राम मंदिर की दूसरी मंजिल पर श्री राम यंत्र स्थापित किया गया। इस मौके पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने कहा कि देश सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक मोर्चे पर पुनर्जागरण के दौर से गुजर रहा है और अयोध्या स्थित श्री राम जन्मभूमि मंदिर इसका प्रतीक है।

 

         भारतीय राजनीति में भगवान श्री राम की प्रासंगिकता पर गौर करें, तो पता चलता है की राम मंदिर आंदोलन को लेकर विभिन्न प्रयासों से इसकी शुरुआत मानी जा सकती है। भाजपा ने जब राम मंदिर निर्माण के लिए पूरे देश में एक भव्य रथ यात्रा निकाली तो यात्रा के समर्थन में लोगों का सैलाब उमड़ पाड़ा और पूरा देश “राम भक्त” और “राम विरोधी” खेमों में बंट गया। भगवान श्री राम की जन्म भूमि अयोध्या ने एक वह दौर भी देखा जब अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए कारसेवा कर रहे कर सेवकों के लहू से सरयू का पानी लाल हो गया था। भगवान श्री राम की भारतीय राजनीति में प्रासंगिकता पर एक मोड उस समय भी आया जब डेढ़ सौ साल पुरानी पार्टी कहीं जाने वाली कांग्रेस ने अदालत में यह “हलफनामा” दिया कि भगवान श्री राम हुए ही नहीं और राम एक “काल्पनिक” पात्र भर है। बदलते वक्त के साथ देश में वह दौर भी आया जब केंद्र की कुर्सी पर भाजपा की अगुवाई वाली एनडीए सरकार बैठी। इसके बाद शुरू हुए राम मंदिर निर्माण के वैधानिक प्रयास।

 

         केंद्र सरकार के निर्देश पर सुप्रीम कोर्ट में राम मंदिर मामले की सुनवाई लगातार हुई और वह दिन भी आया जब केंद्र सरकार ने राम मंदिर के पक्ष में अपना फैसला दिया। इस फैसले ने सालों की देरी से सही पर अयोध्या में भगवान श्री राम की जन्म भूमि पर भव्य राम मंदिर बनाने का मार्ग प्रशस्त कर दिया। देश की सबसे बड़ी अदालत के निर्देश पर अयोध्या में भव्य राम मंदिर का निर्माण हुआ और भाजपा ने राम मंदिर बनाने के संबंध में अपने घोषणा पत्र में जो संकल्प लिया था, उसको पूरा करके दिखा दिया। इसके बाद केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार ने “डबल इंजन” की गति से अयोध्या के विकास को पटरी पर लाकर तेज गति प्रदान की। यही वजह है कि आज अयोध्या एक प्रभावी और जन आस्था से जुड़े धार्मिक पर्यटन केंद्र के रूप में विश्व के मानचित्र पर उभर रहा है। विभिन्न एजेंसियों से जुड़े आंकड़े बताते हैं कि अयोध्या में प्रभु श्रीराम के मंदिर का “दर्शन” करने वाले लोगों की संख्या विश्व विख्यात “ताजमहल” जैसेपर्यटन स्थलों की तुलना में कई गुना ज्यादा रही है।

 

        भारतीय राजनीति में “शासक” से जो अपेक्षा की गई है वह त्रेता युग में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम के शासन राम राज्य से प्रेरित जान पड़ती है। भगवान राम ने राजनीतिक एवं सामाजिक कर्तव्यों के लिहाज से कई आदर्श स्थापित किए। प्रभु श्रीराम ने मर्यादा के पालन के लिए राज्य, मित्र, माता-पिता, यहां तक कि पत्नी का भी साथ छोड़ा। प्रभु श्रीराम का परिवार एक आदर्श भारतीय परिवार का प्रतिनिधित्व करता है और संयुक्त परिवार का एक जीवंत उदाहरण भी है। प्रभु श्री राम द्वारा सामाजिक पारिवारिक एवं राजनीतिक कर्तव्यों तथा मर्यादाओं का पालन करने के कारण ही उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम कहा जाता जाता है। समय के साथ बदलते युग एवं व्यवस्था को भले ही सैकड़ो वर्ष बीत गए हो, लेकिन भारतीय जनमानस में प्रभु श्रीराम आज भी जीवंत हैं और आज के दौर में राजनीति के शिखर पुरुष भी हैं। यही वजह है कि बीते कई दशकों से भारतीय राजनीति प्रभु श्रीराम के इर्द-गिर्द ही घूमती दिखाई पड़ती है और भारत की जनता जनार्दन रामराज्य की “आकांक्षी” भी है।

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