आदि मानव को जब भूख ने सताया तो उसने दूसरे जानवरों का शिकार करके अपना पेट भरा। पेड़ों से फल फूल तोड़कर अपनी भूख मिटाई। घास के बीजों का भक्षण किया और अपनी क्षुधा शांत की मगर घासों के बीज तो हर समय उपलब्ध नहीं थे तो उसने बीजों का संग्रह शुरू किया।
फिर समस्या आई उनके संग्रह की, उनके भंडारण की तो पत्थर के भांडों का आविष्कार हुआ। फिर मिट्टी के बर्तन बनाये गए। लौह युग आया तो मिट्टी के साथ साथ लोहे के भांडे बनाए गए और ताम्र युग आया तो लोहे के बर्तनों का स्थान तांबे के बर्तनों ने ले लिया।
फिर मानव बुद्धिमान होता गया और नई नई धातुएं खोजता चला गया। और उनसे बनाता गया सुंदर सुंदर बर्तन।
गरीबों के हाथ में दिखाई दिए सस्ती धातुओं के बर्तन और अमीरों ने प्रयोग में लिए महंगी धातुओं के बर्तन।
फिर आया अल्युमीनियम, सुंदर सस्ता और टिकाऊ।
आते ही धूम मचा दी। वजन में हल्काख् ऊष्मा का बेहतरीन सुचालक और इसने आते ही किचन में अपना स्थान सुनिश्चित कर लिया। फिर आया आधुनिक मानव।
आधुनिक मानव ने लोहे में कार्बन, निकिल और क्रोमियम मिलाकर बनाया स्टील मगर किचन में पैर पसारे बैठे अल्युमीनियम के बर्तनों को वहाँ से निकाले कैसे?
कुछ तो करना पड़ेगा। तो करो अल्युमीनियम के बर्तनों की बुराई करो। मानव को डराओ। उसे जान का खतरा बताओ। अल्युमीनियम के बर्तनों की इतनी बुराई करो कि आधुनिक मानव डर कर अल्युमीनियम के बर्तन प्रयोग करना कम कर दे। कम क्या कर दे बन्द ही कर दे।
और यह चाल सफल रही। मानव डर गया। चिकने चुपड़े स्टील की बातों में आ गया। उसे लगा कि बस स्टील के बर्तन में न खाया तो सब बेकार अल्युमीनियम की बुराई में क्या कहा गया?
कहा गया कि अल्युमीनियम के बर्तनों में खाना पकाने से खाने के अंदर अल्युमीनियम का अंश आ जाता है जो खाने के साथ डाईजेस्टिव सिस्टम से होता हुआ ब्रेन में पहुंच जाता है और ब्रेन का फंक्शन बाधित कर देता है। डिमेशिया नामक बीमारी हो जाती है।
खूब प्रचार किया गया इसी तरह का। लोग भी खूब डरे। फिर इस विषय पर विस्तृत खोज हुई और वैज्ञानिकों ने यह पाया कि अल्युमीनियम के बर्तनों में खाना पकाने के फलस्वरूप एक दिन में मात्रा 10 मिलीग्राम अल्युमीनियम हमारे शरीर में जाता है जबकि वैज्ञानिक शोध यह बताते हैं कि एक दिन में 100 मिलीग्राम तक भी मानव शरीर में जाये तो कोई समस्या नहीं। तो आधुनिक मानव द्वारा अल्युमीनियम के बर्तनों में खाना पकाने के परिणामस्वरूप अल्युमीनियम का अंतर्ग्रहण उसकी परमिशिबिल लिमिट का मात्रा 10 प्रतिशत था।
अब बात करते हैं स्टील की जो बनाया गया था लोहे में कार्बन, निकिल और क्रोमियम डालकर। ये निकिल और क्रोमियम दोनों तत्व ही टाक्सिक हैं। जैसे अल्युमीनियम के बर्तनों में खाना पकाने से शरीर में अल्युमीनियम चला जाता था उसी तरह स्टील के बर्तनों में खाना पकाने से क्रोमियम अंदर जाता है।
कितना क्रोमियम अंदर जाता है?
स्टील के बर्तनों में खाना पकाने से एक दिन में 45 माइक्रोग्राम तक क्रोमियम अंदर जाता है।
क्रोमियम की सेफ लिमिट क्या है?
क्रोमियम की सेफ लिमिट है 200 माइक्रोग्राम तक। इसका अर्थ यह हुआ कि अल्युमीनियम सेफ लिमिट का 10 प्रतिशत अंदर जाता था तो क्रोमियम सेफ लिमिट का 25 प्रतिशत अंदर जाता है।
अल्युमीनियम का अंतर्ग्रहण भी सेफ लिमिट में ही था और क्रोमियम का भी सेफ लिमिट में ही है तो फिर हंगामा है क्यों बरपा?
अल्जाइमर एसोसिएशन ने अल्युमीनियम पर काफी एक्सपेरिमेंट कराए मगर कोई भी यह साबित न कर सका कि अल्युमीनियम के बर्तनों में पके खाने को खाने से अल्जाइमर या डिमेशिया जैसी बीमारियों का कोई खतरा है।
वह बात अलग है कि मिट्टी के भांडों में पके खाने का स्वाद अलग ही होता है। तो झूठ मूठ की बीमारी से डर कर नहीं बल्कि स्वादिष्ट खाना खाने के लिए लौट आइये मिट्टी के बर्तनों की ओर।
और हाँ, बचपन में अम्मा ने हाकिन्स के प्रेशर कुकर में खाना पकाकर खिलाया जो अल्युमीनियम का था। वर्ष 1998 से सहचरी यूनाइटेड प्रेशर कुकर में खाना पकाकर खिला रही है। ये भी अल्युमीनियम का ही है। मुझे तो अब तक डिमेशिया न हुआ।
एक बात और बता देता हूँ…. ये चाय है न इसकी पत्तियों में अल्युमीनियम खूब होता है। बच के रहिये। और चाय पीने के बाद हुई एसिडिटी को ठीक करने के लिए ये जो एंटासिड खाते हैं, न इसमें भी अल्युमीनियम होता है भारी मात्रा में। और वो जो परफ्यूम लगाते हैं न उसमें भी अल्युमीनियम होता है। सोचिए जनाब क्या क्या छोड़ेंगे।
