हमारे देश में आजकल साधु, सन्त, स्वामी, योगी अनेक पाए जाते हैं। उनके हजारों नहीं, करोड़ों शिष्य हैं। उनके प्रति श्रद्धा, निष्ठा और भक्ति रखने वालों की संख्या तो किसी को पता नहीं है। इन सन्तों के अनेक बड़े-बड़े आश्रम हैं। अनेक सन्तों के नाम से संस्थान हैं, उद्योग हैं।
इन सभी सन्तों के नाम से इनके भक्तों ने संस्थाएं बना रखी हैं। इन संस्थाओं के द्वारा समय समय पर उनके गुणगान करने हेतु अनेक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। ये कार्यक्रम अत्यन्त भव्य होते हैं जिनमें लाखों रूपए खर्च होते हैं। बहुत से सन्त अपने आश्रमों से मासिक-पाक्षिक पत्रिकाएं प्रकाशित करते हैं जिनके मुख्य पृष्ठ से लेकर अन्तिम पृष्ठ तक उन्हीं के फोटो, भाषण, उद्गार, क्रिया कलाप, उनका प्रभाव और उनके नाम का जादू प्रकाशित होता है।
जितने भी कथावाचक हैं, वे सब भी सन्त, महात्मा कहला रहे हैं। वे भी कथा कहते हुए अपने सन्तत्व की घोषणा करते हैं। भारत जैसे देश में जहाँ की जनता धर्मप्राण मानी जाती है, यह सब होना स्वाभाविक है। अभी कहते हैं कि कलियुग चल रहा है। कलियुग में सामान्य मान्यता यह है कि साधु सन्त कम ही पाए जाते हैं। कहते हैं कि इस कलिकाल में भ्रष्ट, पाखण्डी साधु ही अधिक होते हैं जो नागरिकों को धर्म के भ्रमजाल में फंसा कर भटका देते हैं। वे आम आदमी का शोषण करते हैं और धर्म के मायाजाल में फंसा व्यक्ति अंधभक्ति में पड़े बिना किसी शक के भक्ति भाव से अपना शोषण होते देख कर भी चुप रहता है, तब कभी-कभी यह लगता है कि यह आम आदमी ही वास्तविक सन्त है।
उपरोक्त वर्णन करने का कारण यह है कि आज कल सन्त-साधुओं के आश्रम की अपराध कथा जग प्रसिद्ध हो रही है। प्रसिद्ध साधु-सन्त बलात्कार, हत्या और अन्य अपराधों में फंसते दिख रहे हैं। नारी आकर्षण और नारी देह शोषण की कहानियां हवा में तैर रही हैं। कोई नहीं जानता कि सच्चाई क्या है किन्तु हमारे सारे शास्त्रा एक मत से यह घोषणा करते हैं कि साधु-सन्तों को दुनिया मायावी क्रिया-कलापों से दूर रहना चाहिए। उन्हें प्राणी मात्रा के कल्याण के प्रति सजग रहना चाहिए। परोपकार करने में आगे रहना चाहिए किन्तु पक्षकार बन कर नहीं। यदि वे एक पक्षीय बन गए तो सामान्य व्यक्ति और उनमें भेद केवल कपड़ों का रह जाएगा और वे पाखण्डी बन जाएंगे।
ऐसा क्यों होता है। वास्तव में ईश्वर की माया इतनी प्रबल होती है कि उससे छुटकारा है ही नहीं। केवल भगवद् कृपा से ही यह सम्भव हो पाता है। हमारे शास्त्रों में जो कथाएं हैं वे कहती हैं कि हजारों वर्ष की तप साधना के बाद ही कोई उस माया से छुटकारा पाता है। कई जन्मों के कर्मफल मिटने के बाद मुक्ति मिलती है। श्रीमद भगवद्गीता मुक्ति का मार्ग बताती है। कहा गया है कि जो सदगुरू है जिसने मुक्ति का मार्ग जान लिया है, वह अपने शिष्य को मुक्ति का मार्ग दिखा कर मुक्त करवा सकता है। इसलिए जीवन में मुक्त होने के लिए एक सदगुरू आवश्यक है। सदगुरू मिलना ही कठिन है।
शास्त्रों में तो यहाँ तक कहा गया है कि सदगुरू स्वयं योग्य शिष्य की खोज में रहता है। जैसे ही योग्य शिष्य मिलता है, सदगुरू उसे मुक्ति का मार्ग दिखा कर प्रेरित करता है। श्री राम कृष्ण परमहंस की जीवन गाथा जिन्होंने पढ़ी है वे जानते हैं कि उन्होंने कितने परिश्रमपूर्वक स्वामी विवेकानन्द को साधा और उन्हें वे विशेष प्रयोजन के लिए आध्यात्म के रास्ते ले गए। दुनिया में उन्होंने अध्यात्म और अपने गुरू का प्रकाश फैलाया।
पवित्र ग्रन्थ बाइबिल बताती है कि प्रभु इशू के अन्तिम समय तक केवल बारह शिष्य थे, इसलिए सदगुरू जब भी शिष्य बनाते हैं वे उसकी योग्यता को ठोक बजा कर देखते हैं। वे एक दिन में हजारों शिष्य बना कर शिष्यों का मजमा इकट्ठा नहीं करते।
प्रदर्शन-नाटकबाजीः
वास्तव में जो संत-महात्मा, साधु करोड़ों शिष्य बना रहे हैं-वे प्रदर्शन और नाटकबाजी द्वारा अपना प्रभाव जमाना चाहते हैं। उन्हें शिष्यों की साधुता से कोई लेना देना नहीं। वे अपने प्रभाव क्षेत्रा की वृद्धि चाहते हैं। साधु का चोला और आश्रम तो प्रभुता और समृद्धि का मार्ग महज कुछ धनराशि में मिल जाता है। उस पर कोई नियंत्राण नहीं होता। वह महात्मा की जय जयकार करता रहता है। वह मिलावट करे, रिश्वत खाए, झूठ बोले, हिंसा करे उसे रोकने वाला कौन है। इसलिए देश में महात्मा, साधु और स्वामी भरपूर हैं किन्तु अध्यात्म का कोई प्रभाव नहीं है। सदगुणों का अभाव ज्यांे का त्यों है। नैतिकता मुँह छिपाती फिर रही है।
गुरू शरीर नहीं होताः
कोई साधु-सन्त, योगी शरीर नहीं होता। शरीर तो मरणशील है। गुरू या संत कभी मरते नहीं। गुरू तो तत्व होता है। गुरू का तत्व सदा बना रहता है। इस संबंध में स्वामी रामसुखदासजी जो कहते हैं, उस पर मनन कीजिए ‘गुरू शरीर नहीं प्रत्युत तत्व होता है। अतः सच्चे गुरू अपना पूजन ध्यान नहीं करवाते। सच्चे सन्त अपनी आज्ञा का पालन भी नहीं करवाते प्रत्युत यही कहते हैं कि गीता, रामायण आदि ग्रन्थों का पालन करो।’
आज के तथाकथित गुरू अपने फोटों तक का पूजन कराते हैं। वे फोटो लाकेट में लगाकर गले में डलवा कर प्रसन्न होते हैं। जैसा उपर लिखा जा चुका है वे अपने आश्रम की पत्रिका में अपने ही भाषण व फोटो रंगीन प्रकाशित कराते हैं। दूरदर्शन भी उनके प्रचार का माध्यम है। ऐसे गुरूओं के संबंध में क्या कुछ कहा जाए पर ऐसे गुरू के संबंध में स्वामी रामसुखदास जी जो कहते हैं, उस पर ध्यान दीजिए।
‘‘जो गुरू अपना फोटो देते हैं। उसको गले में धारण करवाते हैं, उसकी पूजा और ध्यान कराते हैं – वे धोखा देने वाले होते हैं।’’
जो अपनी पूजा कराए वह ‘भगवद् द्रोही’ होता है। हाड़ मास के शरीर की पूजा एक अच्छा मजाक है।
गुरू बनाने की सावधानी:
आज के प्रचार तंत्र में हर कोई झूठ और फरेब के आवरण में आकर्षक लग सकता है। इसलिए गुरू बनाते समय विशेष सावधानी की आवश्यकता है। चार आने की मिट्टी की हंडिया खरीदते समय हम ठोक बजा कर देखते हैं, तब जीवन भरके लिए गुरू बनाते समय जल्दबाजी क्यों? यदि हमने जल्दबाजी की तो एक दिन पछताना पडे़गा जब पता चलेगा कि गुरू तो बलात्कारी निकला, हत्यारा निकला। ऐसी स्थिति में हम सिर्फ हाथ मलते रह जाएंगे। आदमी का कोई भरोसा नहीं है। बडे़-बडे़ ऋषि-मुनि वन प्रदेश में रहते हुए भटक गए हैं। माया के जंजाल में फंस गए हैं तब आधुनिक शरीरधारी कलियुगी सन्त के मामले में सावधानी बर्तनी आवश्यक ही नहीं अनिवार्य है।
ऐसा नहीं है कि आज वास्तविक सन्त-महात्मा न हो। अवश्य होंगे। हमें खोजना अवश्य पड़ेगा। वे नेता-अभिनेता की तरह प्रचार करते नहीं मिलेगे। हो सकता है ऐसे संत आपको खोज रहे हो क्योंकि हर उत्तम गुरू को उत्तम शिष्य की खोज रहती है।
गुरूतत्व का पूजन करना चाहिए। गुरूतत्व आचरण में उतारना ही गुरू का पूजन है। व्यक्ति पूजन तो हमें पाखण्ड की ओर ले जाता है। अच्छे आचरण से मनोबल बनता है। मनोबल से सफलता मिलती है। सफलता से शान्ति मिलती है। यदि असफलता भी कभी हमें मिले तो फिर घबराहट नहीं होती। वह असफलता भी बहुमूल्यवान होती है क्योंकि उससे अनुभव प्राप्त होता है जो आगे हमें सफल बनाता है। हम सन्तुष्ट रहते हैं।
साधु होना ईमानदार होना है। धर्मशील होना है। सज्जन और सच्चरित्र होना है। पापहीन होना है। यही है आध्यात्म का मार्ग। पूजन करना, ध्यान इस दिशा में आगे बढ़ने के साधन है। असली लक्ष्य जो साधुता की ओर कदम बढ़ाना है। ये कदम तभी सार्थक होंगे जब हम परोपकार, सेवा, त्याग, प्रेम-अहिंसा व सत्य के मार्ग पर चलेंगे। साधुता जीवन में उतरे तो ही आनन्द प्राप्त होगा। केवल नाम व मंत्रा सुनना पर्याप्त नहीं है।
आधुनिक गुरूओं से सावधान रहना आवश्यक है। वहाँ पाने को कुछ नहीं है भटकने को सम्पूर्ण जीवन पड़ा है।
