मदुरै (तमिलनाडु), तीन मार्च (भाषा) मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै पीठ ने प्रशासन को सुझाव दिया है कि अदालत द्वारा नामित पांच लोगों को तिरुप्परनकुंद्रम पहाड़ी के ऊपर पत्थर के खंभे के पास 15 मिनट के लिए प्रतीकात्मक प्रार्थना करने के लिए जाने की अनुमति दी जाए।
दीपाथून (पत्थर का स्तंभ) के ऊपर कार्तिगई दीपम जलाने के अपने पहले के आदेश का पालन न करने के लिए दायर अवमानना याचिका पर सुनवाई करते हुए, अदालत ने कहा कि अगर सरकार अदालत के पहले के आदेशों का सम्मान करना चाहती है तो सांकेतिक प्रार्थना (दीपक न जलाना) की इजाजत दी जा सकती है।
न्यायमूर्ति जी आर स्वामीनाथन की पीठ ने यह भी कहा कि राज्य के खनिज और खान मंत्री एस रेगुपति ने तिरुप्परनकुंद्रम मुद्दे को “एक शरारतपूर्ण राजनीतिक मोड़” दिया था, जब उन्होंने कहा कि सरकार दीपाथून पर कार्तिगई दीपम जलाने की इजाजत नहीं देगी।
मदुरै के कलेक्टर के जे प्रवीण कुमार ने एक और हलफनामा दायर करते हुए कहा था कि उन्होंने एक दिसंबर, 2025 को निषेधाज्ञा इसलिए जारी की थी ताकि कानून व्यवस्था बिगड़ने की स्थिति न बने। उन्होंने कहा कि ऐसा मंदिर के अधिकारियों को पत्थर के खंभे पर दीप जलाने के उच्च न्यायालय के आदेश को लागू करने में रुकावट पैदा करने के लिए नहीं किया गया था।
न्यायमूर्ति स्वामीनाथन ने इस पर दो मार्च को कहा, “मेरा सुझाव है कि इस अदालत के आदेश के प्रति सम्मान, इस अदालत द्वारा नामित पांच लोगों के समूह को पहाड़ी की निचली चोटी पर जाने की इजाजत देकर दिखाया जा सकता है, जहां दीपाथून है, ताकि प्रतीकात्मक प्रार्थना की जा सके।”
उन्होंने कहा, “मैं आगे यह भी कहना चाहता हूं कि इस पूरी प्रक्रिया को 15 मिनट तक सीमित किया जा सकता है। यह सिर्फ एक सुझाव है, कोई निर्देश नहीं।”
अदालत के अनुसार पुलिस ने कलेक्टर की निषेधाज्ञा के पीछे “आश्रय” लिया और यह स्पष्ट किया कि वे सिर्फ कलेक्टर के आदेश को लागू कर रहे थे। न्यायाधीश ने मामले की आगे की सुनवाई चार मार्च तक के लिए स्थगित कर दी।
साथ ही, उन्होंने इस मुद्दे पर रेगुपति के कथित बयानों के लिए उनके खिलाफ अवमानना की कार्रवाई शुरू करने के अनुरोध वाली उप-याचिका को बंद कर दिया और इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि “रेगुपति ने घटनाओं को एक शरारतपूर्ण राजनीतिक मोड़ दिया है। कलेक्टर की निषेधाज्ञा अवमानना का काम है या नहीं, यह अदालत की कार्यवाही का विषय है। न्यायालय में मामले के विचाराधीन होने का नियम लागू होगा। मंत्री को यह बात ध्यान में रखनी चाहिए।”
न्यायमूर्ति स्वामीनाथन ने साफ किया कि अगर जरूरत पड़ी तो वह उप-याचिका को फिर से खोलने में हिचकिचाएंगे नहीं।