बोध कथा – प्रेरणा स्रोत

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वह धर्मशाला (हि. प्र.) की जेल में लाला लाजपत राय के साथ बन्दी थे।  उन्होंने बताया कि गोरी सरकार ने उन्हें पहले पहल 1920 में बंदी बनाया तो अनेक अमानवीय यातनाएं भी दीं। वह बार-बार कारागार में डाले जाते रहे। उन्हें कई कई रातें सोने न दिया जाता। घंटों ठंडे पानी में खड़ा होने, डुबकियां लगाने को विवश किया जाता। सर्दी की रातों में बर्फ की सिल्लियों पर लेटने को विवश किया जाता मगर उन्होंने भारत मां की स्वतंत्राता की रट नहीं छोड़ी। वह सब सुन कर शेरे पंजाब की आखों से भी आंसू निकल आए।
कांगड़ा के डाडासिब्बा गांव में 11 जुलाई 1882 को जन्मे इस बालक का नाम कांशीराम रखा गया। तत्कालीन प्रचलित बाल विवाह कुरीति के कारण उन्हें नौ वर्ष की आयु में सरस्वती देवी नामक नन्हीं बच्ची के साथ विवाह बंधन में बांध दिया गया। अभी बालक की आयु मात्रा ग्यारह वर्ष थी कि पिता लखजु राम  नहीं रहे। अगले ही वर्ष माता रेवती देवी स्वर्ग सिधार गई।
गए तो थे पढ़ने के लिए लाहौर, मगर वहां क्रांतिकारियों ने उनके दिल में देशभक्ति की ऐसी अलख जगाई कि जीवन भर यह ज्योति बुझ न सकी। वह वहां लाला हरदयाल और सरदार अजीत सिंह के साथ मिल कर काम करने लगे। सन् 1905 में कांगड़ा में भीषण भूकम्प आया तो उन्हें वापिस आना पड़ा।
पगड़ी संभाल जट्टा को जगजीत सिंह ने प्रेरणा सूत्रा बना दिया और वह भी इस संदेश को गांव-गांव पहुंचाने लगे। जब 23 अप्रैल 1931 को ज़ालिम अंग्रेजों ने सरदार भगतसिंह, राजगुरू तथा सुखदेव को फांसी दी तो देश  की आज़ादी के संकल्प को इस युवक ने दोबारा दोहराया, अनेक सभाएं की। अनेक बार जेल यात्राएं की। इनके बच्चों को पीटा गया। भूखा रखा गया। सारी सम्पत्ति कुर्क कर दी। परिवार बेघर हो गया। पत्नी बीमार पड़ी। उपचार नहीं हुआ, दम तोड़ गई, मगर वीर कांशी राम ने हिम्मत नहीं हारी। वह वीर रस की कविताएं उपन्यास आदि भी लिखते व सुनाते रहे।
15 अक्तूबर 1943 को स्वतंत्रता की चाह मन में लिए कांशीराम इस दुनिया से विदा हो गए। उनके जीवन काल में, उन की देशभक्ति को देख कर पं. जवाहर लाल ने उन्हें ‘पहाड़ी गांधी‘ की उपाधि दी। उनके गीत, संगीत तथा देशप्रेम को देख कर भारत कोकिला सरोजनी नायडू ने उन्हें बुलबुले पहाड़ की उपाधि दी। ऐसे महान व्यक्तित्व के स्वामी हमारे लिए सदा प्रेरणास्रोत बने रहेंगे।

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