आजकल सर्दी जा रही है, गर्मी आ रही है। सुबह शाम को ठंड और दोपहर में गर्मी पड़ रही है जिससे लोग लापरवाही बरतने लगते हैं। ऐसे में लोग कई प्रकार के संक्रमण व बीमारी से परेशान हो जाते हैं।
गले में खराश, खांसी और दर्द रहना आम समस्या है पर इससे निबटना उतना आसान नहीं है। कई बार यह समस्या सालों तक परेशान करती है। समय पर ध्यान न देने से आवाज की गुणवत्ता पर भी असर पड़ने लगता है। इस संक्रमण से लड़ने के लिए मात्रा एंटीबायोटिक दवाओं पर भरोसा करना ठीक नहीं है।
पिछले कुछ सालों में ऐसे लोगों की संख्या तेजी से बढ़ी है जो अक्सर गले के संक्रमण से परेशान रहते हैं। मौसम में बदलाव का समय विषाणुओं की उत्पत्ति के अनुकूल होता है। यही वजह है कि इस समय गले का संक्रमण तेजी से फैलता है। अक्सर लोग खुद ही एंटीबायोटिक दवाएं लेना शुरू कर देते हैं जो वायरस के कारण हुए संक्रमण में बेअसर साबित होती हैं।
अधिक भीड़-भाड़ व प्रदूषण के बीच रहना भी गले के संक्रमण की आशंका बढ़ा देता है। गले का संक्रमण अपने साथ कुछ समस्याएं भी लेकर आता है, जैसे नाक बंद होना या बहना, छींकें आना, सांस लेने में कठिनाई होना, खांसी आना, गहरी सांस लेने में मुश्किल होना आदि। गले के संक्रमण को दो आधारों पर बांटा जा सकता है। पहला, संक्रमण के कारण गले का कौन-सा हिस्सा प्रभावित है। इस आधार पर तीन तरह के संक्रमण होते हैं, फैरिंजाइटिस, टान्सिलाइटिस और लैरिंजाइटिस।
फैरिंजाइटिस में पूरे गले पर असर पड़ता है। गले में दर्द के साथ खाना निगलने में भी दिक्कत होती है। टान्सिलाइटिस में टान्सिल्स में सूजन होने के साथ गले और जबड़ों के आसपास के हिस्से में दर्द होता है। लैरिंजाइटिस में वायस बाक्स लैरिंक्स प्रभावित होता है जिससे आवाज भारी हो जाती है, गला बैठ जाता है या फिर दर्द के साथ खांसी होती है। लंबे समय तक उपेक्षा करने से आवाज प्रभावित होने लगती है। संक्रमण के दूसरा कारण क्या हैं ? वायरस, बैक्टीरिया और एलर्जी इसकी प्रमुख वजह हैं।
एलर्जी –
इसमें व्यक्ति के एलर्जी करने वाले तत्वों के संपर्क में आने पर ही गला खराब हो जाता है। अगर एलर्जी किसी विशेष खाद्य पदार्थ या परफ्यूम से है तो परहेज करना आसान होता है पर धूल, प्रदूषण, धुएं या मौसम के बदलाव के कारण होने वाले संक्रमण से बचना मुश्किल होता है। आपको किससे एलर्जी है, यह जानने के लिए अपनी गतिविधियों को नोट करना जरूरी है। अपने खान-पान और कपड़ों के फेब्रिक आदि बातों पर भी ध्यान दें। कई दिन तक ऐसा करने से एलर्जी करने वाले कारकों को पहचानना और उनसे बचना आसान हो जाएगा। यूं एलर्जी से जुड़े टेस्ट भी होते हैं। कई बार इसकी वजह आनुवंशिक भी होती है।
एसिड रिफ्लक्स –
बार-बार होने वाले एसिड रिफ्लक्स (खाना खाने के बाद फूड पाइप के जरिये उसका मुंह की तरफ वापस आना) से भी गले में संक्रमण हो सकता है। इसके लिए खान-पान में बदलाव करना जरूरी है। थोड़े-थोड़े अंतराल पर कम-कम खाना, मसालेदार और तला-भुना खाने से बचना, नियमित व्यायाम करना, रात में खाने और सोने के बीच कम से कम दो से तीन घंटे का अंतर रखना और बेड पर सिरहाना ऊंचा करके सोना फायदेमंद साबित होता है। इनसे एसिड रिफ्लक्स की समस्या कम हो जाती है।
आवाज पर असर-
गले के संक्रमण के कारण यदि आवाज पर असर पड़ रहा है तो सावधान हो जाएं और किसी अच्छे चिकित्सक से संपर्क करें। खूब सारा पानी पीने के अलावा गले को आराम देना जरूरी है। अधिक चिल्लाने, गाने, लगातार बात करने और धीरे-धीरे बोलने से बचना चाहिए।
खुद से दवाएं लेने से बचें –
गले के संक्रमण के ज्यादातर मामलों में होमियोपैथिक चिकित्सा बहुत कारगर है।
गले के संक्रमण में थ्रोट पैक भी फायदा पहुंचाता है। इसके तहत गले को गर्म कपड़े का सेंक दिया जाता है। फिर 2-2.5 फुट लंबाई वाले सूती कपड़े को ठंडे पानी में भिगोने के बाद निचोड़ कर गले पर लपेट कर उसके बाहर एक घंटे तक मफलर लपेटा जाता है। ऐसा करने से धीरे-धीरे रोग प्रतिरोधक क्षमता में सुधार आता है।
अनियमित जीवनशैली की वजह से जो रोग खतरनाक रूप ले रहे हैं, उनमें गले का संक्रमण भी एक है। एक ओर लंबे समय तक अनियमित दिनचर्या के कारण दवाओं का असर जल्दी नहीं होता, साथ ही साल भर जुकाम, बंद नाक, खांसी और गले में कफ जमने जैसी समस्याओं से जूझना पड़ता है। इन पर विराम लगाने के लिए खान-पान पर नियंत्राण रखना जरूरी है। कफ बनाने वाले खाद्य पदार्थ, जैसे दूध व दूध से बने उत्पाद, चीनी, तली हुई चीजें, केला, चावल, आलू आदि से परहेज करना चाहिए।
होमियोपैथी में गले के संक्रमण का अच्छा व स्थायी उपचार है। पारंपरिक उपचार केवल लक्षणों को रोकती है. इसके दुष्प्रभाव भी हैं। होमियोपैथी लक्षणों पर दबाने पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय, अंदर से रोग को बाहर निकालने पर केंद्रित होती है।सभी होम्योपैथिक उपचार धीरे-धीरे आपकी बीमारी का इलाज करते हैं और इसका कोई दुष्प्रभाव नहीं होता है। इसकी 200 से भी ज्यादा दवाएं होती हैं। इस चिकित्सा पद्धति के तहत मरीज को लक्षणों के आधार पर दवाएं दी जाती हैं। अक्सर एक ही बीमारी वाले दो मरीजों को भी अलग-अलग दवाएं दी जाती हैं, इसलिए किसी एक व्यक्ति को दी हुई दवाएं दूसरे व्यक्ति को नहीं लेनी चाहिएं।
आम धारणा यह है कि होमियोपैथिक दवाएं देर में असर करती हैं जबकि ऐसा नहीं है। शुरुआती दौर में ही उपचार प्रारंभ करवाने पर यह समस्या शीघ्र ठीक हो जाती है। थोड़ा समय देने पर गंभीर हो चुकी समस्या को भी ठीक किया जा सकता है। गले के संक्रमण पर भी यही बात लागू होती है।
इनका रखें ध्यान-
भींगी हुई 4-6 दाने किशमिश खाएं, लहसुन खाएं,अधिक मसालेदार खाने से बचें। गर्म पानी की भाप लें। गरम नींबू पानी या नींबू की चाय से दिन की शुरुआत करें। टहलने की आदत डालें और टहलते समय गहरी सांस लें,संक्रमण होने पर गले को आराम दें, चिल्लाने और लगातार बात करने से बचें। दिन में 3-4 बार गुनगुने पानी से गरारे करें। इससे रक्त संचार में सुधार होता है और कफ बाहर निकलता है।
– उबली सब्जियां, सूप, रसम आदि गर्म चीजें लें।
– किसी भी प्रकार का नशा करने से बचें।
