बहरों को आवाज़ सुनाती,इंकलाब की एक अनुगूंज – शहीद ए आजम भगत सिंह

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बहरों को सुनाने के लिए धमाके ज़रूरी हो जाते हैं, क्रांति तलवार की धार से नहीं बल्कि धारदार विचारों से आती है और इंकलाब ज़िंदाबाद तथा सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है जैसी जोशीली उक्तियां जब कानों में पड़ती हैं तब याद आते हैं शहीद ए आज़म कहे जाने वाले सरदार भगत सिंह। 

 

लेकिन भगत सिंह को याद करना इस देश में अक्सर एक सुरक्षित कर्मकांड में बदल दिया गया है। फोटो पर माल्यार्पण, दो-चार नारे, और फिर वही यथास्थिति। जबकि सच यह है कि भगत सिंह की स्मृति जितनी असुविधाजनक है, उतनी ही जरूरी भी। 23 मार्च 1931 को लाहौर जेल में दी गई उनकी फांसी केवल एक युवा क्रांतिकारी की हत्या नहीं थी; वह औपनिवेशिक सत्ता के खिलाफ सबसे तीखी वैचारिक चुनौती को खत्म करने की कोशिश थी और शायद इसीलिए आज भी उनके विचारों से ज्यादा उनके चित्रों को सुरक्षित रखा जाता है।

 

  भगत सिंह का जीवन किसी रोमांटिक क्रांतिकारी कथा से अधिक एक बेचैन बुद्धिजीवी की यात्रा है। जलियांवाला बाग हत्याकांड ने उनके भीतर जो ज्वाला पैदा की, वह प्रतिशोध भर नहीं थी; वह एक ऐसे समाज की तलाश थी जहां सत्ता नागरिकों से डरती हो, न कि नागरिक सत्ता से। किशोर भगत का खेतों से खून सनी मिट्टी उठाना केवल भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि एक वैचारिक दीक्षा थी—अन्याय के खिलाफ असहमति का पहला पाठ।

   हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन से    जुड़कर उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि उनकी लड़ाई केवल अंग्रेजों से नहीं, बल्कि शोषण की हर संरचना से है। यही कारण है कि वे कार्ल मार्क्स और लेनिन को पढ़ते हैं, और क्रांति को केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि सामाजिक-आर्थिक पुनर्गठन के रूप में परिभाषित करते हैं। आज जब “देशभक्ति” को नारे और प्रदर्शन में सीमित कर दिया गया है, भगत सिंह की यह वैचारिक कठोरता असहज करती है।

 

   सांडर्स हत्याकांड और केंद्रीय विधानसभा बम कांड को अक्सर केवल हिंसक घटनाओं के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, जबकि उनके पीछे की राजनीतिक रणनीति को सुविधाजनक ढंग से भुला दिया जाता है। असेंबली में फेंका गया बम जान लेने के लिए नहीं, बल्कि “बहरों को सुनाने” के लिए था—यह वाक्य आज भी उतना ही प्रासंगिक है, क्योंकि सत्ता के कान आज भी उतने ही बहरे हैं, बस मंच बदल गए हैं।

 

   जेल में उनका रूप और अधिक ख़तरनाक हो जाता है—क्योंकि वहां वे बंदूक नहीं, विचार गढ़ रहे थे। “मैं नास्तिक क्यों हूं” जैसा लेख केवल आस्था पर सवाल नहीं उठाता, बल्कि अंधभक्ति की पूरी संस्कृति को चुनौती देता है। उनका भूख हड़ताल केवल कैदियों के अधिकारों की लड़ाई नहीं, बल्कि यह घोषणा थी कि मनुष्य की गरिमा किसी भी सत्ता से बड़ी है। आज जब जेलें फिर से विचारधारा के आधार पर भरी जा रही हैं, भगत सिंह की जेल डायरी एक आईना बनकर खड़ी है।

 

   उनकी फांसी को लेकर जो विवाद हैं, वे भी कम असुविधाजनक नहीं। महात्मा गांधी और गांधी-इरविन समझौता के संदर्भ में यह सवाल बार-बार उठता है कि क्या भगत सिंह को बचाया जा सकता था। राजगुरु और सुखदेव के साथ उनकी फांसी ने एक पूरी पीढ़ी को झकझोर दिया था। लेकिन शायद इससे भी बड़ा सच यह है कि भगत सिंह खुद दया याचना के पक्ष में नहीं थे—वे अपनी मृत्यु को एक राजनीतिक हस्ताक्षर बनाना चाहते थे। यह एक ऐसा आत्मविश्वास है, जो आज की राजनीति में दुर्लभ ही नहीं, लगभग गायब है।

   आज के भारत में भगत सिंह की प्रासंगिकता सबसे ज्यादा इसलिए है क्योंकि उन्हें सबसे ज्यादा गलत समझा गया है। उन्हें केवल “इंकलाब जिंदाबाद” के नारे तक सीमित कर दिया गया, जबकि वे उस नारे के अर्थ को बदलना चाहते थे। उनके लिए इंकलाब का मतलब था—समानता, वैज्ञानिक सोच, और सत्ता के प्रति सतत संदेह। आज जब असहमति को देशद्रोह और प्रश्न को अपराध बना दिया जाता है, भगत सिंह का पूरा जीवन इस प्रवृत्ति के ख़िलाफ़ खड़ा दिखाई देता है।

 

    यह भी एक विडंबना है कि जिस क्रांतिकारी ने सांप्रदायिकता को सबसे बड़ा खतरा बताया, उसी के नाम पर आज विभाजनकारी राजनीति की जाती है। जिस व्यक्ति ने कहा कि “क्रांति की तलवार विचारों की सान पर तेज होती है”, उसे आज विचारविहीन नारों में समेट दिया गया है। यह केवल स्मृति का सरलीकरण नहीं, बल्कि इतिहास के साथ अन्याय है।

 

    भगत सिंह की शहादत हमें भावुक होने के लिए नहीं, असहज होने के लिए मजबूर और प्रेषित करती है। वह पूछती है—क्या हमने सच में आज़ादी को समझा? क्या यह वही देश है, जिसके लिए एक 23 साल का युवक हंसते-हंसते फांसी पर चढ़ गया? और सबसे ज़रूरी सवाल—क्या हम उस विरासत के साथ ईमानदार हैं, जिसे हम हर साल याद करने का दावा करते हैं?

 

   अगर इन सवालों से हम बचते हैं तो भगत सिंह को याद करना एक औपचारिकता भर है। लेकिन अगर हम इनसे टकराते हैं, तो शायद कहीं न कहीं इंकलाब की वह अनुगूंज फिर सुनाई देने लगे,जो सत्ता को असहज करती है और समाज को जागृत। और आज यही समय की सबसे बड़ी ज़रूरत और मांग भी है। 

 

    यह ध्यान में रहना चाहिए कि सत्ता कितनी भी अच्छी क्यों न हो यदि उसका केवल गुणगान किया जाएगा तो वह पथ भ्रष्ट होकर लोकतंत्र एवं विरोध के स्वर को कुचलने पर उतर आती है और इसी प्रवृत्ति के विरोध का दूसरा नाम से भगत सिंह। अराजकता पैदा करने के लिए नहीं बल्कि बदलाव और अधिकारों की रक्षा के रूप में भगत सिंह को पुण्यांजलि देना आज संवत है सबसे बड़ा पुण्य का कार्य होगा। 

 

 डॉ. घनश्याम बादल

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