मुंहासे- किशोरावस्था की पीड़ा

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सौंदर्य शास्त्र में त्वचा का महत्त्वपूर्ण स्थान है। त्वचा का संुदर, सुकोमल, स्निग्ध, बिना दाग धब्बे व तेजयुक्त रहना सौंदर्य में चार चांद लगाता है परंतु यही चेहरे की त्वचा मुंहासे युक्त हो जाए तो किशोरावस्था का सौंदर्य ही बिगड़ जाता है, अतः मुंहासे सौंदर्य व स्वास्थ्य की दृष्टि से हानिकारक हैं।
आज का अधिकांश किशोर वर्ग इस तकलीफदेह समस्या से ग्रस्त है, इस कारण आयुर्वेद में इसे तारूण्य पीटिका भी कहते हैं। मुंहासों की योग्य चिकित्सा नहीं करने पर चेहरे पर हमेशा के लिये काले धब्बे व गड्डे पड़ जाते हैं।
12-14 वर्ष की आयु या युवावस्था में शरीर में कुछ विशेष प्रकार के हार्मोन्स बनते हैं। इन हार्मोन्स के कारण तैल ग्रंथियां अधिक मात्रा में स्राव करती हैं व स्राव जमा होने से कीटाणु आदि से संक्रमित होकर मुंहासे निर्मित होते हैं।
आयुर्वेदानुसार अति उष्ण, तीक्ष्ण, कटु रस वाले आहार का अधिक सेवन व क्रोधादि की अधिकता ही इसका कारण है। आज का युग फास्ट फूड का युग है। आहार में गड़बड़ी, खान-पान में चाट पकौड़ी, समोसा, पानीपूरी, नूडल्स इत्यादि चाइनीज व्यंजनों का समावेश है। इसके साथ ही जीवन भागदौड़ युक्त हो गया है। असमय सोना, उठना जिदंगी का हिस्सा बन गया है।
आयुर्वेदानुसार मुंहासे पित्त व कफ दोष प्रधान व्याधि हैं। दूषित कफ, पित्त, रस, रक्त व मेद धातु को दूषित कर त्वचा पर मुंहासों के रूप में दृष्टिगोचर होते हैं। मुख्यतः कब्ज से पीडि़त व्यक्ति मुंहासे के शिकार होते हैं, अतः पाचन संस्थान की विकृति भी मुंहासों को जन्म देती है। किसी-किसी तरूणी को मासिक धर्म के साथ मुंहासों का कष्ट होता है तो कभी अति रक्तस्राव व मासिक स्राव अत्यल्प होने की वजह से भी मुंहासे होते हैं। मुंहासे खूबसूरती की धज्जियां उड़ा देते हैं।
आज का युवा वर्ग मुंहासों के निवारण हेतु न जाने कितनी एंटीबायटिक, क्रीम, लेप लगाते हैं, कई नुस्खे आजमा चुके होते हैं पर स्थायी लाभ के लिए इधर-उधर भटक रहे हैं। तो क्यों न हम देसी इलाज द्वारा मुंहासों को ठीक करें क्योंकि इन देसी दवाइयों से रोग जड़ से समाप्त हो जाता है और स्थायी लाभ मिलता है, साथ ही इसके कोई साइड इफेक्ट्स भी नहीं हैं। आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति में मूल कारणों की चिकित्सा की जाती है।
दरअसल मुंहासों की चिकित्सा कारणानुरूप होनी चाहिए। इसके लिए उपचार क्रम के अंतर्गत आता है आहार पर नियंत्राण। भोजन में सादा, सात्विक व प्राकृतिक आहार लेना श्रेयस्कर है। मसालेदार पदार्थों, चाय, काफी व खटाई का पूर्णतः त्याग करना चाहिए। दिन में अधिकाधिक पानी पिएं व नित्य फलों का रस सेवन करें। साथ ही चेहरे को नित्य स्वच्छ रखें।
औषधि के अंतर्गत गंधक रसायन, आरोग्यवर्धिनी, कामदूधा रस, कैशोर गुग्गुल सुबह-शाम महामंजिष्ठादि काढ़ा 2 चम्मच के साथ 3 माह तक लें। मुंहासों के साथ कब्ज होने पर अभयारिष्ट 2 चम्मच सुबह-शाम भोजनोत्तर व निरोगी चूर्ण 2 चम्मच रात को सोते समय लेना चाहिए। लेप के लिए सारिवा, चंदन, संतरे की छाल, नागरमोथा समभाग चूर्ण लेकर घृतकुमारी के गूदे के साथ मिला कर लगाएं। इसके पहले नींबू के छिलके से चेहरा साफ करें। अतः उक्त चिकित्सा योग्य सौंदर्य आयुर्वेदिक विशेषज्ञ के मार्गदर्शन में लेने से मुंहासे व उनके दाग दूर होकर त्वचा आकर्षक व सौंदर्य युक्त होती है।
औषधि चिकित्सा के अलावा वमन, विरेचन प्रक्रिया के परिणाम मुंहासे व अन्य त्वक् विकारों जैसे एक्जि़मा, सोरिएसिस, श्वेत कुष्ठ में सर्वोत्तम पाए गए हैं। वमन, विरेचन कर्म से कफ पित्त दोष साम्यावस्था में आकर हार्मोन संतुलित होकर मुंहासों से मुक्ति मिलती है।
इस प्रकार आहार नियंत्राण, नियमित योगासन-प्राणायाम का अभ्यास, आयुर्वेदिक औषधि व पंचकर्म क्रिया आयुर्वेदिक सौंदर्य विशेषज्ञ के मार्गदर्शन में करने पर मुंहासों से छुटकारा पाया जा सकता है।

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