प्राकृतिक विधियों से ही हम स्वस्थ रह सकते हैं

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प्रकृति द्वारा निर्मित यह मशीन मानव शरीर सर्वाधिक सूक्ष्म और जटिल है। इसकी एक विशेषता यह भी है कि छोटी-छोटी खराबियों को यह स्वतः ठीक कर लेती है। बड़ी-बड़ी खराबियों को भी स्वयं ही ठीक करती है किन्तु कभी-कभी इसमें बाह्य सहयोग की भी आवश्यकता पड़ती है।

प्रत्येक मशीन में टूट-फूट, घिसाव-रिसाव आदि होते ही रहते हैं। प्रत्येक मशीन को कुछ देर चलने के बाद विश्राम की आवश्यकता पड़ती ही है। मानव शरीर भी सारा दिन काम करने के बाद रात को विश्राम करता है। विश्राम के दौरान कल-पुर्जे शक्ति संचय करते हैं तथा सुबह होते ही पुनः काम में जुट जाते हैं। चलते-चलते मशीन के कल पुर्जों में कुछ टूट फूट भी हो जाती है। ऐसी स्थिति में उसकी मुरम्मत भी आवश्यक हो जाती है। मशीन के किसी अंश में गन्दगी का जमाव हो जाने के कारण उसकी साफ-सफाई की भी आवश्यकता पड़ती है।

सिरदर्द, बदन दर्द, ज्वर, जुकाम इत्यादि के माध्यम से प्रकृति छुट्टी के लिए आवेदन करती है। प्रकृति के इस बोल को समझकर ही इसकी देख-रेख करनी पड़ती है। हमारे शरीर में जब सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा होता है तब हम खुश रहते हैं, खाते-पीते हैं, काम करते हैं, अच्छी नींद सोते हैं। जब ईंधन की आवश्यकता पड़ती है तब भूख लगती है और जब पानी की आवश्यकता होती है तब प्यास लगती है। विश्राम की आवश्यकता है तो नींद लगती है। ये सब प्राकृतिक बोल हैं।

जब कभी कोई तीखी गन्ध नाक में प्रवेश करती है तो छींक की आवाज आती है अर्थात् प्रकृति को वह गन्ध पसन्द नहीं है। अत्यधिक मात्रा में मिर्च खाते समय चेहरा लाल हो जाता है, नाक-आंख से पानी बहने लगता है। गुस्से में भी चेहरा लाल हो जाता है अर्थात् प्रकृति कुपित हो जाती है।

तीव्र ज्वर से भोजन की रूचि नहीं रहती, मुंह भी बेस्वाद हो जाता है अर्थात् प्रकृति कहती है कि अभी मत खाओ। ये सब प्रकृति के बोल हैं। शरीर की प्रवृत्ति हर समय बोलती रहती है किन्तु थोड़ी-सी चेष्टा करने पर ही इसकी भाषा ठीक-ठाक समझ में आती है।

शरीर में होने वाले किसी भी रोग का उपचार प्रकृति तुरन्त आरंभ कर देती है। जब आंखों में तिनका पड़ जाता है तो तुरन्त आंखों में पानी आ जाता है अर्थात् प्रकृति उस पानी द्वारा तिनके को बहाकर निकालने में जुट जाती है और जब तिनका बाहर निकल जाता है तो पानी आना बन्द हो जाता है।

जब फेफड़े में कोई विजातीय पदार्थ जमने लगता है तब प्रकृति उसे ठेल-ठेलकर बाहर निकालने में लग जाती है। इस प्रक्रिया को हम खांसी कहते हैं। कभी-कभी जाने-अनजाने में जब हम कोई दूषित वस्तु खा लेते हैं तो प्रकृति उसे उल्टी दस्त के माध्यम से शरीर से बाहर निकाल देती है।

हमारे संपूर्ण शरीर में रक्तवाही नलिकाओं का जाल बिछा हुआ है जिसमें प्रतिपल तरल रक्त का आवागमन होता रहता है। इन नलिकाओं में कहीं भी जरा-सा भी पंचर हो जाने से सारा रक्त बहकर निकल सकता है और आदमी मर सकता है किन्तु जब कभी शरीर में जख्म होता है तो तुरन्त प्रकृति क्रिया-प्रतिक्रिया के माध्यम से तरल रक्त में से ही रक्त के थक्के का निर्माण कर ‘पंचर’ को ‘सील’ कर देती है और रक्त का बहना बन्द हो जाता है।

हमारे शरीर के भीतर क्या हो रहा है, भले ही इससे हम अनजान रहते हैं किन्तु प्रकृति हर समय सतर्क रहती है। मामूली से एक कीटाणु या विजातीय पदार्थ के एक कण को भी वह शरीर के अन्दर टिकने नहीं देती। जब तक उस कीटाणु को मार नहीं देती, दम नहीं लेती है।

जब प्रकृति शरीर के भीतर होने वाले रोगों का उपचार कर रही होती है, हमें उसकी भाषा को ठीक से समझकर ही तदनुरूप सहयोग करना उचित होता है लेकिन जब कभी अज्ञानतावश हम ऐसा कुछ कर बैठते हैं जो प्रकृति के काम में बाधक है तभी हम जटिल और असहाय रोगों के शिकार होते हैं।

साधारण ज्वर के समय शरीर में दूषित पदार्थों के जमाव के कारण जब कीटाणु सहज ही शरीर में अपना घर बनाने लगते हैं वैसी दशा में शरीर की प्रकृति उन जीवाणुओं को मारकर बाहर निकालने के लिये अति उग्र रूप से संग्राम करने लगती है जिसके कारण शरीर का तापमान बढ़ जाता है।

शरीर की प्राण शक्ति रोग निवारण की तरफ केन्द्रित रहती है, फलस्वरूप शरीर के अन्य क्रियाकलाप मंद पड़ जाते हैं। खाने में रूचि नहीं रहती, मस्तिष्क भी ठीक-ठीक काम नहीं करता, सिर में दर्द रहता है और जब हम प्रकृति के साथ सहयोग न करके बिना रूचि के भी खा लेते हैं तो उल्टी व दस्त शुरू हो जाते हैं या ज्वर और भी तेज हो जाता है। फिर उल्टी दस्त बन्द करने की गोली खाकर और कुछ पेट में ठूंस लेते हैं।

शरीर का तापमान बढ़ने लगता है तो तापमान कम करने वाली गोली खा लेते हैं। परिणामस्वरूप तत्काल तो ज्वर को दबाया जा सकता है किन्तु उसके मूल कारण हमारे शरीर के अन्दर ही बने रह जाते हैं जो कालान्तर में बड़ी बीमारियों के रूप में प्रकट होते रहते हैं जिसका कारण होता है हमारे ही द्वारा शरीर पर किये गये अत्याचार जिससे हम एकदम अनजान रहते हैं।

ज्वर के समय सिरदर्द या शरीर का तापमान बढ़ना रोग नहीं अपितु रोग के लक्षण मात्रा होते हैं। सिरदर्द इस बात का द्योतक है कि मस्तिष्क का कार्य सुचारू रूप से नहीं हो पा रहा है। सिरदर्द की गोली एक प्रकार से अल्प बेहोशी की गोली ही होती है जो सामयिक रूप से स्नायु तन्तुओं को निष्क्रिय कर देती है जिसके कारण सिरदर्द तो रहता ही है किन्तु उसका बोध नहीं होता। गोली का असर थोड़ी देर तक ही रहता है, बाद में पुनः सिरदर्द और पुनः वही गोली।

जिस मीटर में रोग परिलक्षित हो रहा था उसी को डिस्कनेक्ट कर दिया जाता है, कितनी बड़ी अज्ञानता है। रोग के लक्षणों को मिटा देने से तो रोग दूर नहीं हो जाता अपितु और अधिक जटिल और दीर्घजीवी होता है। रोग के मूल कारण को दूर कर देने से रोग, लक्षण आदि सभी स्वतः ही दूर हो जायेंगे। इसलिए सबसे जरूरी है कि हम प्राकृतिक चिकित्सा को लेकर पूरी तरह से स्वयं को जागरूक करें। 

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