साइबर धोखाधड़ी की राशि के लेन-देन पर रोक लगाने के मामले में उत्तर प्रदेश देश में तीसरे स्थान पर

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लखनऊ, आठ फरवरी (भाषा) उत्तर प्रदेश के लखनऊ में इस साल जनवरी में 70 वर्षीय एक सेवानिवृत्त बैंक कर्मचारी पर उस वक्त मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा, जब खुद को केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) का अधिकारी बताकर साइबर ठगों ने उन्हें छह घंटे तक ‘‘डिजिटल अरेस्ट’’ कर उलझाए रखा।

हालांकि, समय पर शिकायत और पुलिस की त्वरित कार्रवाई ने उनकी जीवनभर की जमा-पूंजी को ठगों के हाथों में जाने से बचा लिया।

अधिकारियों के अनुसार, कृष्णा नगर थाना क्षेत्र के सिंधुनगर निवासी इंदरजीत सिंह दोपहर करीब दो बजे घर पर अकेले थे कि तभी उन्हें अज्ञात लोगों का फोन आया, जिन्होंने खुद को सीबीआई का अधिकारी बताया।

हालांकि, जब सिंह ने परिवार के अन्य सदस्यों द्वारा बार-बार किए गए कॉल का जवाब देना बंद कर दिया, तो परिजनों ने पुलिस को सूचना दी और पुलिस के तत्काल हस्तक्षेप से यह सुनिश्चित हुआ कि कोई भी वित्तीय लेनदेन नहीं हुआ और एक बड़ी साइबर ठगी टल गई।

पुलिस अधिकारियों ने बताया कि ये घटनाएं शुरुआती घंटे में कार्रवाई के महत्व को रेखांकित करती हैं, जिसकी वजह से उत्तर प्रदेश में साइबर धोखाधड़ी से निपटने के प्रदर्शन में उल्लेखनीय सुधार हुआ है।

केंद्रीय गृह मंत्रालय के राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल (एनसीआरपी) के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, जनवरी 2026 में उत्तर प्रदेश में 29,715 साइबर धोखाधड़ी की शिकायतें दर्ज की गईं, जिनमें 138 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ।

हालांकि 48.45 करोड़ रुपये के लेन-देन पर रोक लगा दी गयी, जो कुल नुकसान का लगभग 35 प्रतिशत है।

इस आधार पर धोखाधड़ी से जुड़ी राशि के लेन-देन पर रोक लगाने के मामले में उत्तर प्रदेश, राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों की सूची में तीसरे स्थान पर पहुंच गया है, जबकि पिछले वर्ष वह 24वें स्थान पर था।

सूची में दादरा एवं नगर हवेली, दमन एवं दीव पहले स्थान पर रहे जबकि हरियाणा 35.72 प्रतिशत के साथ दूसरे स्थान पर रहा।

तेलंगाना में यह प्रतिशत 26.69, महाराष्ट्र में 22 और तमिलनाडु में 14 दर्ज किया गया।

उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) राजीव कृष्णा ने ‘पीटीआई-भाषा’ से बातचीत में इस सुधार का श्रेय पीड़ितों द्वारा तेजी से शिकायत दर्ज कराने और पुलिस साइबर प्रकोष्ठ, बैंकों व पेमेंट गेटवे के बीच बेहतर समन्वय को दिया।

उन्होंने बताया, “लोगों में जागरूकता दो स्तरों पर होनी चाहिए। पहला, साइबर धोखाधड़ी का शिकार न बनें और दूसरा, यदि किसी कारणवश शिकार हो भी जाएं तो तुरंत स्थानीय पुलिस थाने या केंद्रीय हेल्पलाइन नंबर 1930 पर सूचना दें।”

अधिकारी ने बताया, “ऑनलाइन अपराध की सूचना देने का शुरुआती घंटा बेहद महत्वपूर्ण है। जितनी जल्दी रिपोर्ट की जाएगी, उतनी ही अधिक संभावना होगी कि पैसों के लेन-देन पर रोक लगायी जा सके और उसकी वसूली हो। इसलिए देर न करें और पहले घंटे में ही शिकायत दर्ज कराएं।”

पुलिस के अनुसार, हाल के दिनों में करीब 500 जागरूकता अभियान चलाए गए हैं, जिनमें प्रत्येक कार्यक्रम में साइबर विशेषज्ञों की भागीदारी के साथ 1,000 से 1,500 लोगों तक पहुंच बनाई गई।

पुलिस महानिदेशक ने बताया, “मैं स्वयं ऐसे 14 कार्यक्रमों में शामिल हुआ हूं।”

जुलाई 2025 में पदभार ग्रहण करने के तुरंत बाद पुलिस महानिदेशक ने लखनऊ में मौजूदा 20 सीट वाली सुविधा के अलावा 30 सीट वाले साइबर हेल्पलाइन कॉल सेंटर का उद्घाटन किया था।

उन्होंने बताया, “इससे हमारी क्षमता दोगुनी से भी अधिक हो गई है। पहले प्रतिदिन करीब 4,000 कॉल संभाल पाते थे, अब लगभग 9,000 कॉल प्रतिदिन प्राप्त कर सकते हैं।”

कृष्णा ने विशेष प्रशिक्षण की जरूरत पर जोर देते हुए बताया कि नये भर्ती कर्मियों और आगामी बैचों को पारंपरिक पुलिसिंग से आगे बढ़कर उन्नत प्रशिक्षण दिया जा रहा है।

उन्होंने बताया, “मेरा दृढ़ विश्वास है कि प्रशिक्षण से पेशेवरों की गुणवत्ता में अंतर आता है और मानव संसाधन मजबूत होते हैं।”

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