जीवन का सार है राम की मर्यादा और कृष्ण का माधुर्य

0
asdfrt5443ew
भगवान कृष्ण की बहुपत्नीत्व लीला और श्रीराम के एक पत्नीत्व व्रत, दोनों को यदि ‘इतिहास’ या ‘सामाजिक आचरण’ की कसौटी पर नहीं, बल्कि ‘दार्शनिक‑आध्यात्मिक संकेत’ के रूप में समझा जाए, तब उनके बीच का गहरा भेद और सामंजस्य दोनों स्पष्ट होते हैं।     
         वैष्णव परंपरा में श्रीकृष्ण को पूर्ण लीला पुरुषोत्तम तथा श्रीराम को मर्यादा पुरुषोत्तम कहा गया है। रामावतार में भगवान स्वयं को आदर्श मनुष्य के रूप में प्रस्तुत करते हैं, ताकि सामान्य गृहस्थ भी उनके जीवन से आचरण के नियम सीख सके,इसी कारण उनके व्यवहार में एक‑पत्नीत्व, राजधर्म, पुत्रधर्म, पितृभक्ति आदि का कठोर पालन दिखाई देता है। कृष्णावतार में वही परमात्मा बंधन‑मुक्त, सहज, रसपूर्ण चित्त की चरम लीला के रूप में प्रकट होते हैं। यहाँ भगवत लीला का लक्ष्य केवल ‘अनंत प्रेम’ की पराकाष्ठा का रहस्य खोलना है। यहां ईश्वर का एक रूप ‘मर्यादा’ को आदर्श बनाता है, दूसरा ‘माधुर्य’ को,  दार्शनिक दृष्टि से दोनों मिलकर धर्म और प्रेम की संपूर्णता रचते हैं। 
        पुराणों में द्वारका वासी कृष्ण की प्रमुख रानी के रूप में रुक्मिणी का वर्णन है। वे विदर्भराज भीष्मक की पुत्री और कृष्ण की ‘धर्मपत्नी’ हैं। रुक्मिणी और अन्य रानियाँ गृहस्थ‑धर्म, सामाजिक जिम्मेदारियों और लोक‑व्यवहार की पूर्णता का द्योतक हैं।  द्वारका का राजतंत्र, परिवार, कुल‑मर्यादा, सब इन्हीं के माध्यम से व्यवस्थित होता है। 
अनेक रानियाँ यहाँ काम‑विकास नहीं, बल्कि यह संकेत हैं कि परमात्मा असंख्य जीवात्माओं का आश्रय है। प्रत्येक जीव अपने‑अपने रूप में उनसे ‘संबंध’ स्थापित करता है, कोई रानी की तरह, कोई मित्र की तरह, कोई शिष्य की तरह। इस अर्थ में कृष्ण का बहुपत्नीत्व लौकिक पुरुष की वृत्ति नहीं, बल्कि अनंत जीवों के साथ उनके अनंत संबंधों का प्रतीक है।
      राधा का नाम प्रमुख रूप से भागवत आदि में प्रत्यक्ष न सही, पर बाद की वैष्णव परंपराओं, विशेषकर गौड़ीय, निम्बार्क, राधावल्लभ आदि में मिलता है। उन्हें कृष्ण के प्रति समर्पित प्रेम की सर्वोच्च मूर्ति माना गया है। अनेक परंपराओं में राधा और कृष्ण का संबंध दो प्रकार से समझाया गया है, स्वकीय (पति‑पत्नी जैसा) और परकीय (सामाजिक बंधनों से परे, केवल भावनात्मक प्रेम‑आधारित संबंध) गौड़ीय वैष्णव परंपरा परकीय‑भाव को सबसे ऊँचा मानती है, जहाँ सामाजिक विधानों से ऊपर केवल प्रेम और समर्पण रह जाता है। 
          गोपिकाएँ गृहस्थ होते हुए भी जब कृष्ण के लिए सब कुछ त्यागकर भागती हैं, तो यह लौकिक व्यभिचार नहीं, बल्कि यह शिक्षा है कि परमात्मा के लिए, जब प्रश्न ‘परम प्रेम’ का हो, तब संसार के सारे आग्रह गौण हो जाते हैं। 
इसीलिए भक्ति‑दर्शन में ‘पत्नी’ रुक्मिणी से अधिक ‘प्रेमिका’ राधा और गोपियों का प्रेम महत्वपूर्ण माना गया। क्योंकि वह नियमों से नहीं, शुद्ध उच्छ्वास से उपजा हुआ आध्यात्मिक प्रेम है। 
          दार्शनिक दृष्टि से रुक्मिणी‑कृष्ण और राधा‑कृष्ण दो अलग संबंध नहीं, बल्कि उसी एक सत्य के दो आयाम हैं। 
रुक्मिणी‑कृष्ण का संबंध ‘धर्मसम्मत गृहस्थ‑संबंध’ का आदर्श है। यह लोकशिक्षा के लिए आवश्यक है, ताकि मनुष्य समझे कि विवाह एक जिम्मेदारी, संरक्षण और करुणा का बंधन है। 
          राधा‑कृष्ण का संबंध ‘परम प्रेम’ का रूपक है। जहाँ आत्मा और परमात्मा के बीच कोई दूरी, कोई औपचारिकता शेष नहीं रहती। वैष्णव आचार्यों ने राधा को स्वयं श्रीकृष्ण की शक्ति, उनके प्रेम‑स्वरूप का ही व्यक्त रूप बताया है, अर्थात् प्रेमी और प्रेयसी दो अलग स्वरूप नहीं, मूलतः एक ही प्रेम सत्ता हैं। इसलिए कहा जाता है कि कृष्ण ‘पत्नी’ के रूप में रुक्मिणी से जुड़े हैं, पर ‘प्रेम’ के शिखर पर राधा से ।  धर्म को रुक्मिणी सुदृढ़ करती हैं, जबकि भक्ति और रस को राधा परम रूप देती हैं। 
            शास्त्रों में रामचंद्र को एक पत्नीव्रता का आदर्श बताया गया, उन्होंने आजीवन भगवती सीता के अतिरिक्त किसी स्त्री से विवाह या दैहिक संबंध नहीं रखा।  यह व्रत केवल व्यक्तिगत नैतिकता नहीं, बल्कि उस काल के लिए एक शक्तिशाली सामाजिक संदेश था, जहाँ अनेक पत्नी रखना राजाओं और उच्च वर्ग के लिए सामान्य माना जाता था।  राम का आचरण गृहस्थ‑धर्म और नारी‑सम्मान का आदर्श स्थापित करता है। 
        रामायण को कई वैष्णव लेखक ‘शरणागति‑वेदा’ कहते हैं। जहाँ मुख्य शिक्षा है कि पहले मनुष्य को ‘उत्तम मनुष्य’ बनना चाहिए । जो राम  मर्यादा सीख लेता है, वही आगे कृष्ण की भावुक लीला को समझने का अधिकारी होता है। 
             अर्थात् राम‑चरित धर्म का व्याकरण है, तो कृष्ण‑चरित प्रेम की काव्यात्मकता है । व्याकरण के बिना कविता भी समझ में नहीं आती, इसी तरह राम की मर्यादा के साथ ही कृष्ण की लीला का मर्म भी यथार्थ स्वरूप में समझा जा सकता है। 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *