अस्थमा में राहत दिलाती है सूर्य चिकित्सा

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पिछले दिनों अखबार में पढ़ा था कि वायु में धूल की मात्रा औसत से अधिक हो गयी है। यह प्रदूषण में बढ़ोतरी का संकेत है। इसी तरह से बढ़ते वाहनों के धुएं सघन बस्तियों एवं नष्ट होती हरियाली ने नाना प्रकार की बीमारियों को जन्म दिया है जिनमें सबसे आम बीमारी है अस्थमा या दमा।
अस्थमा श्वास क्रिया में उत्पन्न परेशानी है जो आज के दौर में किसी भी व्यक्ति या उम्र में हो सकती है। इस बीमारी के पीछे मूल कारण वातावरण की स्थिति है।
इसका प्रारंभिक दौर एलर्जी उत्पन्न होना है। एलर्जी तेज इत्रा, पराग कण युक्त पुष्प घरों में रखे अखबार या पत्रिकाओं में जमी धूल को सूंघने से तथा धूल भरे क्षेत्रा,घर से लगी पशुशाला, अंडे या प्रोटीन युक्त भोजन से होती है।
लक्षणः-
 श्वास नलिकाओं में सूजन आने से श्वास रंध्रों में हवा का दबाव बढ़ता है जिससे श्वास लेने में कठिनाई होती है।
 खांसी चलना एवं अत्यधिक मात्रा में बलगम निकलना।
 पसली चलने जैसी स्थिति उत्पन्न होना।
 घबराहट तथा बेचैनी जैसे लक्षण दिखाई देना।
उपचारः- प्रकृति सदैव हमें अपने अनुकूल रखना चाहती है परन्तु हम खुद उसे नुकसान पहुंचाकर प्रतिकूलता उत्पन्न कर रहे हैं जिसका परिणाम हमें खुद भुगतना पड़ रहा है। प्रकृति में उत्पन्न बीमारियों का इलाज भी प्रकृति में है बशर्तें हम उसे पहचानें। यूं तो आजकल बहुत सी प्राकृतिक चिकित्सा पद्धतियां प्रचलित हैं। उनमें से एक है सूर्य चिकित्सा।
सूर्य में सप्त रश्मियां होती हैं। ये सातों किरणें किसी न किसी बीमारी का इलाज हैं। बस ध्यान यह रखना होता है कि किस-बीमारी में हम किस रश्मि का उपयोग करें।
कैसे करें चिकित्सीय उपचारः-
 सर्वप्रथम आप लाल, नारंगी व नीली रंग की बोतलें जुटायें।
यदि उक्त रंगों की बोतलें  उपलब्ध न हो तो सफेद (पानीदार) रंग वाली बोतलों में बल्बों से रंगीन प्रकाश प्राप्त करने के लिए लगायी जाने वाली  पन्नी (सेलोफीन पेपर) लपेट कर फायदा उठा सकते हैं।
 रोग यदि नया हो तो लाल रंग वाली बोतल में 3/4 भाग सरसों का तेल भर कर किसी पीढ़ा या पाटी पर धूप में 45 दिन तक रखें। इसी तरह नीले रंग वाली बोतल में 3/4 भाग पानी भर प्रतिदिन 6 घंटे धूप में पाटी या पीढ़े पर रखें। पानी तो पीने लायक प्रतिदिन तैयार हो जाएगा परन्तु तेल तैयार होने में बताया गया समय लगता है। पानी आप 2 कप से कम मात्रा लेकर सुबह शाम पीते रहें।
 यदि रोग लंबे समय का है व अन्य उपचार नाकाम हो गए हों तो नीले रंग की बोतल के पानी के स्थान पर नारंगी रंग के बोतल के पानी का इस्तेमाल करना चाहिए।
 45 दिन में तैयार लाल बोतल के तेल की प्रतिदिन पीठ व छाती पर हल्की-फुल्की मालिश करनी चाहिए।
किन चीजों से बचें-
 एलर्जी उत्पन्न करने वाली चीजों व वातावरण से।
 चिकनाई रहित हल्का-फुल्का आहार लें जिससे कब्ज न बने।
 सर्द-गर्म करने वाली चीजें, तेज खटाई इत्यादि का सेवन न करें।
 कच्चे लहसुन का सेवन करें।
 अदरक, तुलसी व काली मिर्च की चाय सेवन कर सकते हैं।

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