डॉ. परमलाल गुप्त
जब मैं शहर में आया तो सबसे बड़ी दिक्कत दूध की महसूस हुई। इस शहर में साठ रूपये लीटर भी शुद्घ दूध नहीं मिलता था। इसलिये अनायास जब वह पचास रूपये लीटर दूध देने को तैयार हो गयी, तो मुझे बड़ी खुशी हुई।
मैंने देखा उसका रंग सांवला था। आंखें बड़ी जिनमें काजल लगा हुआ, माथे पर बड़ी टिकुली और मांग में गहरा सिन्दूर। लम्बा चेहरा और छरहरा शरीर। आयु चौबीस पच्चीस के आस-पास। गले में चांदी की हंसुली, कमर में चांदी की ही बैल्ट और पैरों में पायल। वह छनन-छनन की बहुत धीमी आवाज के साथ छोटे-छोटे कदमों से कमर पर खम देकर चलती। चलने में उसके नितम्बों की उठी हुई गोलाइयां बारी-बारी से उभरतीं। मुख पर स्निग्धता और आंखों में तरल हंसी छिटक पड़ती। उसके आने पर मेरे मन में बताशे फूटने लगते। उसकी मिठास बहुत देर तक वातावरण में घुली रहती। परंतु इस उपयोगितावादी युग में जहां आचरण का आधार अर्थ होता है, यह मिठास अधिक दिन न रह सकी। उसमें कड़वाहट घुलती चली गयी।
हुआ यों कि उसने पहिले महीने बहुत अच्छा दूध दिया। दूसरे महीने उसने बातों-बातों में बताया कि उसका मकान बन रहा है, नींव पड़ गयी है। इसी के साथ ही वह दूध में कुछ पानी मिलाकर लाने लगी। इसके बावजूद भी दूध अच्छा ही था और दाम कम थे। तीसरे महीने में उसने बताया कि मकान की दीवारें खड़ी हो गयी हैं और दूध में पानी की मात्रा आधे-आध पर आ गयी। मैंने एकाध बार उसको टोका- ”तुम्हारा दूध अब दिन पर दिन खराब आ रहा है। अगर ऐसा रहा तो बंद कर देंगे।ÓÓ वह बड़ी तरल मुस्काराहट लाकर कहती- ”बाबूजी, अब मैं खुद आपके लिये अलग रखा करूंगी, पता नहीं सास क्या करती है?ÓÓ इसके बावजूद भी दूध का स्तर फिर नहीं उठा। वह आज कल की शिक्षा की भांति निरन्तर गिरता ही चला गया।
मेरी चिड़चिड़ाहट बढ़ गयी। मैं बार-बार उसे दूध बंद करने की धमकी देता पर मधुर मुस्कान में लिपटे झूठे आश्वासनों की गुड़ में लिपटी कड़वी गोलियों की तरह निगलता जाता। चौथे महीने में उसने मकान की चर्चा करते हुए कहा- ”बाबूजी, बस एक महीने की कसर है। अब छत पडऩा बाकी है।ÓÓ इसी के साथ अब दूध में पानी की जगह पानी में दूध आने लगा। मैं बिगड़ा और उससे कहा- ”देखो, अगर तुम्हारा यही हाल रहा, तो अगले महीने से दूध बंद कर दूंगा।ÓÓ वह बोली- ”बाबूजी, कुछ ही दिनों की बात है। असल में हमारी भैंस कम दूध देने लगी है। इस कारण दूसरों से दूध खरीदकर लाना पड़ता है अगले महीने दूसरी भैंस बया जायेगी, तो कोई परेशानी न रहेगी।ÓÓ
”हमें इससे क्या मतलब? पैसा तो तुम उतना ही लोगी? नहीं चलता तो बंद कर दो।ÓÓ मैंने कहा।
”अच्छा बाबूजी, अब आपके लिये अलग से लायेंगे। एक डिब्बा दे दीजिए।ÓÓ मैंने उसे डिब्बा दे दिया। पर मैंने देखा कि अलग डिब्बे में भी वही दूध रहता था, जो पहले मिलता था। यह केवल बहलाने का एक बहाना था। मैंने एक दिन हंसकर उससे कहा- ”देखो, इस पानी का पैसा तुम्हारे मकान में लगेगा, तो तुम्हारा मकान धसक जायेगाÓÓ यह सुनकर उसका मुंह एकदम उतर गया। एक भय मिश्रित त्रास से उसका मुंह मुर्झाए पत्ते की तरह विवर्ण हो उठा। कुछ देर बाद वह धीरे से बोली-”बाबूजी। ऐसा न कहिए। अपना सब कुछ लगाकर और इधर-उधर कर्ज लेकर मैंने मकान बनवाया है।ÓÓ मेरी करूणा जाग उठी-”अरे, मैं तो यों ही हंसी में कह रहा था। लेकिन यह मैं बताये देता हूं कि तुम्हारे दूध का यही हाल रहा तो अगले महीने से न लूंगा। कितना बेस्वाद रहता है। पीकर जी मतलाने लगता है।
अब तो मालूम पड़ता है कि गाढ़ा करने के लिये उसमें मिल्क पाउडर मिलाया गया हो। अगर ऐसा ही करना है तो तुम क्यों कष्टï करो। मैं ही यहीं पानी में घोल लिया करूंगा।ÓÓ वह मेरी ओर देखकर नकारात्मक सिर हिलाने लगी। उसका अंदर का अपराध-बोध ऊपर दीनता के रूप में छिटक पड़ा था। वह बड़ी दीनता से बोली-”बाबूजी, हम गरीब आदमी हैं। मन की एक ही साध थी कि मकान बन जाये। क्या करें, इसीलिये सबकी सुननी पड़ती है। दूध का यह काम ठप्प हो जाय, तो मकान अधूरा ही रह जायेगा॥ÓÓ
”यह पचड़ा तो हमेशा का है।ÓÓ यह सोचकर और दूध में कोई सुधार न होते देख अगले महीने मैंने उसे दो टूक जवाब दे दिया। उसके हिसाब के रूपये दे दिये। रूपये लेकर वह चुपचाप चली गयी। मेरे मन में भी एक हल्की उदासी की धुंध छा गयी।
इस बात को छह महीने व्यतीत हो गये। रोजमर्रा के काम यथावत चलते रहे। इस बीच मैं उसे बिल्कुल भूल गया। एक दिन वह बहुत धीमे कदमों से आयी और उदासी भरे स्वर मेें बोली-”बाबूजी अब आप किससे दूध लेते हैं?ÓÓ
मैं उसे देखकर चौंक उठा। वह काफी बदल गयी थी। उसका रंग और सांवला हो गया था। आंखें सूनी थीं, मुंह एकदम सूखा। अभी अधिक समय नहीं बीता था, पर मालूम पड़ता था कि काफी अर्सा बीत गया हो। पहले का अंगड़ाइयां लेता हुआ जाग्रत रंगीन यौवन अब जैसे मन के अंकुश से आहत पड़ा हो। मैंने अपने को संयत कर कुछ बेरूखी से उत्तर दिया-”क्यों क्या बात है? डेयरी से मंगाता हूं। बिल्कुल शुद्घ।ÓÓ
उसने बड़ी आजिजी से कहा-”अब आप मुझसे ही लिया करें। अब गड़बड़ न होगी।ÓÓ
”क्यों? अब क्यों न होगी? एक बार देख लिया। न मेरे पास मुफ्त के पैसे हैं और न रोज-रोज की चिकचिक के लिये समय। तुम्हारा क्या पहले शुरू में ठीक दोगी और फिर वही दूध में पानी और पानी में दूध।ÓÓ
”बाबूजी आपका कहना सही है। पर मैं एक बार यह करके उसका फल भोग चुकी हूं।ÓÓ यह कहते-कहते उसकी आंखें भर आईं।
मैं सन्नाटे में आ गया। मुझे तुरंत ध्यान आया कि शायद इसका मकान धसक गया है। मैंने यह बात हंसी में कही भी थी। मैंने पूछा-”क्यों, तुम्हारा मकान तो पूरा बन गया था?ÓÓ
”हां बाबूजी। मकान तो बन गया। पर राउत नहीं रहे-ÓÓ अब मैंने गौर किया। उसकी मांग में सिन्दूर नहीं था, न माथे पर टिकुली। अलंकारविहीन, सादी धोती में लिपटी हुई। मैंने धीरे से उसकी थाह लेते हुए कहा-”तुम्हारे यहां तो दूसरा ब्याह का चलन है। एक आदमी के रहते हुए भी औरत दूसरा ब्याह कर लेती है।
फिर तुम्हारी उम्र ही क्या है? दूसरा विवाह क्यों नहीं कर लेती?ÓÓ मैं सोच रहा था कि शायद यह अपने पति को बहुत चाहती होगी। परंतु मेरी आशा के विपरीत उसने कहा-”दूसरे ब्याह का चलन है क्योंं नहीं? लेकिन अभी तक मरखप कर और बेइमानी तक करके जो मकान बनवाया, ब्याह करने से वह फिर मेरा कहां रहेगा। जिसके लिये अपने राउत को खो दिया, उसे मैं नहीं छोडूगीं।ÓÓ मैं उसकी ओर देखता ही रह गया।
मैंने देखा उसका रंग सांवला था। आंखें बड़ी जिनमें काजल लगा हुआ, माथे पर बड़ी टिकुली और मांग में गहरा सिन्दूर। लम्बा चेहरा और छरहरा शरीर। आयु चौबीस पच्चीस के आस-पास। गले में चांदी की हंसुली, कमर में चांदी की ही बैल्ट और पैरों में पायल। वह छनन-छनन की बहुत धीमी आवाज के साथ छोटे-छोटे कदमों से कमर पर खम देकर चलती। चलने में उसके नितम्बों की उठी हुई गोलाइयां बारी-बारी से उभरतीं। मुख पर स्निग्धता और आंखों में तरल हंसी छिटक पड़ती। उसके आने पर मेरे मन में बताशे फूटने लगते। उसकी मिठास बहुत देर तक वातावरण में घुली रहती। परंतु इस उपयोगितावादी युग में जहां आचरण का आधार अर्थ होता है, यह मिठास अधिक दिन न रह सकी। उसमें कड़वाहट घुलती चली गयी।
हुआ यों कि उसने पहिले महीने बहुत अच्छा दूध दिया। दूसरे महीने उसने बातों-बातों में बताया कि उसका मकान बन रहा है, नींव पड़ गयी है। इसी के साथ ही वह दूध में कुछ पानी मिलाकर लाने लगी। इसके बावजूद भी दूध अच्छा ही था और दाम कम थे। तीसरे महीने में उसने बताया कि मकान की दीवारें खड़ी हो गयी हैं और दूध में पानी की मात्रा आधे-आध पर आ गयी। मैंने एकाध बार उसको टोका- ”तुम्हारा दूध अब दिन पर दिन खराब आ रहा है। अगर ऐसा रहा तो बंद कर देंगे।ÓÓ वह बड़ी तरल मुस्काराहट लाकर कहती- ”बाबूजी, अब मैं खुद आपके लिये अलग रखा करूंगी, पता नहीं सास क्या करती है?ÓÓ इसके बावजूद भी दूध का स्तर फिर नहीं उठा। वह आज कल की शिक्षा की भांति निरन्तर गिरता ही चला गया।
मेरी चिड़चिड़ाहट बढ़ गयी। मैं बार-बार उसे दूध बंद करने की धमकी देता पर मधुर मुस्कान में लिपटे झूठे आश्वासनों की गुड़ में लिपटी कड़वी गोलियों की तरह निगलता जाता। चौथे महीने में उसने मकान की चर्चा करते हुए कहा- ”बाबूजी, बस एक महीने की कसर है। अब छत पडऩा बाकी है।ÓÓ इसी के साथ अब दूध में पानी की जगह पानी में दूध आने लगा। मैं बिगड़ा और उससे कहा- ”देखो, अगर तुम्हारा यही हाल रहा, तो अगले महीने से दूध बंद कर दूंगा।ÓÓ वह बोली- ”बाबूजी, कुछ ही दिनों की बात है। असल में हमारी भैंस कम दूध देने लगी है। इस कारण दूसरों से दूध खरीदकर लाना पड़ता है अगले महीने दूसरी भैंस बया जायेगी, तो कोई परेशानी न रहेगी।ÓÓ
”हमें इससे क्या मतलब? पैसा तो तुम उतना ही लोगी? नहीं चलता तो बंद कर दो।ÓÓ मैंने कहा।
”अच्छा बाबूजी, अब आपके लिये अलग से लायेंगे। एक डिब्बा दे दीजिए।ÓÓ मैंने उसे डिब्बा दे दिया। पर मैंने देखा कि अलग डिब्बे में भी वही दूध रहता था, जो पहले मिलता था। यह केवल बहलाने का एक बहाना था। मैंने एक दिन हंसकर उससे कहा- ”देखो, इस पानी का पैसा तुम्हारे मकान में लगेगा, तो तुम्हारा मकान धसक जायेगाÓÓ यह सुनकर उसका मुंह एकदम उतर गया। एक भय मिश्रित त्रास से उसका मुंह मुर्झाए पत्ते की तरह विवर्ण हो उठा। कुछ देर बाद वह धीरे से बोली-”बाबूजी। ऐसा न कहिए। अपना सब कुछ लगाकर और इधर-उधर कर्ज लेकर मैंने मकान बनवाया है।ÓÓ मेरी करूणा जाग उठी-”अरे, मैं तो यों ही हंसी में कह रहा था। लेकिन यह मैं बताये देता हूं कि तुम्हारे दूध का यही हाल रहा तो अगले महीने से न लूंगा। कितना बेस्वाद रहता है। पीकर जी मतलाने लगता है।
अब तो मालूम पड़ता है कि गाढ़ा करने के लिये उसमें मिल्क पाउडर मिलाया गया हो। अगर ऐसा ही करना है तो तुम क्यों कष्टï करो। मैं ही यहीं पानी में घोल लिया करूंगा।ÓÓ वह मेरी ओर देखकर नकारात्मक सिर हिलाने लगी। उसका अंदर का अपराध-बोध ऊपर दीनता के रूप में छिटक पड़ा था। वह बड़ी दीनता से बोली-”बाबूजी, हम गरीब आदमी हैं। मन की एक ही साध थी कि मकान बन जाये। क्या करें, इसीलिये सबकी सुननी पड़ती है। दूध का यह काम ठप्प हो जाय, तो मकान अधूरा ही रह जायेगा॥ÓÓ
”यह पचड़ा तो हमेशा का है।ÓÓ यह सोचकर और दूध में कोई सुधार न होते देख अगले महीने मैंने उसे दो टूक जवाब दे दिया। उसके हिसाब के रूपये दे दिये। रूपये लेकर वह चुपचाप चली गयी। मेरे मन में भी एक हल्की उदासी की धुंध छा गयी।
इस बात को छह महीने व्यतीत हो गये। रोजमर्रा के काम यथावत चलते रहे। इस बीच मैं उसे बिल्कुल भूल गया। एक दिन वह बहुत धीमे कदमों से आयी और उदासी भरे स्वर मेें बोली-”बाबूजी अब आप किससे दूध लेते हैं?ÓÓ
मैं उसे देखकर चौंक उठा। वह काफी बदल गयी थी। उसका रंग और सांवला हो गया था। आंखें सूनी थीं, मुंह एकदम सूखा। अभी अधिक समय नहीं बीता था, पर मालूम पड़ता था कि काफी अर्सा बीत गया हो। पहले का अंगड़ाइयां लेता हुआ जाग्रत रंगीन यौवन अब जैसे मन के अंकुश से आहत पड़ा हो। मैंने अपने को संयत कर कुछ बेरूखी से उत्तर दिया-”क्यों क्या बात है? डेयरी से मंगाता हूं। बिल्कुल शुद्घ।ÓÓ
उसने बड़ी आजिजी से कहा-”अब आप मुझसे ही लिया करें। अब गड़बड़ न होगी।ÓÓ
”क्यों? अब क्यों न होगी? एक बार देख लिया। न मेरे पास मुफ्त के पैसे हैं और न रोज-रोज की चिकचिक के लिये समय। तुम्हारा क्या पहले शुरू में ठीक दोगी और फिर वही दूध में पानी और पानी में दूध।ÓÓ
”बाबूजी आपका कहना सही है। पर मैं एक बार यह करके उसका फल भोग चुकी हूं।ÓÓ यह कहते-कहते उसकी आंखें भर आईं।
मैं सन्नाटे में आ गया। मुझे तुरंत ध्यान आया कि शायद इसका मकान धसक गया है। मैंने यह बात हंसी में कही भी थी। मैंने पूछा-”क्यों, तुम्हारा मकान तो पूरा बन गया था?ÓÓ
”हां बाबूजी। मकान तो बन गया। पर राउत नहीं रहे-ÓÓ अब मैंने गौर किया। उसकी मांग में सिन्दूर नहीं था, न माथे पर टिकुली। अलंकारविहीन, सादी धोती में लिपटी हुई। मैंने धीरे से उसकी थाह लेते हुए कहा-”तुम्हारे यहां तो दूसरा ब्याह का चलन है। एक आदमी के रहते हुए भी औरत दूसरा ब्याह कर लेती है।
फिर तुम्हारी उम्र ही क्या है? दूसरा विवाह क्यों नहीं कर लेती?ÓÓ मैं सोच रहा था कि शायद यह अपने पति को बहुत चाहती होगी। परंतु मेरी आशा के विपरीत उसने कहा-”दूसरे ब्याह का चलन है क्योंं नहीं? लेकिन अभी तक मरखप कर और बेइमानी तक करके जो मकान बनवाया, ब्याह करने से वह फिर मेरा कहां रहेगा। जिसके लिये अपने राउत को खो दिया, उसे मैं नहीं छोडूगीं।ÓÓ मैं उसकी ओर देखता ही रह गया।
