रोगों से बचाव की क्षमता को रोग प्रतिरोधक क्षमता कहते हैं। सामान्यतः पोलियो, क्षय रोग, पीलिया, टिटनेस, खसरा आदि बीमारियों के लिए टीकाकरण किया जाता है। गैर संक्रामक रोगों से प्रतिरक्षण के लिए अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर चिकित्सक वैज्ञानिक टीके को विकसित करने की कोशिश कर रहे हैं। दुनियां भर में मधुमेह और एड्स के खतरे को ध्यान में रखते हुए इनके लिए भी प्रतिरक्षण टीकों पर भी शोध हो रहा है।
अमरीका के राष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्थान तथा अनेक विश्वविद्यालयों में हुए अनुसंधानों में इस बात पर सभी एकमत हैं कि प्रतिरक्षा प्रणाली की प्रभावी क्रियाशीलता व्यक्ति के स्वयं के सोच व आचरण पर निर्भर करती है। हमारा आहार, जीवन शैली और जीवन के प्रति हमारी दृष्टि हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करते हैं।
अनुसंधान यह भी बताते हैं कि यद्यपि औषधियों का सेवन स्वास्थ्य लाभ के लिए आवश्यक है मगर कुछ औषधियां (मुख्यतः एंटीबायोटिक्स) प्रतिरक्षा प्रणाली को कमजोर बनाती हैं। जहां औषधियों का दीर्घकालीन सेवन प्रतिरक्षण को दुर्बल करता है, वहीं प्रतिरक्षा प्रणाली को पुष्ट बनाने के लिए अपनाया गया दीर्घकालीन कार्यक्रम हमें स्वास्थ्य के खतरों से दूर रखता है।
शरीर में विद्यमान प्रतिरक्षा प्रणाली बहुत ही शक्तिशाली अस्त्र है और इसकी आवश्यकता हमें तब और भी महसूस होती है जब कोई रोग प्रतिद्वन्द्वी बनकर हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली को ललकारता है। जाने-अनजाने में हम प्रतिरक्षा प्रणाली को नष्ट होने से रोक नहीं पाते या उसे मज़बूत बनाने की कोशिश नहीं करते। जब हम उसे अपेक्षित शक्ति नहीं दे पाते तो हम किसी न किसी रोग के चंगुल में फंस जाते हैं।
प्रतिरक्षा प्रणाली के रक्षण के लिए उपाय
सुपाच्य पोषक भोजनः-
आहार संतुलित और सुपाच्य होना चाहिए। आहार में कार्बोहाइड्रेट और वसा की अधिकता प्रतिरक्षा प्रणाली के लिए घातक हो सकती है। बढ़ती उम्र में उन अतिरिक्त पोषण तत्वों की आवश्यकता होती है जो ऑक्सीकरण प्रक्रिया को बंद करें तथा कोषाणुओं और ऊतकों को कमजोर न होने दें ।
औषधीय जड़ी बूटियां एवं खाद्य मसालेः-
कुछ औषधीय जड़ी बूटियां और खाद्य मसाले कोषाणुओं और ऊतकों को समृद्ध बनाते हैं। लहसुन, जीरा, हल्दी, अदरक, लौंग आदि, खाद्य पदार्थ प्रतिरक्षा प्रणाली के लिए उपयोगी माने गये हैं।
उपयुक्त व्यायामः-
मर्यादित व्यायाम भी प्रतिरक्षा की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हैं। व्यायाम कैंसर, दमा, हृदय रोग, तनाव तथा अनेक संक्रमणों से रक्षा करते हैं। नियमित व्यायाम व ध्यान से मनुष्य दीर्घायु होता है।
सकारात्मक सोचः-
नकारात्मक दृष्टिकोण प्रतिरक्षा को कमजोर बनाता है। घृणा, अहंकार, आत्म वंचना आदि नकारात्मक विचार स्वास्थ्य के लिए घातक हो सकते हैं। अनुसंधान इस बात की पुष्टि करते हैं कि विपरीत परिस्थितियों में यदि मनुष्य संयत रहता है तो वह दीर्घायु होता है। हंसने से मनोभावों में परिवर्तन होता है जो प्रतिरक्षा प्रणाली को शक्ति देता है। तनाव को कम करने के लिए प्रार्थना, जाप व शान्त मन से ध्यान क्रियाएं लाभकारी मानी गयी है।
अनुसंधानों से यह पता चला है कि विवाहित व्यक्तियों की प्रतिरक्षा प्रणाली अधिक सुदृढ़ होती है। घनिष्ठता व संबंध प्रतिरक्षा को मजबूत बनाते हैं। मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि पीड़ा की अभिव्यक्ति पीड़ा को कम करती है। जिस व्यक्ति के घनिष्ठ सामाजिक संबंध हैं उसकी प्रतिरक्षा सुदृढ़ होती है।
संतुलित जीवन, उपयुक्त आहार, व्यायाम व विश्राम तथा सकारात्मक सोच जीवन की गुणवत्ता में अभिवृद्धि ही नहीं करते अपितु प्रतिरक्षा प्रणाली को सशक्त भी बनाते हैं।
