हर दिन सुबह जब अखबार आ जाता है तब उसे उठाकर पहले प्रथम पृष्ठ की सुर्खियों पर नजर दौड़ाता हूं। फिर तुरंत उस पृष्ठ पर नजर दौड़ाता हूं जिस पर मृत्यु समाचार छपे हैं। अधिकांश ऐसे समाचारों के साथ मृतकों के रंगीन चित्र मुद्रित रहते हैं। यह सुनिश्चित करने के बाद कि मेरे किसी मित्र या परिचित का चित्र उनमें है या नहीं, यह देखता हूं कि मृतकों का औसत आयु वर्ग क्या रहा। यह देखकर दुःख होता है कि साठ सत्तर की आयु से कम आयु वाले भी काफी संख्या में चल बसे हैं, कुछ दुर्घटनाग्रस्त होकर, कुछ रोग ग्रस्त होकर, कुछ वैसे ही!
मेरी आयु अब 78 वर्ष की है। मेरी जन्मकुंडली में 70 वर्ष तक की आयु ही बतायी गई है पर ईश्वर की कृपा से आज तक जिंदा हूं। अब आगे का हाल भगवान ही जानें। यह मानव जीवन इतना सुखद है, यह दुनियां इतनी सुंदर है कि हम दीर्घकाल तक इसका आस्वादन करते हुए जिंदा रहना चाहते हैं, कम से कम 100 वर्ष तक। जीवेम शरदः शतम, यही हमारे पूर्वजों की कामना रही। यद्यपि नब्बे पार कर चुके कुछ बुजुर्ग बताते हैं कि अब आगे जिंदा रहना बड़ा दुखद होगा क्योंकि हर बात के लिए दूसरों पर आश्रित रहना होगा। अंग क्षीण हो जाएंगे।
अब अपने अनुभव के आधार पर दीर्घायु पाने के कम से कम 78 वर्ष की आयु तक जिंदा रहने के कुछ नुस्खे बताऊंगा। शायद आपके काम आएं।
एक है शाकाहार। मैं शुरू से ही पूर्णतः शाकाहारी रहा हूं। हमारे गांव में एक संन्यासी थे करूवाट्टा स्वामी के नाम से। उनके प्रभाव में आकर मेरे मां-बाप ने मांसाहार कुछ वर्षों के लिए छोड़ दिया था। उसी दौरान मेरा जन्म हुआ। उन्होंने मुझे बचपन में कभी मांस-मछली-अंडा जैसी चीजें नहीं खिलायी। फलस्वरूप मुझे इन चीजों से विकर्षण हो गया। जीवन में कभी मैंने इन चीजों का स्वाद या दुस्वाद नहीं चखा। इस का परिणाम हुआ कि मेरा वजन कभी सामान्य से ज्यादा नहीं हुआ। अब कई वर्षों से मेरा वजन 60 किलोग्राम है जो मेरी ऊंचाई और आयु की दृष्टि से अधिक या कम नहीं माना जाता।
कुछ वर्षों से मैं दोपहर के बाद प्रायः एक बार तीन चार केले या ऐसे ही सस्ते फल खा लेता हूं। सुबह दोसा, इडली, चपाती जैसी वस्तुओं का नाश्ता और दोपहर को चावल, साग, सब्जी आदि। सुबह दातुन करने के तुरंत बाद दो गिलास पानी पी लेता हूं। बीच-बीच में थोड़ा-थोड़ा पानी पीता हूं। चाय दिन में तीन बार पीता हूं – सुबह छह बजे, पूर्वान्ह ग्यारह बजे और शाम के चार बजे।
प्रायः सुबह पांच बजने के पहले जाग पड़ता हूं। दूध खरीदने जाता हूं तो उस बहाने थोड़ा टहलना भी हो जाता है। नहाने के बाद थोड़ा योगाभ्यास करता हूं। कुछ योगासन जैसे भुजंगासन, नौकासन, शलभासन, धनुरासन, सर्वांगासन, मत्स्यासन, महामुद्रा और शवासन। थोड़ी देर प्राणायाम और ध्यान। शाम को करीब चालीस मिनट टहल आता हूं। घर से कुछ दूर एक वाचनालय में समय बिताता हूं। वहां मलयालम के चार अखबार और अंग्रेजी के तीन अखबार पढ़ने को मिलते हैं। अखबार पढ़ने के बाद घर लौटता हूं। टहलता हुआ। रास्ते में पड़ोसी मित्रों के दर्शन भी मिलते हैं।
दिन में जो समय मिलता है उसका उपयोग लिखने-पढ़ने और रेडियो सुनने में करता हूं। कभी-कभी रसोई में पत्नी की सहायता भी करता हूं। थोड़ा-समय पोते-पोतियों के साथ भी बिताता हूं। रात को दस बजे के करीब बिस्तर पर जाता हूं।
धूम्रपान और शराब से मैंने अपने को दूर रखा है। कई बार मित्रों ने धूम्रपान के लिए और शराब पीने के लिए प्रेरित किया पर बचपन में मां-बाप ने मेरे मन में इन दोनों वस्तुओं के प्रति इतना विकर्षण उत्पन्न किया था कि मेरा मन कभी इस ओर आकृष्ट नहीं हुआ।
करीब चौदह वर्ष की आयु में ही मैं फाइलेरिया रोग से ग्रस्त हो गया। कई वर्षों तक आयुर्वेद, होम्योपैथी और एलोपैथी की दवाइयां ली। कोई फायदा नहीं हुआ। करीब पैंतीस वर्ष पहले एक साधारण आयुर्वेद वैद्य जी ने सलाह दी हर रात भोजन के बाद एक चम्मच सुकुमार रसायन खाया करो। मैंने वह सलाह मान ली। इससे मुझे बड़ा फायदा हुआ। अब मुझे उस बीमारी की कोई तकलीफ नहीं है।
पिछले चार पांच सालों से ब्लड प्रेशर की शिकायत है। हाई ब्लड प्रेशर के लिए हर सुबह एक गोली खाता हूं। यद्यपि मेरी माता जी मधुमेह से पीडि़त थी तो भी अब तक मैं उस रोग से मुक्त रहा हूं। शायद योगासनों का सत परिणाम है। शरीर पर साबुन नहीं लगाता। अंगोछे से शरीर पर खूब रगड़ कर नहाता हूं।
जीवन में समस्याएं आती हैं। जिन्हें सुलझा नहीं पाता, उन समस्याओं को भगवान पर छोड़ता हूं। हर सुबह थोड़ी देर नाम जप और गीता पाठ करता हूं। तब मन का आवश्यक बोझ थोड़ा उतर जाता है। एक प्रकार की पोजिटिव एनर्जी मिल जाती है।
हमारे घर के समीप श्रीकृष्ण का एक मंदिर है। वहां से भजन-कीर्तन, भागवत-वाचन, घंटा, शंख आदि की जो ध्वनि आती है, उसकी गूंज हमारे घर तक आती रहती है। सुखद, शांतिप्रद नाद।
