उमेश जोशी
कृषि क्षेत्र में एआई का सबसे असरदार इस्तेमाल सटीक कृषि प्रबंधन में देखा जा रहा है। ड्रोन, उपग्रह चित्र और खेतों में लगे सेंसर फसलों की स्थिति, मिट्टी की नमी और मौसम के बदलाव का लगातार विश्लेषण करते हैं। इससे सिंचाई करना और उर्वरक का इस्तेमाल अधिक वैज्ञानिक ढंग से संभव होता है। कई प्रयोगों में यह पता चला है कि एआई की मदद से अपनाई गई तकनीक से पानी की ख़पत 20–30 प्रतिशत तक घटाई जा सकती है और बेहतर निगरानी के कारण पैदावार भी बढ़ती है। इसी तरह, एआई आधारित मॉडल फसल की संभावित उपज का पूर्वानुमान बता देता है जिससे किसान उस फसल की तैयारी पहले ही कर सकते हैं।
कीट और रोग प्रबंधन में भी एआई उपयोगी साबित हो रहा है। इमेज विश्लेषण और डेटा पैटर्न के आधार पर शुरुआती संक्रमण का पता चलने से समय रहते उपचार संभव हो जाता है। इससे रसायनों का अनावश्यक इस्तेमाल कम होता है जिससे लागत घटती है। कुछ अध्ययनों से पता चला है कि सही समय पर कीट और रोगों की पहचान कर लेने से पैदावार में 7 से 12 प्रतिशत तक सुधार संभव है। इससे न केवल किसान की आय बढ़ाती है, बल्कि पर्यावरण पर दबाव भी कम होता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी एआई सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए कहा है कि तकनीक भारत के विकास का प्रमुख साधन है। उनके इस वक्तव ने एक बार फिर इस सवाल की ओर ध्यान खींचा है कि एआई का वास्तविक लाभ देश के किसानों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था तक कैसे पहुँचेगा। शहरों में डिजिटल क्रांति दिखती है, लेकिन खेतों में तकनीक की सफलता केवल उपकरणों से नहीं, बल्कि उनके उपयोग, किसानों तक उसकी पहुँच बनाने और स्थानीय स्तर पर उसे अपनाने योग्य बनाने से तय होती है। कृषि में एआई की यही असली चुनौती है।
किसानों की आय पर एआई का असर केवल खेत तक सीमित नहीं है। डिजिटल सलाह प्रणालियाँ और स्थानीय भाषाओं में उपलब्ध एआई चैटबॉट छोटे किसानों को बीज का चयन करने, सिंचाई का सही समय बताने और पोषण प्रबंधन जैसे निर्णयों में मदद देते हैं। जहाँ पहले कृषि विशेषज्ञ तक किसानों की पहुँच मुश्किल थी, वहीं अब मोबाइल फोन के जरिए जानकारी तुरंत मिल सकती है। ‘मूल्य पूर्वानुमान मॉडल’ किसानों को यह समझने में भी मदद करते हैं कि बाजार में उपज कब बेचनी है, ताकि कीमतों में गिरावट से पहले ही उपज बेची जा सके। इससे मंडियों में एक साथ सप्लाई बढ़ने से होने वाला नुकसान भी कम किया जा सकता है।
भारत और अन्य देशों की कुछ पायलट परियोजनाओं के नतीजों से पता चला हैं कि जब किसान सिंचाई और कीट-पहचान के लिए एआई आधारित समाधान अपनाते हैं, तो उत्पादन में 15 से 20 प्रतिशत तक बढ़ौती होती है; साथ ही संसाधनों की बचत भी संभव है। अफ्रीकी देशों में सूखा निगरानी और फसल बीमा आकलन में एआई का उपयोग किसानों को जोखिम से बचाने में सहायक रहा है। ये संकेत देते हैं कि तकनीक सही ढंग से लागू हो तो वह केवल उत्पादकता ही नहीं, बल्कि वित्तीय सुरक्षा भी बढ़ा सकती है।
फिर भी धरातल पर तस्वीर इतनी सरल नहीं है। शोध परियोजनाओं में सफल दिखने वाले एआई मॉडल वास्तविक खेतों में कई बार अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाते। कारण स्पष्ट हैं—मिट्टी की विविधता, छोटे खेत, मौसम की अनिश्चितता और सीमित डिजिटल ढाँचा। उच्च गुणवत्ता का डेटा और तकनीकी मार्गदर्शन न मिलने पर एआई प्रणाली की सटीकता घट जाती है। यही वजह है कि अधिकांश सफल प्रयोगों में एआई को ऐसे उपकरण के रूप में इस्तेमाल किया गया है, जो निर्णय करने में सहायक हो, न कि किसान के विकल्प के रूप में।
कृषि मशीनरी में एआई का उपयोग भी बढ़ रहा है। जीपीएस आधारित स्वायत्त (आटोनोमस) ट्रैक्टर और कंप्यूटर विज़न से लैस मशीनें बीजारोपण, कीटनाशकों का छिड़काव और कटाई को अधिक कारगर बनाती हैं। इससे ईंधन की बचत 15–20 प्रतिशत तक होती है; साथ ही 30 प्रतिशत तक कार्यकुशलता में सुधार देखा गया है। लेकिन, असमान खेत, प्रकाश की समस्या और फसल विविधता जैसी परिस्थितियाँ होने से पूरी तरह एआई पर निर्भर नहीं हो सकते। ऐसी परिस्थितियों में मानव निगरानी की आवश्यक बनी रहेगी इसलिए तकनीक और किसान का सहयोग ही सबसे व्यावहारिक मॉडल है।
स्पष्ट है कि एआई कृषि का भविष्य बदल सकता है, पर इसकी सफलता केवल तकनीक उपलब्ध कराने से नहीं होगी। ग्रामीण इंटरनेट ढाँचे का विस्तार, किसानों का प्रशिक्षण, सस्ती डिजिटल सेवाएँ और स्थानीय डेटा संग्रह की मजबूत व्यवस्था अनिवार्य हैं। एआई सम्मेलन के बाद सबसे बड़ी चुनौती यही है कि घोषणाओं को खेतों की वास्तविक जरूरतों से जोड़ा जाए। यदि नीति, तकनीक और किसान का अनुभव एक साथ आए, तो एआई ग्रामीण भारत की अर्थव्यवस्था को नई मजबूती दे सकती है।
