मोती मिट्टी में पैदा नहीं होता। यह सीपी के गर्भ में तैयार होता है। सीपी को मोती तैयार करने में बड़ा कष्ट होता है। सीपी को सामान्यतः हम सीप भी कहते हैं। आइये जानें सीपी के बारे में। सीपी, शंख और कौड़ी एक ही वर्ग की सदस्य हैं। जिन प्राणियों की हड्डियों का ढांचा शरीर के भीतर न होकर शरीर के बाहर होता है, विचित्रा जीवों की श्रेणी में आते हैं। सीपी का कई रूपों में उपयोग होता रहा है। इसके बाहर खोल के चूरे को बटन और फर्श में चमक लाने के लिए पहले बहुतायत में उपयोग होता था। इसके अलावा सीपी के खोल पर रंगों की कलाकारी कर अपने घरों के लिए सजावटी वस्तु के रूप में उपयोग भी पुराना है। अब तो कृत्रिम सीपी को सजावट की वस्तु के तौर पर उपयोग किया जाने लगा है। आयुर्वेद में सीपी को कई रोगों में उपयोगी माना गया है। इसके मुलायम मांस में प्रोटीन, कार्बोहाइडेªट, ग्लायकोजिन, सोडियम, क्लोरीन, ब्रोमीन, आयोडीन, कैल्शियम, खनिज लवण, मैग्नीशियम्स गंधक, जस्ता, फास्फोरस, लोहा, तांबा आदि तमाम तत्वों की भरमार है। बहते पानी नदी झीलों, समुद्रों आदि में सीपी पाई जाती है। यह रूके हुए पानी में नहीं रहती। पानी के भीतर पायी जाने वाली सूक्ष्म वनस्पतियों व तमाम हानिकारक जीवों का यह आहार लेती है। सीपी की संसार भर में साठ हजार के आसपास जाति व उपजाति है। इनमें मुख्य रूप से क्वीन कोच, गोल्डन हेलमेट, ट्यूलिप, ब्लीडिंग टूथ, एम्परर हेल्मेट, स्केलप, ऐंजल विंग, टर्की विंग एवं सन डायल हैं। सीपी प्राकृतिक मोती तैयार करती हैं। कवियों की कल्पना है कि सीपी के मुंह में जब स्वाति नक्षत्र की बूंद पड़ती है तो मोती का निर्माण होता है। एक मोती बनाने में सीपी को 3 से 5 वर्ष का समय लगता है। दरअसल, कोई परजीवी अपने विकास क्रम की किसी अवस्था में जब सीपी के शरीर में प्रवेश कर जाता है तो मोती के निर्माण की प्रक्रिया प्रारंभ होती है। मोती बनने तक इससे सीपी को बड़ा कष्ट का अनुभव होता है। दरअसल यह कुछ इस प्रकार की प्रक्रिया है जो महिला या गर्भधारण करने के बाद या अन्य किसी मादा जीव के साथ होती है। यह तो प्राकृतिक ढंग है मोती के निर्माण का परन्तु व्यावसायिक दृष्टिकोण से भी सीपी से अब हम नकली मोती का निर्माण कराते हैं जो सीपी के लिए और भी कष्टदायक होता है।