प्राथमिक शिक्षा एक अच्छे नागरिक के रूप में व्यक्ति की और समूची शिक्षा व्यवस्था की नींव है। विगत कई वर्षों से शिक्षा मंत्रालय द्वारा उच्च और उच्चतर शिक्षण संस्थानों के विस्तार और उन्नयन हेतु विभिन्न योजनाएं लागू की गई हैं। क्या ऐसे में प्राथमिक शिक्षा तंत्र को मजबूत करने की आवश्यकता नहीं है? प्राथमिक और उच्च शिक्षण संस्थानों में सरकारी के स्थान पर निजी संस्थानों का वर्चस्व बढ़ता जा रहा है। सरकारी संस्थानों की बदहाली के कारण मध्यम और निम्न वर्ग आर्थिक तंगी होते हुए भी भारी फीस देकर निजी संस्थानों में जाने को मजबूर है।
वर्ष 1933 में प्रकाशित प्रेमचंद के कर्मभूमि उपन्यास में लिखा है- हमारे स्कूलों और कालेजों में जिस तत्परता से फीस वसूल की जाती है, मालगुजारी भी उतनी सख्ती से नहीं वसूल की जाती… वहां स्थाई रूप से मार्शल ला का व्यवहार होता है। क्या आज भी फीस के नाम पर ऐसे समाचार प्रतिदिन नहीं मिल रहे हैं? विगत दिनों समाचार पत्र में छपा है कि देश के 5,149 सरकारी स्कूल खाली पड़े हैं। आंकड़े यह बताते हैं कि देश में 10.13 लाख सरकारी स्कूलों में से 5,149 स्कूलों में कोई छात्र नहीं है। शैक्षणिक वर्ष 2024-2025 में शून्य नामांकन वाले इन स्कूलों में से 70 प्रतिशत से अधिक तेलंगाना और बंगाल में स्थित हैं।
वर्ष 2024-25 के आंकड़े बताते हैं कि 65,054 स्कूल ऐसे हैं जहां 10 से कम या शून्य नामांकन रहा। आंकड़े यह भी बताते हैं कि छत्तीसगढ़ के 5000 से अधिक सरकारी स्कूलों में केवल एक शिक्षक है जबकि 249 स्कूल ऐसे हैं जिनमें एक भी शिक्षक नहीं है। राष्ट्रीय राजधानी के प्राथमिक और उच्चतर माध्यमिक स्कूलों में वर्षों से हजारों शिक्षक अतिथि रूप में कार्यरत हैं। कई प्राथमिक स्कूलों में नामांकन सौ के नीचे है। देश के कई प्रदेश ऐसे भी हैं जहां पिछले कई वर्षों से शिक्षकों की कोई स्थाई नियुक्ति नहीं हुई है। बंगाल, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बिहार व मध्य प्रदेश आदि कई प्रदेश ऐसे भी हैं जहां जब-जब नियुक्ति प्रक्रिया अथवा नियुक्तियां होती हैं तो वह भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाती हैं।
उत्तराखंड के 1,728 सरकारी स्कूलों में बुनियादी सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं हैं। कहीं भवन नहीं तो कहीं स्कूल तक पहुंचने के रास्ते ठीक नहीं। कहीं शिक्षक नहीं तो कहीं बैठने की व्यवस्था नहीं। प्रदेश के लगभग 1,400 प्राथमिक स्कूलों में शौचालय ही नहीं हैं। देश में लगभग 1300 केंद्रीय विद्यालय हैं जिनमें से 51 केंद्रीय विद्यालय ऐसे हैं जो वर्षों से अस्थाई भवनों अथवा तंबुओं में चल रहे हैं। कुछ महीने पहले ही राजस्थान में सरकारी स्कूल के जर्जर भवन की छत गिरने से विद्यार्थी की मौत हुई। तत्पश्चात राजस्थान, बिहार, पंजाब व हरियाणा आदि के सरकारी स्कूलों की बदहाली के समाचार निरंतरता में छपे थे। ध्यातव्य है कि वर्ष 2025-26 में शिक्षा पर आवंटन 1,28, 650 करोड़ रुपए हुआ है जो विगत एक दशक में लगभग दोगुना है। उच्च शिक्षण संस्थानों की संख्या भी बढ़ी है लेकिन उच्च शिक्षा में सकल नामांकन दर अभी भी लगभग 28.4 प्रतिशत ही है। आज जब देश विकसित भारत के संकल्प के साथ आगे बढ़ रहा है तो क्या उपर्युक्त आंकड़े चिंताजनक नहीं हैं?
सत्य तो यह भी है कि स्वतंत्रता के बाद शिक्षा क्षेत्र में जिन व्यापक बदलावों और योजनाओं की आवश्यकता थी, वे नहीं हुए। वर्ष 1980-90 के दशक में शिक्षा क्षेत्र भी भूमंडलीकरण की चपेट में आ गया। सुनियोजित ढंग से इंटरनेशनल, कान्वेंट और पब्लिक स्कूल के नाम पर प्राइवेट स्कूलों की बाढ़ सी आ गई और सरकारी स्कूल निरंतर बदहाली के शिकार होते चले गए। शासन-प्रशासन मूक दर्शक बना रहा। जनगणना, मतदान,टीकाकरण, खनन माफियाओं की जानकारी, नशा तस्करों की जानकारी, मिड-डे मील पकाना- वितरण करना, पुस्तकें लाना- बांटना, वर्दी लाना- बांटना,छात्रवृत्ति वितरण, आसपास की सफाई, मतदाता सूची का पुनरीक्षण आदि ऐसे काम हैं जिनमें समय-समय पर सरकारी स्कूलों के शिक्षकों को लगा दिया जाता है। क्या ऐसे सभी कार्यों के चलते शिक्षण-अधिगम प्रभावित नहीं होता है? ऐसे स्कूल जहां शिक्षक नहीं हैं अथवा मूलभूत सुविधाएं ही नहीं हैं, ऐसे स्कूलों में कौन अभिभावक अपने बच्चों को पढ़ने के लिए भेजेगा? जिन प्रदेशों में सरकारी स्कूल खाली पड़े हैं, वहां कितने प्राइवेट स्कूल खुल गए और खूब फल फूल रहे हैं, क्या इस बात की जांच नहीं होनी चाहिए? राज्य सरकारों पर स्कूली शिक्षा का विशेष दायित्व है। क्या सरकारी स्कूलों की बदहाली पर राज्यों से प्रश्न नहीं होने चाहिए?
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 मातृभाषा में शिक्षा, प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल, ड्रॉपआउट बच्चों की संख्या कम करना, शिक्षा की सार्वभौमिक पहुंच, डिजिटल एवं ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा, कौशल आधारित शिक्षा आदि के प्रविधान करती है। लेकिन देश के कई प्रदेशों में अभी इसे पूर्णत: लागू करने हेतु मूलभूत तैयारी भी नहीं हो पाई है। देश में शिक्षा और शिक्षण संस्थानों की तस्वीर बदलने और सुशिक्षित समाज हेतु केंद्र सरकार की ओर से विगत कुछ वर्षों से निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं। पीएम श्री स्कूल, समग्र शिक्षा, प्रेरणा, उल्लास, निपुण भारत, विद्या प्रवेश, विद्यांजलि, दीक्षा, स्वयं प्लस, निष्ठा व विद्यालक्ष्मी योजना आदि ऐसे प्रयास हैं जिनसे कुछ बदलाव तो हुए हैं लेकिन ये बदलाव बहुत धीमें हैं। आज वर्ष 2025 में भी पुरुष साक्षरता दर लगभग 85 प्रतिशत है तो वहीं महिला साक्षरता दर लगभग 70 प्रतिशत ही है। उच्च शिक्षा हेतु पुरुषों की तुलना में महिलाओं की संख्या अभी लगभग आधी है। क्या ये आंकड़े अथवा स्थितियां चिंताजनक नहीं हैं?
हाल ही के आंकड़े यह भी बताते हैं कि सरकारी स्कूलों में पढ़ रही ज्यादातर बेटियां प्रदर्शन में अव्वल आ रही हैं। लेकिन क्या उनके लिए विद्यालयों में समुचित व्यवस्था और सुरक्षा आज भी चिंता का विषय नहीं है? क्या यह सत्य नहीं है कि आज भी लगभग प्रतिदिन स्कूल में अथवा स्कूल आते जाते कई बेटियां छेड़छाड़ एवं शोषण से पीड़ित होती हैं? सत्य तो यह भी है कि स्कूलों में शौचालय और सुरक्षा न होने के कारण कई लड़कियां पढ़ाई बीच में ही छोड़ देती हैं। ध्यान रहे ये बेटियां भी विकास में बराबर की भागीदार हो सकती हैं, बशर्ते उन्हें पर्याप्त सुरक्षा की गारंटी और पर्याप्त अवसर मिलें। मिड- डे मील जैसी आवश्यकता- योजनाओं के साथ-साथ सरकार यह भी सुनिश्चित करे कि सरकारी स्कूलों में उच्च स्तरीय ढांचागत सुविधाएं भी मिलेंगी, शिक्षक भी मिलेंगे और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा भी मिलेगी। ध्यान रहे प्राथमिक शिक्षा तंत्र को मजबूत किए बिना उच्च और उच्चतर शिक्षण संस्थानों का मजबूत होना संभव नहीं है।
हाल ही में संसद में प्रश्नों का जवाब देते हुए शिक्षा राज्य मंत्री ने बताया कि 31 अक्टूबर 2024 तक केंद्रीय विश्वविद्यालयों में शिक्षकों के 5,152 पद खाली हैं। परीक्षाओं में धांधली, समय पर परीक्षाएं न होना, समय पर परिणाम न आना, समय पर दाखिले न होना आदि ऐसी अनेक बातें हैं जिनके चलते सरकारी शिक्षण संस्थानों की साख बिगड़ रही है। प्राथमिक स्कूलों के साथ-साथ देश में सैकड़ों महाविद्यालय ऐसे भी हैं जहां मूलभूत और ढांचागत व्यवस्थाओं का नितांत अभाव है। आंकड़े यह भी बताते हैं कि प्रतिवर्ष लाखों भारतीय छात्र विदेशी विश्वविद्यालयों में शिक्षा हेतु जा रहे हैं। वर्ष 2024 में 7,60,000 छात्र विदेश में पढ़ने गए। ध्यान रहे यह स्थिति देश की आर्थिकी के लिए भी बड़ा नुकसान है।
उच्च शिक्षा हेतु विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान महत्वपूर्ण पहल है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी विगत दिनों कहा- हम ऐसी शिक्षा व्यवस्था विकसित करना चाहते हैं जिसमें युवाओं को विदेश जाने की जरूरत न पड़े। मध्यम वर्ग को लाखों-करोड़ों रुपए खर्च करने की जरूरत नहीं पड़े। हम ऐसे संस्थान भी बनाना चाहते हैं जो विदेश से लोगों को भारत आने के लिए आमंत्रित करें।
विकसित भारत एवं विश्व गुरु भारत की राह में शिक्षा से समाज को सशक्त करना एक बड़ी चुनौती और अनिवार्यता है। इसलिए आवश्यक है कि प्राथमिक शिक्षा की दशा सुधारने के लिए अलग शिक्षा अधिष्ठान बने जहां समयबद्ध योजनाएं बनाकर सबसे पहले इसे बदहाली से निकाला जा सके।
डा.वेदप्रकाश
