महर्षि वाल्मीकि ने यहीं किया ‘रामायण’ का काव्य-सृजन

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महर्षि वाल्मीकि काव्य-सृजन के आदि पुरोधा हैं। प्रचेता ऋषि के वंशज महाराज दशरथ के मित्रा और समकालीन ऋषि। अतीन्द्रिय ज्ञान से सम्पन्न जिन्होंने राम के पहले ही रामकथा रच दी थी। फिर रामावतार की घटनाएं अक्षरशः तदनुसार घटित होती गईं।
महर्षि के भारत में बहुतेरे आश्रम और ठिकाने थे लेकिन उत्तरप्रदेश के भदोही जिले की सीतामढ़ी को वह गौरव प्राप्त है जहाँ पहले पहल लुटेरे रत्नाकर को राम का उल्टा नाम लेने के सुफल स्वरूप ऋषित्व की प्राप्ति हुई और रामकथा के विराम काल में भगवती सीता ने जहाँ अपना विवासन व्यतीत किया। यहाँ ही पराक्रम के पुंजीभूत युगल कुमार लव और कुश का जन्म हुआ।
लवकुश जन्म का अनादि साक्षी है सीतामढ़ी का मेला जो आषाढ़ शुक्ल नवमी गुप्त नवरात्रि के अंतिम दिन आयोजित होता आरहा है। यही वह रात्रि थी जब सीता के पुत्रों ने आश्रम के प्रकोष्ठ में किलकारियाँ भरी थी।
सीतामढ़ी को गुमनामियों से बाहर लाने का काम पूज्यपाद गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज ने किया जब वे माघ मेले में प्रयाग से गंगा के किनारे काशी के लिए पैदल चलते हुए अकस्मात इस अरण्य में आकर ठमक गए। उन्हें पूर्वजन्म की स्मृतियाँ सहसा वापस आगईं।
ऐसी मान्यता है कि ‘कलि कलुष निस्तार हेतु वाल्मीकि तुलसी भयो‘। फिर क्या था, बाबा तुलसी यहाँ तीन दिन रुके रहे और अनुभूतियों के सागर में गोते लगाते रहे। यहाँ कवितावली के तीन कवित्त की रचना कर भक्तों, विद्वानों और विवेचकों को तीन बहुमूल्य रत्नों का उपहार सौंप दिया।
‘जहाँ बाल्मीकि भये ब्याध तें मुनिन्द साधु
मरा-मरा जपि सुनि सीख ऋषि सात की।
सिय को निवासु लवकुस को जन्म थलु
अंकित जो जानकी चरन जलजात की।’
—तुलसी कवितावली
यहाँ वाल्मीकि का हृदय परिवर्तन, सीता का निवास, लवकुश का जन्मस्थल आदि को रेखांकित करते हुए तुलसीदास ने आत्मानुभूति प्रकट कर दी कि यहाँ माता जानकी के चरण कमलों के चिह्न विद्यमान हैं।
तुलसीदास जी की इस यात्रा का प्रमाण उनके समकालीन मित्रा महाकवि बाबा वेणीमाधव दास ने अपनी कृति ‘मूल गुसाँई चरित‘ में दिया है।
‘सीता बट तर तीन दिन
बसि सुकबित्त बनाय।
बंदि छोडावत बिंध नृप
पहुँचे कासी जाय।।‘
अर्थात तुलसीदास ने सीतामढ़ी में तीन दिवस निवास किया, यहाँ के माहात्म्य पर तीन कवित्त की रचना की और तदनंतर विंध्यनरेश से मिलते हुए काशी पहुँचे।
इस संबंध में मेरा व्यक्तिगत भाव है कि वाल्मीकि की भूमि से ही उन्होंने रामचरितमानस की रचना की प्रेरणा और आशीर्वाद ग्रहण किया जिसे काशी में आकार प्राप्त हुआ।
कालांतर में काशिराज्य की ओर से इस स्थान को प्रभूत प्रोत्साहन मिला। मंदिर को काफी भूमि देकर कुछ नियमित धनराशि की भी व्यवस्था की गई। गंगा किनारे सीता और लवकुश की प्राचीन प्रतिमाएं बौद्धकालीन बताई गई हैं। अंतिम काशीनरेश श्री विभूतिनारायण सिंह का यहाँ से अत्यधिक जुड़ाव था।
विगत तीन दशक में इस स्थान का कायाकल्प हो गया। जहाँ जंगल था, आज मंगल है। नार-खोह टीलों की जगह सड़कें, भव्य इमारतें, स्कूल, अस्पताल, प्रतिष्ठान और अतिथिभवन छागए हैं। मंदिरों का नयनाभिराम शिल्प लोगो को आकर्षित करता है। ब्रह्मलीन स्वामी जितेन्द्रानंद तीर्थ एवं दिल्ली के उद्योगपति स्वर्गीय सत्यनारायण प्रकाशपुंज के योगदान ने इस पुण्यभूमि की दशा ही बदल दी।
अंत में एक विषय स्पष्ट करना आवश्यक है कि सीतामढ़ी दो क्यों है? पहली सीतामढ़ी बिहार में है जो सीता के प्राकट्य का स्थान है और यह सीतामढ़ी सीता के वनवास की भूमि है। भगवती का भू-प्रवेश कहाँ हुआ, यह शोध एवं पृथक आलेख का विषय है।

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