धन के देवता कुबेर

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आरंभ में कुबेर एक अनार्य देवता थे। उनका वैदिक ब्राह्मणों के साथ मेल नहीं बैठता था। चौथी-पांचवीं शताब्दी में वैष्णव धर्म के उत्थान के साथ जब लक्ष्मी की धन की देवी के रूप में प्रतिष्ठा हुई, तब लोग कुबेर को भुलने लगे। धीरे-धीरे वे उपेक्षित होकर दिक्पाल के रूप में मंदिरों के बाह्य अलंकरण के साधन मात्रा रह गए।
‘वाराह पुराण‘ में कथा है- जब ब्रह्मा ने सृष्टि रचने का उपक्रम किया, तब उनके मुख से पत्थरों की वृष्टि होने लगी और आंधी तथा तूफान आए। कुछ देर बाद जब आंधी शांत हुई, तब उन्होंने अपने मुख से निकले हुए उन पत्थरों से एक अलौकिक पुरूष की रचना की। फिर उसे धनाधिपति बनाकर देवताओं के धन का रक्षक नियुक्त कर दिया। वही कुबेर के नाम से प्रख्यात हुआ।
रामायण के उत्तराकंड में कुबेर के संबंध में एक दूसरी ही कथा दी हुई है। उसके अनुसार बह्मा के मानस पुत्रा पुलस्त्य हुए और इनके वैश्रवण नामक एक पुत्रा हुआ। इसका दूसरा नाम कुबेर था। वह अपने पिता को छोड़ कर अपने पितामह ब्रह्मा के पास चला गया और उनकी सेवा करने लगा। इससे प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने उसे अमरत्व प्रदान किया, साथ ही धन का स्वामी बनाकर लंका का अधिपति भी बना दिया तथा पुष्पक विमान प्रदान किया।
पुलस्त्य इससे बहुत रूष्ट हुए और अपने शरीर से एक दूसरा पुत्र विश्रवस, पैदा किया। उसने अपने भाई वैश्रवण को बड़े ही क्रूर भाव से देखा। तब कुबेर ने अपने पिता को संतुष्ट करने के लिए तीन राक्षसियां भेंट कीं जिनके नाम थे- पुष्पोलट, मालिनी और रामा। पुलस्त्य के पुष्पोलट से रावण और कुंभकर्ण, मालिनी से विभीषण और रामा से खर दूषण और शूर्पणखा उत्पन्न हुई।
ये लोग अपने सौतेले भाई कुबेर की संपत्ति को देखकर उससे द्वेष करने लगे। रावण ने तप करके ब्रह्मा को प्रसन्न किया और उससे मनचाहा रूप धारण करने तथा सिर कटने पर फिर जम जाने का वर प्राप्त किया। वर पाकर वह लंका आया और कुबेर को लंका से निकाल बाहर किया। निदान कुबेर गंधमादन पर्वत पर चले गए।
कुबेर का नगर आलक, कैलाश पर्वत पर जहां शिव का निवास स्थान है, वहां बताया गया है। कहा जाता है कि वह बहुत भव्य, परकोटे से घिरा हुआ नगर है। वहां न केवल यक्ष वरन किन्नर, मुनि, गंधर्व और राक्षस भी रहते हैं। कैलास पर्वत के उस नगर में अनेक सुंदर प्रासाद, उद्यान और झीलें हैं। उनमें चैत्रा रथ नामक उद्यान मुख्य है। उसकी पत्तियों के रूप में रत्न और फलों के रूप में अति सुंदर अप्सराएं लटकती हैं। संभवतः यह भौतिक सुखों की चरम अभिव्यक्ति को अलंकृत रूप में व्यक्त करने का रूपक है।
कुबेर के धन का देवता बनने के पीछे उनके पूर्वजन्म से संबंध रखने वाली भी कुछ अनुश्रुतियां हैं। एक अनुश्रुति है कि वे पूर्वजन्म में चोर थे। एक दिन वे एक मंदिर में चोरी करने के लिए घुसे और माल देखने के लिए जो दीपक जलाया, वह बुझ गया। इस तरह उस चोर ने दस बार दीपक जलाया और वह हर बार बुझता गया। इस रोशनी के जलने और बुझने को मंदिर में प्रतिष्ठित शिव ने अपनी आराधना समझ लिया। फलतः वे प्रसन्न हो गए और उनकी प्रसन्नता के कारण वह चोर दूसरे जन्म में धन का देवता कुबेर हुआ।
महाभारत में कहा गया है कि सोना, वायु और अग्नि के सहारे पृथ्वी से निकटता है। यहां अग्नि से भट्ठी, वायु से धौंकनी और कुबेर से सोना निकालने वाले का तात्पर्य जान पड़ता है। संभवतः कुबेर ही पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने सोने को जमीन से निकाल कर पिघलाया। वे उत्तर दिशा के दिक्पाल कहे गए हैं। भारत में सोना उत्तर से ही आता था।
अनुश्रुतियों तथा उनके यक्ष रूप से यही जान पड़ता है कि आरंभ में कुबेर एक अनार्य देवता थे और उनका आरंभ में वैदिक ब्राह्मणों के साथ मेल नहीं बैठता था। बाद में उनका वैदिक हिंदू धर्म में प्रवेश हुआ। देवताओं की पंक्ति में आ जाने पर कुबेर की नाना प्रकार से पूजा की जाने लगी। ‘गृहय सूत्रों‘ में वैवाहिक कर्मकांड में ईशान के साथ-साथ कुबेर का भी आहवान करने का विधान है। धनद अथवा वसुध के रूप में उनकी पूजा जनसाधारण किया करते थे। कौटिल्य ने भी लिखा है कि कुबेर की मूर्ति खजाने के तहखाने में स्थापित की जानी चाहिए।
प्राचीन भारत में कुबेर के स्वतंत्र मंदिर होते थे। इसका पता बेसनगर(विदिशा के निकट) से प्राप्त दूसरी शती ईसा पूर्व के एक ध्वज स्तंभ के शीर्ष से लगता है। कुबेर का निवास वट वृक्ष कहा गया है। इस शीर्ष के वट वृक्ष में एक घड़ा और रूपयों से भरी दो थैलियां दिखाई गई हैं।  

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