कन्याकुमारी

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कन्याकुमारी भारत का वह दक्षिणी छोर है, तो तीन ओर से समुद्र से घिरा हुआ है। इसके दक्षिण में हिन्द महासागर, पूर्व में बंगाल की खाड़ी और पश्चिम में अरब सागर है। यहां तीन समुद्रों का मिलन या संगम होता है। यहां बंगाल की खाड़ी का सूर्योदय और अरब सागर का सूर्यास्त दोनों मनोहारी दृश्य होते हैं। इसके अलावा कन्याकुमारी प्रसिद्ध तीर्थ भी है। यहां तपस्या करने वाली कुमारी कन्या का मंदिर है। कहते हैं कि भगवान शिव को पाने के लिये पार्वती जी ने यहां तपस्या की। इन्हीं के नाम पर इस स्थान का नाम कन्याकुमारी पड़ा। देवी के मंदिर के निकट पूूर्व में बंगाल की खाड़ी के तट पर सावित्री, गायत्री, सरस्वती आदि दक्षिण में हिन्द महासागर के तट पर मातृ, पितृ, भीमा आदि और पश्चिम में अरब सागर के तट पर सुचीन्द्रम मंदिर आदि स्थान हैं। तीर्थयात्री ‘पाप विनाशम्Ó पुष्करिणी और समुद्र के स्नान घाट में स्नान करते हैं।   मंदिर से थोड़ी दूर पर ही सोलह स्तंभों वाला मंडप और स्नान घाट है। वहां तीनों समुद्रों का संगम होता है। मंदिर में देवी-दर्शन के लिये कमर से ऊपर के सारे वस्त्र उतारकर जाना पड़ता है। संभवत: देवी बिना किसी आवरण के ही सच्ची भक्ति से प्रसन्न होती है।   देवी कुमारी होने से यहां मंदिर में कुछ नहीं चढ़ता। बहुत से यात्री निरन्तर प्रज्जवलित रहने वाले दीप के लिये तेल दान करते हैं। मंदिर के अंदर कई अन्य प्रतिमायें भी हैं।
मंदिर से लगा हुआ कन्याकुमारी का बाजार है। प्राय: सभी दुकानों पर बाहर के कक्ष के अलावा अंदर एक खंड होता है, जिसमें साडिय़ां, घडिय़ां, कैमरे आदि चीजें रहती हैं। बाहर इन दुकानदारों के एजेंट घूमते रहते हैं और बाहर से आये यात्री को अंदर ले जाते हैं। प्राय: ऐसे दुकानदार बहुत चालाक होते हैं और यात्री की मनोवैज्ञानिकता का फायदा उठाते हैं।
 विवेकानंद शिला तक आने जाने के लिये स्टीमर एक कंपनी चलाती है। इसके बगल में ही नावों का अड्डा है। जमीन से विवेकानंद शिला तक बीच बीच में चट्टानों की एक श्रृंखला है, परंतु बीच में काफी अंतराल हैं। स्वामी विवेकानंद तैरकर इस शिला तक पहुंचे थे और वहां रूककर ध्यान किया था। इस प्रकार समुद्र पार करके इस शिला तक पहुंचना अत्यंत दुष्कर कार्य है,क्योंकि इसके चारों ओर समुद्र काफी गहरा है और समुद्र की लहरें चट्टान से टकराकर मन में सिहरन उत्पन्न करती है। स्टीमर चट्टानों की श्रंृखला से कुछ हटकर समुद्र के खुले स्थान से विवेकानंद शिला की ओर जाता है और करीब आधे घंटे में पहुंचा देता है।
विवेकानंद शिला काफी बड़ी है। इसमें विवेकानंद की स्मृति में सुंदर स्मृति भवन बनाया गया है। इसके प्रवेश द्वार पर अगल-बगल काले पत्थर के दो हाथी हैं। अंदर के वृहद कक्ष में स्वामी विवेकानंद की बड़ी प्रतिमा है। वहां स्वामी रामकृष्ण परमहंस और उनकी पत्नी के विशाल चित्र भी रखे गये हैं। इसके पीछे एक बड़ा ध्यान कक्ष है। वहां हल्की रोशनी रहती है। सामने की दीवार पर ‘ऊँÓ अंकित है।
 यात्री यहां कुछ देर बैठकर शांति लाभ करते हैं। शिला के दूसरे भाग में कन्याकुमारी का एक छोटा मंदिर है, जिसमें कन्याकुमारी के चरण-चिन्ह अंकित हैं। कहते हैं कि यहां खड़े रहकर कन्याकुमारी ने तपस्या की थी। समुद्र के बीच में भारत के सीमांत पर स्थित यह स्थान है भी एकांत साधना के योग्य।
भारत के सीमांत प्रहरी के रूप में कन्याकुमारी की महिमा अपार है।  दक्षिण पूर्व और पश्चिम दिशाओं में समुद्र का असीम विस्तार दिखायी देता था। एक लहर दूसरी लहर पर सवार होकर फैलती हुई विलीन हो जाती थी और फिर आकर चट्टान से टकरा जाती थी। समुद्र अलग-अलग भागों में अलग-अलग रंगों में प्रतिभाषित हो रहा था। इसमें तीन रंग साफ दिख रहे थे- उजला-मटमैला, नीला और काला।
लोगों का कहना था कि ये तीन समुद्रों के अलग-अलग रंग हैं। आकाश में कहीं खुलापन, कहीं बादल और कहीं सूर्य की रोशनी में चमकते हुये बादलों के टुकड़े होते हैं। समुद्र में इनका प्रतिबिंब पड़ता है इसलिये समुद्र कई अलग-अलग रंगों में दिखाई देता है।

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