भारत अपनी सीमाओं को केवल जमीन पर ही नहीं, बल्कि आसमान में भी सुरक्षित करने के लिए एक ऐसा एयर डिफेंस सिस्टम तैयार कर रहा है, जिसे पार करना किसी भी दुश्मन के लिए नामुमकिन होगा। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद भारत ने अपनी रक्षा रणनीति में एक बड़ा बदलाव किया है और अब पूरा फोकस ‘प्रोजेक्ट कुशा’ पर है।
इसे ‘मिशन सुदर्शन चक्र’ का नाम भी दिया जा रहा है। सरल शब्दों में कहें तो यह एक ऐसा एयर डिफेंस सिस्टम है जो ड्रोन, फाइटर जेट और मिसाइलों को आसमान में ही ढूँढकर उन्हें आग के गोले में तब्दील कर देगा। डीआरडीओ (रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन) के वैज्ञानिकों ने पुष्टि की है कि यह सिस्टम साल 2030 से भारतीय वायुसेना का हिस्सा बनना शुरू हो जाएगा।
जानकारों के अनुसार प्रोजेक्ट कुशा असल में भारत का अपना स्वदेशी ‘लॉन्ग रेंज एयर डिफेंस सिस्टम’ (एलआरएसएएम) है। आपने रूस के प्रसिद्ध एस-400 सिस्टम के बारे में सुना होगा, प्रोजेक्ट कुशा को भारत का एस-400 ही माना जा रहा है। इसकी सबसे बड़ी खासियत इसका ‘लेयर्ड डिजाइन’ है। इसका मतलब है कि यह सिस्टम एक नहीं, बल्कि तीन अलग-अलग स्तरों पर सुरक्षा प्रदान करेगा।
डीआरडीओ की लैब के निदेशक ए राजू के अनुसार, इस प्रोजेक्ट में तीन तरह की मिसाइलें विकसित की जा रही हैं- मार्क-1, मार्क-2 और मार्क-3। ये तीनों मिसाइलें मिलकर 60 किलोमीटर से लेकर 350-400 किलोमीटर तक के दायरे में एक अभेद्य सुरक्षा चक्र बनाएँगी। अगर कोई दुश्मन मिसाइल 350 किमी दूर है, तो उसे मार्क-3 संभाल लेगा, और अगर कोई खतरा पास आ गया है, तो मार्क-1 और मार्क-2 उसे खत्म कर देंगे।
प्रोजेक्ट कुशा की ये तीन मिसाइलें भारत की इंटरसेप्शन क्षमता (दुश्मन को बीच में ही रोकने की शक्ति) को नई ऊँचाइयों पर ले जाएँगी। रिपोर्ट के अनुसार, मार्क-1 (एम1) मिसाइल की मारक क्षमता लगभग 150 किलोमीटर तक होगी। यह उन खतरों के लिए है जो मध्यम दूरी तक पहुँच चुके हैं। इसके बाद आती है मार्क-2 (एम2), जिसकी रेंज 250 किलोमीटर तय की गई है।
सबसे खतरनाक है मार्क-3 (एम3), जो भारत की इंटरसेप्शन पावर को 350 से 400 किलोमीटर तक पहुँचा देगी। बताया जा रहा है कि यह सिस्टम इतना एडवांस होगा कि यह न केवल फाइटर जेट्स, बल्कि क्रूज मिसाइलों और ‘हाई-वैल्यू’ हवाई खतरों (जैसे दुश्मन के जासूसी विमान) को भी पलक झपकते ही पहचान लेगा। वायुसेना की योजना इसके 10 स्क्वाड्रन खरीदने की है, जो अगले दशक में भारत की हवाई सुरक्षा का मुख्य स्तंभ बनेंगे।
भारत अब तक लंबी दूरी के एयर डिफेंस के लिए रूस या अन्य देशों पर निर्भर रहता था। एस-400 का आना एक बड़ी बात थी, लेकिन प्रोजेक्ट कुशा भारत को इस मामले में ‘आत्मनिर्भर’ बना देगा। ‘मिशन सुदर्शन चक्र’ के तहत भारतीय वैज्ञानिक मिसाइल गाइडेंस, सीकर तकनीक (जो मिसाइल को रास्ता दिखाती है) और प्रोपल्शन सिस्टम जैसी जटिल तकनीकों को खुद भारत में ही विकसित कर रहे हैं। जब यह सिस्टम पूरी तरह तैयार हो जाएगा, तो यह भारत के मौजूदा सिस्टम जैसे ‘आकाश’ (जो कम दूरी के लिए है) और एस-400 (जो बहुत लंबी दूरी के लिए है) के बीच के खाली स्थान को भर देगा। आकाश, कुशा और एस-400 मिलकर एक ऐसी ‘मल्टी-लेयर’ सुरक्षा बनाएँगे कि दुश्मन का एक परिंदा भी भारतीय वायुक्षेत्र में पर नहीं मार सकेगा। इसे 2035 तक पूरी तरह से तैनात करने का लक्ष्य रखा गया है।
बताया जा रहा है कि प्रोजेक्ट कुशा अब केवल कागजों पर नहीं है, बल्कि यह डेवलपमेंटल ट्रायल के अहम फेज में प्रवेश कर रहा है। इसका मतलब है कि अब इन मिसाइलों के वास्तविक परीक्षण शुरू होने वाले हैं। पहले डीआरडीओ इसके तकनीकी ट्रायल करेगा, जिसमें देखा जाएगा कि मिसाइल का इंजन और रडार सही काम कर रहे हैं या नहीं। इसके बाद भारतीय वायुसेना के साथ ‘यूजर ट्रायल’ होंगे।
जानकारों के अनुसार रणनीतिक दृष्टि से यह प्रोजेक्ट भारत की स्थिति को दुनिया के उन चुनिंदा देशों की कतार में खड़ा कर देगा, जिनके पास अपना खुद का मल्टी-लेयर्ड एयर डिफेंस नेटवर्क है। इससे न केवल हमारी हवाई सुरक्षा बढ़ेगी, बल्कि युद्ध के समय हमारे रणनीतिक ठिकानों (जैसे परमाणु प्लांट, बड़े शहर और सैन्य बेस) को किसी भी तरह के एरियल थ्रेट से सुरक्षा की गारंटी मिलेगी।
इस प्रोजेक्ट की सबसे बड़ी जीत इसकी स्वदेशी तकनीक है। जब हम विदेशी सिस्टम खरीदते हैं, तो उनकी मरम्मत और पार्ट्स के लिए हमें दूसरे देशों की शर्तों पर निर्भर रहना पड़ता है। लेकिन ‘प्रोजेक्ट कुशा’ या ‘सुदर्शन चक्र’ पूरी तरह हमारा अपना होगा। यह भारत के वैज्ञानिकों की काबिलियत का प्रमाण है कि हम एस-400 के टक्कर का सिस्टम खुद तैयार कर रहे हैं। 2030 से जब इसकी तैनाती शुरू होगी, तब भारत का आकाश वास्तव में एक ‘अभेद्य किला’ बन चुका होगा। यह ‘न्यू इंडिया’ की वह तस्वीर है जो न केवल अपनी रक्षा करना जानती है, बल्कि तकनीक के मामले में दुनिया को चुनौती देने के लिए भी तैयार बताया जा रहा है।
रामस्वरूप रावतसरे
