अमेरिका-यूरोप-इजरायल के खिलाफ चीन-रूस-ईरान में बढ़ती आर्थिक-सामरिक भागीदारी के वैश्विक निहितार्थ

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जहां एक तरफ अमेरिका और ईरान के बीच मतभेद आए दिन गहराते जा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ ईरान का रूस और चीन के साथ आर्थिक और सामरिक समझौता लगातार मज़बूत होता जा रहा है। निकट भविष्य में इसके और प्रगाढ़ होने के आसार हैं। देखा जाए तो यह पारस्परिक और त्रिपक्षीय समझदारी दुनिया भर में ही सीमित नहीं रहेगी, बल्कि यह खाड़ी और अरब देशों में अमेरिकी/इजरायली-पश्चिमी वर्चस्व, वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था और व्यापार-ऊर्जा संरचना पर सीधा प्रभाव डालेगी। ऐसा ही हो भी रहा है।

इस घटनाक्रम से कमोबेश भारत की कूटनीतिक और रणनीतिक स्वायत्तता भी प्रभावित होगी। इसलिए आइए इस रणनीतिक घटनाक्रम के विभिन्न विश्वव्यापी प्रभावों को क्रमबद्ध रूप से समझते हैं। क्योंकि अमेरिका-यूरोप-इजरायल के खिलाफ चीन-रूस-ईरान में बढ़ती आर्थिक-सामरिक भागीदारी के वैश्विक निहितार्थ स्पष्ट हैं।

 

पहला, वैश्विक शक्ति संतुलन पर प्रभाव: रूस–चीन–ईरान “त्रिकोण” पश्चिमी प्रभुत्व वाली एकध्रुवीय दुनिया के विरोध में एक बहुध्रुवीय व्यवस्था का प्रतीक बन रहा है। ये तीनों देश अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं (जैसे UN Security Council) में एक–दूसरे की राजनयिक ढाल बनकर किसी भी नई प्रतिबंध‑प्रस्ताव या दबाव–अभियान को ब्लॉक करते हैं, जिससे अमेरिकी–यूरोपीय नीतिगत साधनों की प्रभावकारिता कम होती है। 

 

दूसरा, संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था: रूस और चीन के पास संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में स्थायी सदस्यता के कारण वीटो शक्ति है, जिसका उपयोग अक्सर ईरान के खिलाफ तेजी से कार्रवाई रोकने के लिए किया जाता है। लिहाजा इन शक्तियों का एकजुट सामने होने से गैर‑प्रसार (non‑proliferation) और प्रतिबंधों को लागू करने वाले नियम‑ढांचों पर दबाव पड़ता है, जिससे “आधिकार‑आधारित वैश्विक कानून” की छवि दर्जनों वर्षों के इतिहास भर में पहली बार चुनौती पर है। 

 

तीसरा, प्रतिबंधों और “सैनेक्शन‑इवेज़न” की नई व्यवस्था:  ईरान, रूस और चीन तीनों पर पश्चिम की तरफ से सख्त या असमय आर्थिक प्रतिबंध लगे हैं, जिसने इन्हें “sanctions‑resistant” आर्थिक जाल (रूबल–युआन–रियाल, तृतीय‑पक्ष अंतर‑बैंकिंग, जैव‑ईंधन/कच्चा तेल ट्रेड मार्ग) विकसित करने को प्रेरित किया है। खासकर ईरान के “25‑year China deal” (2021) और 20‑वर्षीय “Russia–Iran Comprehensive Strategic Partnership Treaty” (2025) के तहत ऊर्जा, रेल–परिवहन, अंतर्देशीय बंदरगाहों और संचार‑इंफ्रास्ट्रक्चर पर सामंजस्य बढ़ा है, जिससे पश्चिमी वित्तीय नियंत्रण मंद पड़ रहा है। 

 

चतुर्थ, सैन्य–सुरक्षा त्रिकोण और उपक्षेत्रीय तनाव: रूस ने यूक्रेन युद्ध में ईरानी “कामिकेज़” ड्रोन का इस्तेमाल किया, जिसके बदले में ईरान को मिसाइल, उपग्रह और साइबर तकनीक मिली, जिससे दोनों की सैन्य संलग्नता गहरी हुई। इसलिए तीनों देशों ने पर्शियन खाड़ी, हिन्द महासागर और SCO ढांचे में संयुक्त नौसेना व फ़ौजी अभ्यास किए, जिससे अमेरिकी‑गठबंधन बेड़े को प्रतिद्वंद्विता प्रदान करने की क्षमता मजबूत हुई है। 

 

पांचवां, मध्य पूर्व, मध्य एशिया और भारत के लिए परिणाम: ईरान का रूस–चीन समर्थन उसे ना केवल ऊर्जा बाजारों बल्कि सीरिया, इराक, येमन, गाजा तट जैसे युद्धों/संघर्षों में अमेरिकी–इज़रायली दबाव के बावजूद लचीला रहने की क्षमता दे रहा है, जिससे सामूहिक क्षेत्रीय अस्थिरता बनी रहती है। इससे मध्य एशिया और प्राचीन “सिल्क रोड” मार्गों पर चीन और रूस के आपसी प्रतिद्वंद्विता के बीच ईरान की जगह ऊर्जा‑टिकाऊ, लॉजिस्टिक और दक्षिण–पश्चिम मार्ग के रूप में उभरी है, जिससे भारत जैसी तृतीय बड़ी शक्तियां भी अपने संतुलन‑राजनीति (balancing act) को संवेदनशील तरीके से संभालने को बाध्य हैं। 

 

छठा, ऊर्जा बाजार और डॉलर के वैश्विक दबाव पर: रूस और चीन ईरानी तेल–गैस को भुगतान में युआन–रूबल–रियाल सहित उपकरणों का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिससे अंतरराष्ट्रीय तेल व्यापार में अमेरिकी डॉलर के लिए वैकल्पिक “सेटलमेंट व्यवस्था” धीरे‑धीरे मजबूत हो रही है। यद्‍यपि ये तीनों प्रमुख साबस्क्राइप्टर्स नहीं हैं, फिर भी उनकी समन्वित नीतियां “carbon‑credit” व शुल्क‑आधारित वैश्विक धाराओं को टिकाऊ रूप से चुनौती देती हैं, जिससे मानव‑निर्मित जलवायु समझौते की वार्ता भी राजनीतिक रंग ढाल रही है। 

 

सातवां, भारत और दक्षिण एशिया के लिए निहितार्थ: भारत ओमान, अन्य Persian गल्फ देशों और चीन–पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) के साथ‑साथ ईरान–दबाव संदर्भ में अपनी नई पनडुब्बी–तट रेखा, ऊर्जा‑सुरक्षा और साइबर मित्रता रणनीति को “हल्के” हथियारों के साथ बनाने पर मजबूर है। ईरान की रूस–चीन‑समर्थित ऊर्जा‑सुरक्षा नीतियों और उनका चक्रवात‌‑प्रवण क्षेत्र तटीय मार्गों पर प्रभाव; भारतीय महासागरीय योजनाओं (जैसे SAGAR) के लिए जटिल, लेकिन अनिवार्य तौर पर नई “मल्टी‑अक्टर” गठबंधन—निर्माण अभ्यास की मांग है। 

अमेरिका-यूरोप-इजरायल के खिलाफ चीन-रूस-ईरान में बढ़ती आर्थिक-सामरिक भागीदारी के वैश्विक निहितार्थ

 

कमलेश पांडेय

वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

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