डिजिटल धोखाधड़ी के जरिये 54 हजार करोड़ रुपये का गबन ‘डकैती’ के समान, एसओपी बनाए केंद्र: न्यायालय

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नयी दिल्ली, नौ फरवरी (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने डिजिटल धोखाधड़ी के जरिये 54 हजार करोड़ रुपये के गबन को पूरी तरह से लूट और डकैती करार देते हुए सोमवार को केंद्र सरकार को ऐसे मामलों से निपटने के लिए आरबीआई, बैंकों और दूरसंचार विभाग जैसे हितधारकों के साथ चर्चा करके मानक संचालन प्रक्रिया बनाने का निर्देश दिया।

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया की पीठ ने कहा कि डिजिटल धोखाधड़ी के जरिये गबन की गई धनराशि कई छोटे राज्यों के बजट से अधिक है।

अदालत ने पाया कि इस तरह के अपराध बैंक अधिकारियों की मिलीभगत या उनकी लापरवाही के कारण हो सकते हैं।

शीर्ष अदालत ने आरबीआई और बैंकों की ओर से समय पर कार्रवाई किए जाने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया।

अदालत ने कई नए निर्देश जारी करते हुए गृह मंत्रालय से कहा कि वह भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) तथा दूरसंचार विभाग की इसी तरह की एसओपी या निर्णयों पर विचार करे और ऐसे अपराधों से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए चार सप्ताह में एक सहमति पत्र (एमओयू) का मसौदा तैयार करे।

पीठ को बताया गया कि आरबीआई ने साइबर धोखाधड़ी को रोकने के लिए डेबिट कार्ड को अस्थायी रूप से रोकने (होल्ड) के संबंध में बैंकों की ओर से की जाने वाली कार्रवाई निर्दिष्ट करते हुए एक एसओपी तैयार की है।

अदालत ने सीबीआई को ‘डिजिटल अरेस्ट’ के मामलों की पहचान करने का निर्देश दिया और गुजरात तथा दिल्ली सरकारों से कहा कि वे इन मामलों में जांच के लिए सीबीआई को आवश्यक स्वीकृति प्रदान करें।

उच्चतम न्यायालय ने आरबीआई, दूरसंचार विभाग और अन्य संबंधित पक्षों को संयुक्त रूप से एक बैठक आयोजित करके डिजिटल अरेस्ट मामलों में मुआवजा प्रदान करने के लिए एक ढांचा तैयार करने का निर्देश भी दिया। अदालत ने कहा कि डिजिटल अरेस्ट के शिकार लोगों को मुआवज़ा देने के मामलों में व्यावहारिक व उदार दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है। अदालत ने याचिका को चार सप्ताह बाद आगे की सुनवाई के लिए सूचीबद्ध कर दिया।

अदालत ने संबंधित प्राधिकरणों से अगली सुनवाई से पहले ताज़ा स्थिति रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया।

पीठ ने 16 दिसंबर को केंद्र सरकार से कहा था कि वह डिजिटल अरेस्ट पीड़ितों के लिए मुआवजा सुनिश्चित करने के संबंध में न्यायमित्र के सुझावों पर विचार करे। साथ ही उसने साइबर अपराधियों द्वारा देश से बाहर ले जाई जा रही भारी धनराशि पर चिंता भी जताई थी।

‘डिजिटल अरेस्ट’ साइबर अपराध का एक बढ़ता हुआ स्वरूप है, जिसमें ठग कानून प्रवर्तन एजेंसियों, अदालतों या सरकारी विभागों के अधिकारियों के रूप में खुद को प्रस्तुत करके ऑडियो और वीडियो कॉल के माध्यम से पीड़ितों को डराते-धमकाते हैं। वे पीड़ितों को उलझाकर रखते हैं और उन पर पैसे देने का दबाव डालते हैं।

एक दिसंबर को शीर्ष अदालत ने सीबीआई को डिजिटल अरेस्ट मामलों की एकीकृत, देशव्यापी जांच करने का निर्देश दिया था और आरबीआई से यह भी पूछा था कि वह साइबर अपराधियों द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे बैंक खातों का पता लगाने और उन्हें ‘फ्रीज़’ करने के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) का उपयोग क्यों नहीं कर रहा है।

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