नरेन्द्र देवांगन एक था आशू। बड़ा था धांसू। मां हो जाती काम से पस्त पर खेलकूद में रहता वह मस्त। था अगले सोमवार का उसे इंतजार। उस दिन वह होने वाला सात पार। अच्छी खासी थी उसके पापा की तनखा। जन्मदिन मनाया उसने ढेरों गुलाबजामुन खा। वैसे वह शैतान का नाना था। पर सच का बड़ा दीवाना था। घर में कोई न बिटिया थी। बड़े दिनों की छुट्टियां थीं। एक दिन जिद कर बैठा आशू। मां से बोला, ‘मैं जोधपुर जाऊंगा।‘ बीकानेर वह रहता था। नाना का बड़ा चहेता था। पापा उसके थे बड़े कमाऊ। मम्मी ने सोचा कि मैं भी पीहर हो आऊं। ससुराल में बस काम ही काम। कुछ तो करूं मैं भी आराम। आशू की जिद हुई न फेल। मम्मी-पापा संग चढ़ा वह रेल। आशू ने आइसक्रीम खाई। कुछ देर में रेल ने सीटी बजाई। रेल चली छुक-छुक….छुक-छुक…..छुक-छुक… मम्मी देखे आशू का मुख। रेल में चंद भिखारी थे। आशू के पापा अधिकारी थे। वैसे वे लगते थे धाकड़। टी.टी.को देख गायब हो गई उनकी अकड़। आशू के पापा के मन का चोर जागा जब टी.टी.ने आशू का आधा टिकट मांगा। इससे पहले कि टी.टी.जुर्माने का चालान टटोले। आशू के पापा गिड़गिड़ा कर बोले, ‘हजूर, यह बच्चा तो आपके ही शहर का है। अभी तो यह केवल चार साल का है।‘ आशू से अब रहा न गया। पापा का झूठ सहा न गया। यूं आशू था दिल का भोला। सबके सामने जोर से बोला, ‘पिछले सोमवार को तो मेरा जन्मदिन मना था। मैंने सात मोमबत्तियां जला कर, बड़ा सा केक काटा था। आपने चूमा था मेरा माथा, भूल गए क्या पापा?‘ टी.टी.समझ गया आशू है भोला। प्यार से वह आशू के पापा से बोला, ‘इस बार छोड़ दिया पर आगे से आप बच्चे का आधा टिकट ले कर ही चला कीजिए जनाब।‘