इंसान को अप्रासंगिक नहीं बनाएगा एआई, मानवीय क्षमताओं को देगा मजबूतीः सिस्को अध्यक्ष

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नयी दिल्ली, 21 फरवरी (भाषा) अमेरिकी प्रौद्योगिकी कंपनी सिस्को के अध्यक्ष एवं मुख्य उत्पाद अधिकारी जीतू पटेल ने कृत्रिम मेधा (एआई) के कारण इंसानों के अप्रासंगिक हो जाने की आशंका को निराधार बताते हुए कहा है कि असली सफलता मानवीय निर्णय-क्षमता और मशीनी स्तर के स्वचालन के संयोजन में निहित है।

पटेल ने यहां ‘पीटीआई-भाषा’ के साथ खास बातचीत में कहा, “मुझे ऐसा कोई परिदृश्य नहीं दिखता जहां समाज में मनुष्यों का योगदान पूरी तरह समाप्त हो जाए। यह बात काफी दूर की कौड़ी लगती है।”

उन्होंने तर्क दिया कि मनुष्यों के अप्रासंगिक हो जाने की आशंका एआई की पूरक भूमिका को नजरअंदाज करती है।

उन्होंने कहा, “असल में जादू तब होता है जब आप मानवीय सहज बुद्धि और निर्णय क्षमता को एआई के बड़े पैमाने पर स्वचालन के साथ जोड़ते हैं।”

पटेल ने कहा कि एआई प्रणालियां तेजी से उन्नत हो रही हैं। चैटबॉट से लेकर ऐसे स्वायत्त एजेंट तक हैं जो खुद निर्णय लेकर कदम उठा सकते हैं। लेकिन ये उपकरण मानव क्षमताओं की जगह लेने के लिए नहीं, बल्कि उन्हें मजबूती देने के लिए बनाए गए हैं।

हालांकि सिस्को के वरिष्ठ अधिकारी ने यह स्वीकार किया कि स्वचालन बढ़ने के साथ नौकरियों की प्रकृति बदलेगी और कुछ भूमिकाएं समाप्त भी हो सकती हैं, लेकिन साथ ही नए उद्योग और अवसर भी पैदा होंगे।

उन्होंने कहा, “कुछ नौकरियां भले खत्म हो जाएं और हर नौकरी का स्वरूप बदल जाए, लेकिन एआई के कारण पूरी तरह नए उद्योग पैदा होंगे, जिनका पहले वजूद नहीं था। ये हमें समाज में अलग तरीके से योगदान करने का अवसर देंगे।”

पटेल ने कहा कि एआई से मनुष्यों के सार्थक कार्य से वंचित हो जाने की धारणा असल में मानव स्वभाव की मूलभूत समझ की कमी को दर्शाती है।

पटेल ने कहा कि यदि एआई को जिम्मेदारी के साथ विकसित किया जाए तो यह मानवीय क्षमताओं को बढ़ा सकता है।

उन्होंने कहा कि जीवन को केवल ‘समुद्र तट को निहारने’ तक सीमित कर देना उसके असली मकसद को चुनौती देगा, क्योंकि मनुष्य में सृजन, योगदान और मूल्य जोड़ने की स्वाभाविक प्रेरणा होती है।

उन्होंने कहा कि मानवीय रचनात्मकता इतनी गहराई से जुड़ी है कि समाज अपना उद्देश्य मशीनों को नहीं सौंप सकता। भले ही एआई समय के साथ असाधारण क्षमताएं विकसित कर ले, इससे मानवीय योगदान की प्रासंगिकता समाप्त नहीं होगी।

पटेल ने कहा, “असली बहस यह नहीं है कि एआई कितना शक्तिशाली बनेगा, बल्कि यह है कि क्या मनुष्य अपना मूल्य खो देंगे। सहानुभूति, रचनात्मकता और समाज में योगदान की प्रवृत्ति मशीनों में नहीं आ सकती है।”

उन्होंने कहा कि एआई को जटिल कार्य करने के लिए प्रशिक्षित किया जा सकता है लेकिन जुड़ाव, देखभाल और निर्णय की मानवीय इच्छा अनूठी है। एआई के ‘डिजिटल सहकर्मी’ के रूप में कार्यस्थलों का हिस्सा बनने के साथ मानवीय निगरानी और साझेदारी इससे सर्वोत्तम परिणाम हासिल करने के लिए अनिवार्य होंगे।

उन्होंने कहा, “मैं इस धारणा को खारिज करता हूं कि एआई की प्रगति का मतलब समाज में मानवीय योगदान का अंत है। हमें मशीन-स्तर की क्षमता के लिए एआई का इस्तेमाल करना चाहिए, लेकिन यह काम अत्यधिक मानव-केंद्रित दृष्टिकोण के साथ हो।”

पटेल ने कहा कि दुनिया अभी एआई के विकास के दूसरे बड़े चरण में है। पहला चरण चैटबॉट का था, जो सवालों के जवाब देने में सक्षम थे। उन्होंने कहा, “यह जादू जैसा लगा था… लेकिन जल्द ही सामान्य लगने लगा।”

उन्होंने हालात के हिसाब से खुद को ढालने की इंसानी क्षमता का उदाहरण देते हुए ‘वायमो’ की स्वचालित कारों का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि पहली बार बिना ड्राइवर वाली कार में बैठना असाधारण अनुभव लगता है, लेकिन कुछ ही बार में यह सामान्य हो जाता है।

उन्होंने कहा कि प्रौद्योगिकी में बदलाव की रफ्तार के साथ इंसान की अनुकूलन क्षमता भी तेज बनी रहेगी और आज विज्ञान-कथा जैसी लगने वाली बात जल्द ही सामान्य हो जाएगी।

पटेल ने लागत के मुद्दे पर कहा कि एआई को प्रशिक्षित करना और चलाना अभी महंगा है, लेकिन लागत तेजी से सुधर रही है। उन्होंने कहा कि समय बीतने के साथ एआई मॉडल में एक सवाल पर आने वाली लागत काफी कम होने की उम्मीद है।

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