मानव शरीर असीम रहस्यों का भण्डार है। मनुष्य का मस्तिष्क भगवान द्वारा दिया हुआ सबसे महत्त्वपूर्ण धन और अंश है। यह सुपर कंप्यूटर है जो सारे शरीर की सूक्ष्म से सूक्ष्म नाडि़यों को व्यवस्थित रूप से संचालित करता है।
इसकी कार्यशीलता पर ही सफलता और असफलता निर्भर करती है। साधारणतः मस्तिष्क का केवल तीन से सात प्रतिशत भाग ही सक्रिय हो पाता है। शेष सुप्त रहता है जिसमें असीम ज्ञान छिपा रहता है।
ऐसी विलक्षण शक्ति को जाग्रत करने के कुछ उपाय यहां प्रस्तुत किए जा रहे हैं।
दोनों कानों के नीचे के भाग को अँगूठे और उँगलियों से दबा कर नीचे की ओर खींचें। पूरे कान को ऊपर से नीचे करते हुए मरोड़ें। सुबह चार-पांच मिनट और दिन में जब भी समय मिले, कान के नीचे के भाग को खींचें।
सिर व गरदन के पीछे बीच में मेडुसा नाड़ी होती है। इस पर उँगली से तीन-चार मिनट मालिश करें। इससे एकाग्रता बढ़ती है और पढ़ा हुआ याद रहता है।
ज्ञान मुद्रा – प्रातः उठ कर पदमासन या सुखासन में बैठकर हाथों की तर्जनी उँगली के अग्र भाग को अँगूठे से मिलाकर रखने से ज्ञान मुद्रा बनती है।
शेष उँगलियाँ सहज रूप से सीधी रखें, आँखें बंद और कमर व रीढ़ सीधी, यह अत्यंत महत्त्वपूर्ण मुद्रा है। इसका हितकारी प्रभाव समस्त वायुमंडल और मस्तिष्क पर पड़ता है।
ज्ञानमुद्रा पूरे स्नायुमंडल को सशक्त बनाती है। विशेषकर मानसिक तनाव से होने वाले दुष्प्रभावों को दूर कर मस्तिष्क के ज्ञान तंतुओं को सबल बनाती है। ज्ञान मुद्रा के निरंतर अभ्यास से मस्तिष्क की सभी विकृतियां और रोग दूर होते हैं जैसे पागलपन, उन्माद, विक्षिप्तता, चिड़चिड़ापन, अस्थिरता, अनिश्चितता, क्रोध, आलस्य, घबराहट, अनमनापन, व्याकुलता, भय आदि।
मन शांत हो जाता है और चेहरे पर प्रसन्नता झलकती है। ज्ञानमुद्रा विद्यार्थियों के लिए वरदान है। इसके अभ्यास से स्मरण शक्ति और बुद्धि तेज होती है।
अकारण उँगलियों को चटकाना, पंजा लड़ाना और उँगलियों को अनुचित रूप से चलाना आदि आदतें मस्तिष्क और स्नायुमंडल पर बुरा प्रभाव डालती हैं। इससे प्राण शक्ति का हृास होता है और स्मरण शक्ति कमजोर होती है, अतः इनसे बचना चाहिए।
देशी गाय के शुद्ध घी में एक बादाम कुचल कर डाल दें और उसे गरम करके ठंडा कर लें। तत्पश्चात् छान कर रख लें। रात को सोते समय यह घी दो – दो बूंद दोनों नासिका के छिद्रों में थोड़ा गुनगुना करके डालें।
घी ड्रापर वाली शीशी में रख लें। डालने से पहले ड्रापर की शीशी गरम पानी में रखें और फिर गरम होने पर नाक में डालें।
यही घी नाभि में डालकर चार-पाँच बार घड़ी की दिशा में और चार-पाँच बार घड़ी की विपरीत दिशा में घुमाएं। फिर उस पर गीले कपड़े की पट्टी रखें। ऐसा करीब दस पन्द्रह मिनट करें। दक्षिण दिशा में सिर रखकर सोएँ।
सोते वक्त दोनों की पैरों की पदतलियों में अपने हाथ से घी से मालिश करें। इससे नींद अच्छी आती है, मस्तिष्क में शांति, प्रसन्नता और सक्रियता आती है और मनोबल बढ़ता है।
चार-पाँच बादाम की गिरी पीसकर गाय के दूध और मिश्री में मिलाकर पीने से मानसिक शक्ति बढ़ती है। आयुर्वेद के अनुसार ब्राह्मी, शंखपुष्पी, वच, असगंध, जटामांसी, तुलसी समान मात्रा में लेकर चूर्ण का प्रयोग नित्य प्रति दूध के साथ करने पर मानसिक शक्ति, स्मरण शक्ति में वृद्धि होती है।
उत्तर दिशा में मुँह करके पिरामिड की आकृति की टोपी पहनकर पढ़ाई करने से पढ़ा हुआ बहुत शीघ्र याद होता है। टोपी कागज, गत्ता या मोटे कपड़े की बनाई जा सकती है।
पढ़ाई में सफलता प्राप्त करने हेतु मन लगाकर पढ़ना, रूचिपूर्वक पढ़ना अत्यंत आवश्यक है। असफलता का अर्थ है कि सफलता का प्रयास पूरे मन से नहीं किया गया।
रात्रि को सोते समय अपने दिन भर के किए हुए कार्यों पर चिंतन-मनन करना, उनकी समीक्षा करना, गलतियों के प्रति खेद व्यक्त करना और उन्हें पुनः न दोहराने का संकल्प लेना चाहिए। प्रातः सोकर जागते समय ईश्वर को नया जन्म देने हेतु धन्यवाद देना चाहिए और पूरा दिन अच्छे कार्यों में व्यतीत करने का संकल्प लेकर पूरे दिन की योजना बनाकर बिस्तर छोड़ना चाहिए।
ऐसी विलक्षण शक्ति को जाग्रत करने के कुछ उपाय यहां प्रस्तुत किए जा रहे हैं।
दोनों कानों के नीचे के भाग को अँगूठे और उँगलियों से दबा कर नीचे की ओर खींचें। पूरे कान को ऊपर से नीचे करते हुए मरोड़ें। सुबह चार-पांच मिनट और दिन में जब भी समय मिले, कान के नीचे के भाग को खींचें।
सिर व गरदन के पीछे बीच में मेडुसा नाड़ी होती है। इस पर उँगली से तीन-चार मिनट मालिश करें। इससे एकाग्रता बढ़ती है और पढ़ा हुआ याद रहता है।
ज्ञान मुद्रा – प्रातः उठ कर पदमासन या सुखासन में बैठकर हाथों की तर्जनी उँगली के अग्र भाग को अँगूठे से मिलाकर रखने से ज्ञान मुद्रा बनती है।
शेष उँगलियाँ सहज रूप से सीधी रखें, आँखें बंद और कमर व रीढ़ सीधी, यह अत्यंत महत्त्वपूर्ण मुद्रा है। इसका हितकारी प्रभाव समस्त वायुमंडल और मस्तिष्क पर पड़ता है।
ज्ञानमुद्रा पूरे स्नायुमंडल को सशक्त बनाती है। विशेषकर मानसिक तनाव से होने वाले दुष्प्रभावों को दूर कर मस्तिष्क के ज्ञान तंतुओं को सबल बनाती है। ज्ञान मुद्रा के निरंतर अभ्यास से मस्तिष्क की सभी विकृतियां और रोग दूर होते हैं जैसे पागलपन, उन्माद, विक्षिप्तता, चिड़चिड़ापन, अस्थिरता, अनिश्चितता, क्रोध, आलस्य, घबराहट, अनमनापन, व्याकुलता, भय आदि।
मन शांत हो जाता है और चेहरे पर प्रसन्नता झलकती है। ज्ञानमुद्रा विद्यार्थियों के लिए वरदान है। इसके अभ्यास से स्मरण शक्ति और बुद्धि तेज होती है।
अकारण उँगलियों को चटकाना, पंजा लड़ाना और उँगलियों को अनुचित रूप से चलाना आदि आदतें मस्तिष्क और स्नायुमंडल पर बुरा प्रभाव डालती हैं। इससे प्राण शक्ति का हृास होता है और स्मरण शक्ति कमजोर होती है, अतः इनसे बचना चाहिए।
देशी गाय के शुद्ध घी में एक बादाम कुचल कर डाल दें और उसे गरम करके ठंडा कर लें। तत्पश्चात् छान कर रख लें। रात को सोते समय यह घी दो – दो बूंद दोनों नासिका के छिद्रों में थोड़ा गुनगुना करके डालें।
घी ड्रापर वाली शीशी में रख लें। डालने से पहले ड्रापर की शीशी गरम पानी में रखें और फिर गरम होने पर नाक में डालें।
यही घी नाभि में डालकर चार-पाँच बार घड़ी की दिशा में और चार-पाँच बार घड़ी की विपरीत दिशा में घुमाएं। फिर उस पर गीले कपड़े की पट्टी रखें। ऐसा करीब दस पन्द्रह मिनट करें। दक्षिण दिशा में सिर रखकर सोएँ।
सोते वक्त दोनों की पैरों की पदतलियों में अपने हाथ से घी से मालिश करें। इससे नींद अच्छी आती है, मस्तिष्क में शांति, प्रसन्नता और सक्रियता आती है और मनोबल बढ़ता है।
चार-पाँच बादाम की गिरी पीसकर गाय के दूध और मिश्री में मिलाकर पीने से मानसिक शक्ति बढ़ती है। आयुर्वेद के अनुसार ब्राह्मी, शंखपुष्पी, वच, असगंध, जटामांसी, तुलसी समान मात्रा में लेकर चूर्ण का प्रयोग नित्य प्रति दूध के साथ करने पर मानसिक शक्ति, स्मरण शक्ति में वृद्धि होती है।
उत्तर दिशा में मुँह करके पिरामिड की आकृति की टोपी पहनकर पढ़ाई करने से पढ़ा हुआ बहुत शीघ्र याद होता है। टोपी कागज, गत्ता या मोटे कपड़े की बनाई जा सकती है।
पढ़ाई में सफलता प्राप्त करने हेतु मन लगाकर पढ़ना, रूचिपूर्वक पढ़ना अत्यंत आवश्यक है। असफलता का अर्थ है कि सफलता का प्रयास पूरे मन से नहीं किया गया।
रात्रि को सोते समय अपने दिन भर के किए हुए कार्यों पर चिंतन-मनन करना, उनकी समीक्षा करना, गलतियों के प्रति खेद व्यक्त करना और उन्हें पुनः न दोहराने का संकल्प लेना चाहिए। प्रातः सोकर जागते समय ईश्वर को नया जन्म देने हेतु धन्यवाद देना चाहिए और पूरा दिन अच्छे कार्यों में व्यतीत करने का संकल्प लेकर पूरे दिन की योजना बनाकर बिस्तर छोड़ना चाहिए।
