ईरान बनाम अमेरिका- विनाशक युद्ध की आहट और दुनिया

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ईरान आज जिस दौर से गुजर रहा है, वह केवल एक देश की आंतरिक अशांति नहीं है बल्कि वैश्विक राजनीति का वह विस्फोटक मोड़ है जहाँ से छद्म लोकतंत्र और मजहबी कट्टरता के टकराव से  उठी एक चिंगारी पूरी दुनिया को झुलसा सकती है।

  आज उनके अयातुल्लाह काम नहीं शासन के ख़िलाफ़ तेहरान समेत ईरान के कई शहरों और कस्बों की सड़कों पर उमड़ता विद्रोही जन सैलाब, उबलता जनाक्रोश, सरकार की दमनकारी नीतियां और इसके समानांतर हर हाल में दुनिया का दरोगा बनने की आठ धर्मी पर अड़े अमेरिका की सैन्य चेतावनियाँ उस त्रिकोण का निर्माण कर रहे हैं जिसके केंद्र में विनाशकारी युद्ध की आशंका लगातार गहराती जा रही है।

   ईरान में चल रहे विरोध प्रदर्शन अब केवल आर्थिक शिकायतों तक सीमित नहीं हैं। महंगाई, बेरोज़गारी और गिरती जीवन-स्तर की पीड़ा ने जिस असंतोष को जन्म दिया है, ईरान में जिस गति से महंगाई बढ़ी है उससे वहां के लोगों का जीना मुहाल हो गया है, ईरानी मुद्रा रियाल डॉलर के मुकाबले रसातल में जा चुकी है । अब तो  विद्रोहियों के समर्थन में उमड़ना हुआ जन सैलाबसीधे-सीधे शासन व्यवस्था की वैधता पर सवाल बन चुका है। 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद यह पहली बार है जब ईरान का धर्मतंत्र जनता के इतने बड़े हिस्से से वैचारिक रूप से कटता हुआ दिखाई देता है। महिलाओं, युवाओं, छात्रों और शहरी मध्यम वर्ग की भागीदारी ने इन प्रदर्शनों को साधारण विरोध से कहीं आगे पहुँचा दिया है और एक तरह से सीरिया जैसे हालातो की तरफ बढ़ता दिखाई दे रहा है।

 जहां सरकार विरोधी विद्रोही हिंसा एवं आगजनी पर उतरे हुए हैं तथा सरकार के तख्त पलट के पक्ष में खड़े दिखाई देते हैं  वहीं सरकार की प्रतिक्रिया भी उतनी ही कठोर से कठोरता होती जा रही है। इंटरनेट ब्लैकआउट, सामूहिक गिरफ्तारियाँ, सुरक्षा बलों की गोलीबारी और मृत्युदंड ये सब संकेत देते हैं कि ईरान में खामनेई सत्ता पर किसी भी कीमत पर नियंत्रण छोड़ने को तैयार नहीं हैं।

   हालांकि ईरानी नेतृत्व इसे विदेशी साजिश करार देता है, लेकिन यह तर्क अब घरेलू स्तर पर भी असर खोता जा रहा है। सवाल यह नहीं कि विरोध क्यों हो रहे हैं, सवाल यह है कि क्या मौजूदा व्यवस्था उन्हें लंबे समय तक दबा पाएगी?

   आंतरिक उथल-पुथल के बीच अमेरिका और ईरान के बीच तनाव एक बार फिर ख़तरनाक ऊँचाई पर पहुँच गया है। अमेरिका मानवाधिकार उल्लंघनों और ईरान के परमाणु कार्यक्रम को आधार बनाकर लगातार दबाव बना रहा है। प्रतिबंधों का नया दौर, सैन्य चेतावनियाँ और मध्य-पूर्व में अमेरिकी नौसैनिक तैनाती इस बात का संकेत हैं कि वाशिंगटन ‘देखो और इंतजार करो’ की नीति से आगे बढ़ने का विकल्प खुला रखे हुए है।

   हालाँकि, यह समझना ज़रूरी है कि अमेरिका भी पूर्ण युद्ध नहीं चाहता। इसकी वज़ह  वाशिंगटन की उदारता या शांतिप्रियता नहीं अपितु यूक्रेन युद्ध, इज़राइल-गाज़ा संघर्ष और घरेलू राजनीतिक दबावों के बीच एक और बड़े युद्ध का बोझ उठाना वाशिंगटन के लिए आसान नहीं होगा। यही कारण है कि अमेरिका की रणनीति फिलहाल सीमित सैन्य कार्रवाई, आर्थिक दबाव और कूटनीतिक धमकियों तक सिमटी दिखती है।   इतिहास गवाह है कि युद्ध अक्सर योजनाओं से नहीं, दुर्घटनाओं से शुरू होते हैं।

     यह तो तय है कि अगर अमेरिका और ईरान के बीच सीधा युद्ध होता है, तो उसके प्रभाव केवल इन दो देशों तक सीमित नहीं रहेंगे। ईरान के लिए इसका अर्थ होगा—तेल रिफाइनरियों, सैन्य ठिकानों और परमाणु संयंत्रों पर हमले, अर्थव्यवस्था का लगभग ठप हो जाना और संभवतः गृहयुद्ध जैसी स्थिति। बेशक सबसे भारी कीमत आम नागरिकों को चुकानी पड़ेगी, जिनके लिए शांति पहले ही दुर्लभ हो चुकी है।

   अमेरिका के लिए यह युद्ध सैन्य रूप से भले ही नियंत्रित रहे लेकिन राजनीतिक और रणनीतिक रूप से महँगा साबित होगा। मध्य-पूर्व में फैले अमेरिकी सैन्य अड्डे प्रतिशोध के निशाने पर होंगे। घरेलू स्तर पर युद्ध-विरोधी माहौल और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिका की ‘नैतिक नेतृत्व’ वाली छवि को और भी ज़्यादा झटका लगेगा।        

   इससे भी अहम बात यह है कि अमेरिका का ध्यान एशिया-प्रशांत क्षेत्र से हटेगा, जो उसके दीर्घकालिक रणनीतिक हितों के विपरीत है। वैश्विक स्तर पर इसका सबसे तात्कालिक असर ऊर्जा बाजारों पर पड़ेगा। होरमुज़ जलडमरूमध्य में जरा-सी अस्थिरता भी तेल की कीमतों को 120–150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुँचा सकती है। इसका सीधा अर्थ है—वैश्विक महंगाई, आर्थिक मंदी और विकासशील देशों पर असहनीय दबाव। यूरोप, जो पहले ही ऊर्जा संकट से जूझ रहा है, सबसे अधिक प्रभावित होगा।

     इस परिदृश्य में चीन और रूस की भूमिका भी समझना ज़रूरी है। दोनों ही देश ईरान के संकट को अपने-अपने रणनीतिक लाभ के रूप में देख रहे हैं। चीन अमेरिका को मध्य-पूर्व में उलझा देखना चाहता है ताकि एशिया में उसकी पकड़ ढीली पड़े। रूस के लिए यह पश्चिमी एकता को कमजोर करने और ऊर्जा कीमतों से लाभ उठाने का अवसर है। लेकिन चीन या रूस कोई भी ईरान के लिए अमेरिका से सीधा युद्ध लड़ने को तैयार नहीं है। ईरान उनके लिए साझेदार कम, रणनीतिक साधन अधिक है।

   भारत के लिए यह स्थिति विशेष चिंता का सबब है। तेल आयात पर निर्भर भारतीय अर्थव्यवस्था पर महंगाई का सीधा असर पड़ेगा। रुपये पर दबाव बढ़ेगा, शेयर बाजारों में अस्थिरता आएगी और खाड़ी देशों में काम कर रहे लाखों भारतीयों की सुरक्षा एक गंभीर प्रश्न बन जाएगी। साथ ही, ईरान के साथ चाबहार बंदरगाह और अफगानिस्तान संपर्क जैसी रणनीतिक परियोजनाएँ भी प्रभावित होंगी। हालाँकि, संकट के बीच अवसर भी छिपे होते हैं। भारत की संतुलित और स्वायत्त विदेश नीति उसे एक संभावित मध्यस्थ की भूमिका में ला सकती है लेकिन इसके लिए शर्त यह है कि भारत किसी भी खेमे में खड़ा होने की जल्दबाज़ी न करे।

अस्तु,, ईरान का संकट केवल एक देश की संप्रभुता एवं संकट की कहानी नहीं उस वैश्विक व्यवस्था का आईना है जहाँ दमन, असमानता और शक्ति-राजनीति मिलकर अस्थिरता को जन्म देती हैं। युद्ध शायद अभी टल सकता है, लेकिन उसके बीज बोए जा चुके हैं। सवाल यह नहीं कि दुनिया इस आग को देख रही है या नहीं, सवाल यह है कि क्या वह इसे फैलने से रोकने के लिए समय रहते कुछ करेगी।

डॉ घनश्याम बादल
लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं

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