गायत्री महामंत्र में निहित रोगोपचार की शक्ति

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गायत्री महामंत्र की सामथ्र्य सर्वविदित है। इसका प्रयोग जिस भी क्षेत्र में किया जाता है, उधर ही सफलता प्राप्त होती चली जाती है। एक ओर जहां इस छोटे से आदिमंत्र में वह ज्ञान और प्रकाश-प्रेरणा भरी पड़ी है, जिससे अज्ञान, अंधकार और अभाव को दूर किया जा सकता है और अंतर्निहित सूक्ष्मशक्ति केंद्रों को जाग्रत कर एक ऐसी मनोभूमि तैयार की जा सकती है, जिस पर ईश्वरीय सत्ता केन्द्रीभूत होने के लिए अपना आसन लगाने की स्वीकृति प्रदान करती है। वहीं दूसरी ओर यह वह विज्ञान और विद्या है, जिससे शक्ति का उद्भव होता है, प्राण शक्ति बढ़ती है और दीर्घायु प्राप्त होती है। अथर्ववेद में गायत्री महिमा का गान करते हुए स्पष्ट उल्लेख है कि यह आयु, प्राणशक्ति, कीर्ति, धन और ब्रह्मïतेज प्रदान करने वाली है। मंत्र जप का लाभ मानसिक ओजस्विता, बौद्धिक प्रखरता, आत्मिक वर्चस्व, के रूप में तो मिलता ही है, आरोग्य प्राप्ति, आयु वृद्धि, विपत्ति निवारण जैसी अगणित भौतिक उपलब्धियां इसकी विशेषता हैं।
गायत्री महामंत्र का बार-बार लयबद्ध उच्चारण करने से मानवीय मन मस्तिष्क एवं हृदय असाधारण रूप से प्रभावित होता है। इस संदर्भ में वैज्ञानिकों ने गहन अनुसंधान किए और पाया है कि मंत्रोच्चार से ध्यान की गहराई में मन को प्रवेश करने का अवसर मिलता है, जिसका प्रतिफल ‘अल्फा स्टेटÓ के रूप में ई.ई.जी. मशीन पर प्रत्यक्ष देखा जा सकता है। ‘अल्फा स्टेटÓ मन की वह अवस्था होती है जिसका बाह्यï रूप शांतचित्त और आंतरिक प्रफुल्लता के रूप में दृष्टिगोचर होता है, जबकि आंतरिक रूप से अंत: करण में दैवी गुणों का विकास होता है और अतीन्द्रिय क्षमताएं जाग्रत होती हैं। मंत्र जप मानवीय चेतना को मथ डालने वाली संसार की सर्वाधिक शक्तिशाली प्रक्रिया है। उससे न केवल असाधारण शारीरिक, मानसिक क्षमता प्राप्त होती है, वरन् आत्मिक विभूतियों और भौतिक सिद्धियों को भी हस्तगत किया जा सकता है।
मंत्र में ध्वनियां होती हैं। ध्वनियों के समूह को ही मंत्र कहते हैं। विज्ञानवेत्ताओं ने शब्द विज्ञान, ध्वनि विज्ञान पर कई प्रयोग-परीक्षण किए हैं और अनेक प्रत्यक्ष चमत्कार प्रस्तुत किए हैं। आज चिकित्सा उपचार से लेकर ध्वंसात्मक प्रयोजनों तक में इसे प्रयुक्त किया जाने लगा है। ध्वनि तरंगों पर नित नए परीक्षण किए जा रहे हैं। जर्मनी के मूर्धन्य वैज्ञानिकों ने विविध परीक्षणों के आधार पर निष्कर्ष प्रस्तुत करते हुए कहा है कि मानवीय काया पर ध्वनि तरंगों का विशेषकर मंत्र का अद्भुत प्रभाव पड़ता है। उन्होंने ‘ऊँÓ के उच्चारण से निकलने वाली ध्वनि तरंगों से उत्पन्न शक्ति का वर्णन करते हुए लिखा है कि यदि ‘ऊँÓ का उच्चारण विधिपूर्वक किया जाए तो उससे एक मोटी दीवार तक फट सकती है। इसी तरह का निष्कर्ष फ्रांस की एक महिला वैज्ञानिक मि. वाटसह्यïजा ने अपनी पुस्तक में प्रस्तुत किया है। उनके अनुसार मंत्र जप से हृदय और मस्तिष्क विशेष रूप से प्रभावित होते हैं। नियत समय पर प्रतिदिन नियमित रूप से जप करते रहने पर क्रमश: मानसिक एवं आत्मिक शक्तियों का उद्भव होता है। प्राणशक्ति का अभिवद्र्धन, आरोग्य प्राप्ति एवं दीर्घायु जैसे भौतिक लाभ तो इसके सहज परिणाम हैं। मानवीय काया में संजीवनी शक्ति, प्राणशक्ति की घट-बढ़ होने पर शारीरिक एवं मानसिक संतुलन गड़बड़ा जाता है और अनेकानेक प्रकार की व्याधियां धर दबोचती हैं। चिकित्सा विज्ञानी प्राणायाम पर अनेक विधाओं द्वारा इसकी पूर्ति करने का मार्ग सुझाते हैं। गायत्री महामंत्र का जप इस आवश्यकता की पूर्ति आसानी से कर देता है। यह प्रक्रिया हानि रहित भी है और निरापद भी। गायत्री का अर्थ ही है-प्राणों का त्राण-रक्षा करने वाली। ‘गयÓ माने प्राण और ‘त्रीÓ त्राण करने वाली। इस उपक्रम को अपनाकर मनुष्य विपुल परिमाण में प्राण संचय कर सकता है और महाप्राण बनकर जरूरतमंदों की भी सहायता कर सकता है।
भारतीय आध्यात्म शास्त्रों में इस तरह के अनेक मंत्रों का उल्लेख है जिनके भाव प्रणव जप से चिकित्सकीय लाभ उठाए जा सकते हैं। इन मंत्रों में गायत्री महामंत्र की महत्ता एवं उपादेयता सर्वोपरि है। गायत्री महामंत्र सूर्य का मंत्र है, जिसका प्राण जीवन शक्ति से सीधा संबंध है। यह अपने उपासक जपकर्ता को सर्वप्रथम आयु अर्थात दीर्घायु प्रदान करती है और प्राणवान बनाती है। वैज्ञानिक प्रयोग परीक्षणों से भी अब इस तथ्य की पुष्टि हो गई है कि इस महामंत्र का जप करने से मनुष्य की जीवन शक्ति में असाधारण रूप से अभिवृद्धि होती है। चिकित्सा विज्ञान की भाषा में जिसे ‘इम्यूनिटीÓ अर्थात् रोग प्रतिरोधी क्षमता कहते हैं, वह और कुछ नहीं प्राणशक्ति की अधिकता ही है। इसके क्षीण होने पर ही मनुष्य रोगी बनता है। गायत्री मंत्र का जप करते रहने पर समूची काया धीरे-धीरे प्राण प्रखरता से भरती जाती है और भीतरी एवं बाहरी रोगाणुओं से शरीर की रक्षा करने के साथ-साथ दीर्घायु प्रदान करती है। गहनता पूर्वक जांच परख करने पर पाया गया है कि इस मंत्र का जप करते रहने पर श्वांसों की संख्या स्वाभाविक रूप से कम हो जाती है। यह एक मिनट में 15 के स्थान पर सात रह जाती है। प्राय: प्रत्येक स्वस्थ व्यक्ति 24 घंटे में 21600 बार श्वांस लेता है अर्थात् एक मिनट में 15 बार। प्राणायाम परक यौगिक क्रियाओं से श्वांस-प्रश्वांस पर नियंत्रण साधा और उसकी गति को कम किया जाता है। जप द्वारा भी यही प्रक्रिया संपन्न होती है। इस तरह से यदि कोई व्यक्ति एक घंटा प्रतिदिन जप करता है तो समझा जाना चाहिए कि उसकी आयु में लगभग 500 श्वांसों की आयु वृद्धि हो गई। इस तरह से यदि वह इस प्रक्रिया को निरंतर जारी रखता है तो जीवन में कई वर्षों की वृद्धि हो सकती है।
इस संदर्भ में जबलपुर मेडिकल कॉलेज के वरिष्ठ चिकित्सा विज्ञानी एवं हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. आर.एस. शर्मा ने गंभीरता पूर्वक परीक्षण किया था। उन्होंने अपनी अनुसंधानपूर्ण कृति ‘थेरॅप्यूटिकल बेनिफिट्सÓ में लिखा है कि मंत्र जप आत्मोथान में सहायक तो होता ही है, साथ ही साथ इसके प्रभाव से शारीरिक मानसिक स्वास्थ्य में भी अभूतपूर्व सफलता मिलती है। गायत्री महामंत्र के नियमित जप का मनुष्य के आयुष्य एवं जीवनक्रम पर क्या प्रभाव पड़ता है? इस प्रयोग परीक्षण के लिए 40 से 80 वर्ष आयु के 20 व्यक्तियों को चुना गया जो जप करते थे, साथ ही संबंधित व्यक्तियों के परिवार से एक-एक ऐसे व्यक्ति को लिया गया जो जप नहीं करता था। दोनों समूहों का आहार बिहार समान रखा गया। उनके प्रारंभिक स्वास्थ्य परीक्षण के साथ ई.सी.जी., ई.ई.जी., ब्लडप्रेशर आदि भी नोट कर लिए गए। यह भी परख लिया गया कि किसी व्यक्ति को उच्च रक्तचाप या कोई अन्य हृदय संबंधी बीमारी तो नहीं है। तीन वर्ष तक बराबर त्रैमासिक परीक्षण किया जाता रहा। मंत्र जप करने वाले समूह के जो परीक्षण परिणाम सामने आए, वे अद्भुत थे। पाया गया कि जो व्यक्ति जप कर रहे थे, उनके रक्त दाब एवं हृदय गति क्रमश: कम हो गई थी, परंतु जो जप नहीं कर रहे थे उनके हृदय की गति एवं रक्त दाब अपेक्षाकृत बढ़े चढ़े थे।  पहले ग्रुप में न तो किसी को उच्च रक्तचाप की बीमारी थी और न ही ‘एन्जाइनाÓ जैसा हृदय रोग। उनमें से किसी को कार्डियोवैस्कुलर या सेरिब्रो वैस्कुलर बीमारियों से मरते भी नहीं  देखा गया, जबकि दूसरे ग्रुप के कई व्यक्ति इन्हीं बीमारियों से ग्रस्त होकर दम तोड़ते देखे गए।
हृदय की गतियों पर सामान्य मनुष्यों का कोई नियंत्रण नहीं होता, लेकिन योगाभ्यास के लिए हृदय की धड़कन एवं नाड़ी गति आदि को इच्छानुसार घटा, बढ़ा लेना, उसकी लयबद्धता को सुस्थिर बना देना, एक सामान्य क्रिया होती है। इस प्रक्रिया द्वारा हृदय की अनैच्छिक पेशियों को वशवर्ती बनाया जा सकता है। हृदय की असामान्य गति-‘सायनस टेकीकर्डियाÓ से लेकर हृदयाघात तक की प्राणघातक बीमारियों से गायत्री मंत्र द्वारा छुटकारा पाया जा सकता है।
इस मंत्र द्वारा हृदय की लयबद्धता को न केवल नियमित बनाया जा सकता है, वरन् असामयिक मरण से भी छुटकारा पाया जा सकता है। इस तथ्य की पुष्टि करने के लिए डॉ. शर्मा ने 16 से 70 वर्ष आयु के 266 व्यक्तियों पर 17 दिन से लेकर एक वर्ष तक गायत्री मंत्र के प्रभाव का परीक्षण किया। इनमें से अधिकतर कार्डियक परिमियांस, आट्रियल टैकीकार्डिया जैसे विभिन्न प्रकार के हृदय रोगों से पीडि़त थे। इन्हें नियमपूर्वक गायत्री महामंत्र का जप कराया गया। एक वर्ष बाद पाया गया कि हृदय रोगों में दी जानी वाली प्रचलित औषधियों की अपेक्षा इस महामंत्र का अधिक स्थायी एवं अनुकूल प्रभाव पड़ा।
‘हाइपरटेन्शनÓ अर्थात् उच्च रक्तचाप वर्तमान शताब्दी की सबसे बड़ी बीमारी है। विश्व भर में इस महाव्याधि से पीडि़तों की संख्या करोड़ों में है और प्रतिवर्ष लाखों नए रोगी इस शृंखला में आ जुड़ते हैं। प्रचलित औषधि उपचार भी इसमें कोई स्थायी राहत नहीं दिला पाते, कारण कि यह एक मनोकायिक रोग है, जिसकी जड़ मानसिक उत्तेजनाओं, उद्विग्रताओं, चिंताओं एवं तनावों में छिपी हुई है। इसका उपचार भी तदनुरूप ही खोजा जाना चाहिए जो चिंतन चेतना को प्रभावित-परिष्कृत कर सके और तंत्रिका तंत्र एवं स्त्रायु प्रणाली को संतुलित बनाए रख सके।
 गायत्री महामंत्र को इसके लिए सबसे उपयुक्त पाया गया है। इस महामंत्र में एक ओर जहां मन-मस्तिष्क को उच्चस्तरीय विचारणाओं, सत्प्रेरणाओं से परिपूरित करने, मनोविकारों का शमन करने की क्षमता है, वहीं दूसरी ओर इसमें सूक्ष्म कायिक ग्रंथियों, शक्ति केंद्रों, नाड़ी संस्थानों को प्रभावित-उत्तेजित करने और उन्हें जाग्रत कर क्षमतावान बनाने की सामथ्र्य विद्यमान है। अनुसंधानकर्ता वैज्ञानिकों ने पाया है कि जिन व्यक्तियों की हृदयगति 110 प्रति मिनट थी, वह 3 माह से एक वर्ष की जप साधना के पश्चात् 70 प्रति मिनट तक हृदयगति को कम करने में सफल हुए। चिकित्सा विज्ञानियों के अनुसार ऑटोनामिक नर्वस सिस्टम एवं मन मस्तिष्क का सीधा संबंध मंत्र के साथ जुड़ जाने के कारण ही इस प्रकार के अप्रत्याशित परिवर्तन होते हैं।
गायत्री महामंत्र से होने वाले भौतिक एवं आध्यात्मिक लाभ, सिद्धियां, शक्तियां किसी दैवी कृपा से अकस्मात् ही प्राप्त नहीं हो जातीं, वरन् उसके द्वारा जो वैज्ञानिक प्रक्रिया अपने आप मंत्रवत् होती हैं, उससे लाभ होता है।  मंत्र की सफलता उसके शुद्ध उच्चारण में है, तभी उसमें गुंथे शब्दों का प्रभाव विभिन्न शक्ति केंद्रों पर पडऩा संभव होता है। मंत्र जप में भावना के साथ-साथ नियमितता एवं लयात्मकता का प्रमुख योगदान होता है। श्रद्धा और विश्वास तो इसका मेरुदंंड है ही।

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