बढता निजता का संकट चिंताजनक

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डिजिटल युग ने मानव जीवन को अभूतपूर्व सुविधाएं प्रदान की हैं। संचार, शिक्षा, व्यापार, मनोरंजन और प्रशासन-हर क्षेत्र में तकनीक ने गति, सरलता और पहुंच बढ़ाई है। स्मार्टफोन, इंटरनेट, सोशल मीडिया और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने दुनिया को एक ‘ग्लोबल विलेज’ में बदल दिया है किंतु इस तेजी से बदलती डिजिटल दुनिया में एक गहरा और गंभीर संकट उभर कर सामने आया है ’’निजता का संकट’’। आज व्यक्ति का निजी जीवन, उसकी पसंद-नापसंद, विचार, व्यवहार और यहां तक कि उसकी गतिविधियां भी डिजिटल निगरानी के दायरे में आ गई हैं। निजता मानव अधिकारों का एक मूल तत्व है। यह व्यक्ति को स्वतंत्रता, गरिमा और आत्मनिर्णय का अधिकार देती है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत निजता को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का अभिन्न हिस्सा माना गया है लेकिन डिजिटल तकनीकों के प्रसार के साथ यह अधिकार लगातार संकुचित होता जा रहा है। हर क्लिक, हर सर्च, हर लाइक और हर लोकेशन डेटा के रूप में दर्ज हो रहा है। व्यक्ति अनजाने में ही अपनी निजता को सार्वजनिक मंचों पर उजागर कर रहा है।


सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म निजता के संकट का सबसे बड़ा उदाहरण हैं। फेसबुक, इंस्टाग्राम, एक्स (ट्विटर), व्हाट्सएप जैसे मंचों पर लोग अपने व्यक्तिगत जीवन के पल साझा करते हैं। फोटो, वीडियो, विचार और भावनाएँ सार्वजनिक हो जाती हैं। कई बार यह जानकारी केवल मित्रों तक सीमित न रहकर कंपनियों, विज्ञापनदाताओं और यहाँ तक कि अज्ञात लोगों तक पहुँच जाती है। डेटा एनालिटिक्स और एल्गोरिदम के माध्यम से उपयोगकर्ताओं की मानसिकता, रुचियों और व्यवहार का विश्लेषण किया जाता है जिससे लक्षित विज्ञापन और राजनीतिक प्रभाव संभव हो जाता है।


डिजिटल निजता के संकट का एक अन्य गंभीर पहलू है ’’डेटा संग्रह और निगरानी’’। मोबाइल एप्लिकेशन, ऑनलाइन सेवाएं और वेबसाइटें उपयोगकर्ताओं से अनिवार्य रूप से डेटा एकत्र करती हैं। अक्सर उपयोगकर्ता बिना शर्तें पढ़े स्वीकार पर क्लिक कर देता है। परिणामस्वरूप उसकी संपर्क सूची, लोकेशन, कैमरा, माइक्रोफोन और व्यक्तिगत जानकारी तक पहुंच मिल जाती है। यह डेटा कहां संग्रहित होता है, कैसे उपयोग किया जाता है और कितने समय तक रखा जाता है इसकी स्पष्ट जानकारी आम नागरिक को नहीं होती।


सरकारी और कॉर्पोरेट निगरानी भी निजता के संकट को गहरा करती है। सुरक्षा और सुविधा के नाम पर सीसीटीवी कैमरे, फेस रिकग्निशन तकनीक, बायोमेट्रिक डेटा और डिजिटल पहचान प्रणालियाँ विकसित की जा रही हैं। यद्यपि इनका उद्देश्य अपराध नियंत्रण और सेवा वितरण है लेकिन इनके दुरुपयोग की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। यदि निगरानी बिना पारदर्शिता और जवाबदेही के हो, तो यह नागरिक स्वतंत्रता के लिए खतरा बन सकती है। साइबर अपराध निजता के हनन का एक और भयावह रूप है। डेटा चोरी, हैकिंग, फिशिंग, पहचान की चोरी और ऑनलाइन ठगी की घटनाएँ तेजी से बढ़ रही हैं। व्यक्तिगत फोटो और वीडियो का दुरुपयोग, साइबर स्टॉकिंग और ब्लैकमेलिंग जैसी घटनाएँ मानसिक और सामाजिक क्षति का कारण बनती हैं। विशेषकर महिलाएँ और बच्चे इस खतरे के प्रति अधिक संवेदनशील हैं।


डिजिटल युग में निजता का संकट केवल तकनीकी समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक और नैतिक चुनौती भी है। उपभोक्तावाद और ‘सब कुछ साझा करने’ की संस्कृति ने निजता की सीमाओं को धुंधला कर दिया है। लोग स्वयं ही अपनी निजी जानकारी सार्वजनिक कर देते हैं, बिना इसके दीर्घकालिक परिणामों पर विचार किए। डिजिटल साक्षरता की कमी भी इस संकट को बढ़ाती है। इस चुनौती से निपटने के लिए बहुस्तरीय प्रयास आवश्यक हैं। सबसे पहले, ’’मजबूत डेटा संरक्षण कानूनों’’ की आवश्यकता है, जो नागरिकों की निजी जानकारी को सुरक्षित रखें और कंपनियों व संस्थानों की जवाबदेही सुनिश्चित करें। भारत में डेटा संरक्षण से जुड़े प्रयास इस दिशा में एक कदम हैं, लेकिन इनके प्रभावी क्रियान्वयन पर विशेष ध्यान देना होगा। दूसरे, नागरिकों में ’’डिजिटल जागरूकता’’ बढ़ाना आवश्यक है, ताकि वे अपनी जानकारी साझा करने में सतर्क रहें और साइबर सुरक्षा के मूल नियमों का पालन करें।


इसके साथ ही तकनीकी कंपनियों को भी नैतिक जिम्मेदारी निभानी होगी। ‘प्राइवेसी बाय डिजाइन’ जैसे सिद्धांतों को अपनाकर ऐसे प्लेटफॉर्म विकसित किए जाएं जो न्यूनतम डेटा संग्रह करें और उपयोगकर्ता को अपने डेटा पर नियंत्रण दें। पारदर्शिता, सहमति और सुरक्षा को प्राथमिकता देना समय की मांग है। डिजिटल युग में प्रगति और निजता के बीच संतुलन स्थापित करना अनिवार्य है। तकनीक मानव जीवन को बेहतर बनाने का साधन है, न कि उसे नियंत्रित करने का। यदि निजता का संरक्षण नहीं किया गया, तो डिजिटल सुविधा धीरे-धीरे डिजिटल दासता में बदल सकती है। इसलिए आवश्यक है कि व्यक्ति, समाज, सरकार और तकनीकी जगत मिलकर निजता की रक्षा के लिए सजग और सक्रिय हों, ताकि डिजिटल युग मानव गरिमा और स्वतंत्रता का युग भी बना रहे।

 

डा वीरेन्द्र भाटी मंगल