तेलंगाना सरकार फोन टैपिंग मामले में अधिकारी को क्या टूट जाने तक जेल में रखना चाहती है: न्यायालय

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नयी दिल्ली, 16 जनवरी (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने तेलंगाना के विशेष खुफिया ब्यूरो (एसआईबी) के पूर्व प्रमुख टी प्रभाकर राव की ओर से फोन टैपिंग मामले में दाखिल अग्रिम जमानत याचिका पर शुक्रवार को सुनवाई करते हुए राज्य सरकार से पूछा कि क्या उसकी मंशा सेवानिवृत्त अधिकारी को तब तक जेल में रखने की है, जब तक कि वह टूट न जाएं।

न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और न्यायमूर्ति आर महादेवन की पीठ ने सुनवाई के शुरुआत में ही भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस)के पूर्व अधिकारी को दी गई अंतरिम जमानत के अपने आदेश को स्थायी करने का संकेत दिया।

तेलंगाना की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा ने हालांकि इसका विरोध करते हुए कहा कि मामले में कानून के व्यापक प्रश्न शामिल हैं। लूथरा ने अदालत से राज्य द्वारा उठाए गए विधि के प्रश्नों पर विचार करने का अनुरोध किया, जिसमें यह भी शामिल है कि क्या भगोड़ा घोषित किया गया और विदेश में रह रहा व्यक्ति अग्रिम जमानत के लिए आवेदन कर सकता है।

पीठ ने इसपर कहा, ‘‘हमें ऐसा लग रहा है कि आप उन्हें तब तक जेल में रखना चाहते हैं, जब तक वह टूट न जाएं। अब, हम आपको हमारे आदेश (अंतरिम सुरक्षा प्रदान करने वाले) का उपयोग उसके उद्देश्य से अधिक करने की अनुमति नहीं देंगे।’’

न्यायालय ने कहा कि अग्रिम जमानत का अभिप्राय यह नहीं है कि उन्हें पूरी तरह से छूट हासिल है और राज्य पुलिस उन्हें तब भी पूछताछ के लिए बुला सकती है।

पीठ ने कहा कि उसने जांच में सहायता के लिए ‘अंतरिम अनुच्छेद 142’ उपाय के रूप में 11 दिसंबर को राव के आत्मसमर्पण और हिरासत का आदेश दिया था।

न्यायालय ने कहा कि वह इस मामले की सुनवाई 10 मार्च को करेगा और राव को तब तक के लिए दी गई अंतरिम सुरक्षा लागू रहेगी।

उच्चतम न्यायालय ने पिछले साल 19 दिसंबर को राव की पुलिस हिरासत 25 दिसंबर तक बढ़ा दी थी। पीठ ने कहा था कि राव को 26 दिसंबर को पूछताछ के बाद रिहा कर दिया जाएगा और अगली सुनवाई तक उनके खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी।

उच्चतम न्यायालय के निर्देश के आधार पर राव ने 12 दिसंबर को पूर्वाह्न 11 बजे जुबली हिल्स पुलिस थाने में जांच अधिकारी के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया था।

एसआईबी के एक निलंबित डीएसपी समेत चार पुलिस अधिकारियों को मार्च 2024 से अबतक हैदराबाद पुलिस ने गिरफ्तार किया है। इन पर पूर्ववर्ती भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) सरकार के दौरान विभिन्न इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से खुफिया जानकारी मिटाने और कथित तौर पर फोन टैपिंग करने का आरोप था। बाद में उन्हें जमानत मिल गई।

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