भारत इस वर्ष (2026 में) ‘ब्रिक्स’ शिखर सम्मेलन की मेजबानी करेगा और इस कड़ी में इसकी अध्यक्षता सम्भाले है। विश्व परिदृश्य में मंडराते अत्यन्त चुनौतीपूर्ण इस दौर में यह ब्रिक्स का 18वाँ शिखर सम्मेलन होगा जिसकी तिथि अभी तय की जानी है। उम्मीद है कि यह सम्मेलन और इसके जरिये भारत वैश्विक चुनौतियों के समाधान के लिए एक महत्वपूर्ण मञ्च बनेगा लेकिन सबसे गम्भीर सवाल यह है कि क्या अन्तरराष्ट्रीय व्यापार में डॉलर की महत्ता को कुछ कम करने की इस सम्मेलन की मंशा आगे बढ़ सकेगी जो ब्रिक्स का एक अहम उद्देश्य है?
इस शंका का महत्त्वपूर्ण कारण यह है कि ‘अमेरिका का ताजे दौर का युद्धोन्माद’ दुनिया के पेट्रोलियम तेल और नेचुरल गैस व अन्य प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जे को लेकर तो है ही , उसकी अपनी मुद्रा डॉलर का वर्चस्व बनाये रखने को लेकर भी है जो विश्व में इस समय मुख्य एक्सचेंज मुद्रा बना हुआ है। इस बीच डीडी न्यूज से एक बातचीत में ब्राजील के राजदूत केनेथ नोब्रेगा ने ब्रिक्स की प्राथमिकताओं को रेखांकित किया है, जिसमें वैश्विक शासन सुधार, जलवायु वित्तपोषण और आतंकवाद विरोधी एकजुटता प्रमुख हैं। यह आलेख इन तथ्यों को समाहित करते हुए ब्रिक्स के माध्यम से वैश्विक समस्याओं के हल की सम्भावनाओं पर प्रकाश डालता है।
ब्रिक्स का उद्भव और विस्तार :
ब्रिक्स की स्थापना 2006 में ब्राजील, रूस, भारत और चीन के रूप में हुई जिसमें 2010 में दक्षिण अफ्रीका सम्मिलित हो गया। वर्तमान में इसमें मिस्र, इथियोपिया, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात (जैसे) जैसे नये सदस्य शामिल हैं जबकि सऊदी अरब की सदस्यता लम्बित है। वर्तमान में ब्रिक्स के दायरे में वैश्विक आबादी का 40% है जो दुनिया की जीडीपी का 26% प्रतिनिधित्व करता है।
इसके पूर्व ‘कज़ान घोषणा’ (16वाँ शिखर सम्मेलन, 2024) में बहुपक्षवाद, आतंकवाद विरोध, आर्थिक विकास और ‘ग्लोबल साउथ’ की चिन्ताओं पर जोर दिया गया था, जिसमें यूक्रेन और गाजा संकटों के शान्तिपूर्ण समाधान की अपील की गयी।
ब्राजील के राजदूत ने ‘ब्रिक्स 2025’ की छह प्राथमिकताओं का उल्लेख किया है। ये हैं: वैश्विक शासन सुधार, जलवायु वित्तपोषण, एआई नियमन, वैश्विक स्वास्थ्य, आर्थिक एकीकरण और संस्थागत सुधार। भारत की 2026 की अध्यक्षता इन प्राथमिकताओं को आगे बढ़ाएगी, जहाँ विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने प्रस्तावित रणनीति के चार स्तम्भ बताये हैं: (अ) लचीलापन, (ब) नवाचार, (स) सहयोग और (द) स्थिरता।
भारत की अध्यक्षता : अपेक्षाएं और तैयारी :
पहली जनवरी 2026 से भारत की ‘ब्रिक्स अध्यक्षता’ का कार्यकाल शुरू हुआ है और 18वाँ शिखर सम्मेलन नयी दिल्ली में आयोजित होगा। ब्राजील के रियो सम्मेलन (17वाँ, 2025) में भारत को यह जिम्मेदारी सौंपी गयी थी, जो महामारी के बाद पहला पूर्णकालिक शिखर सम्मेलन होगा।
एक साक्षात्कार में ब्राजील के राजदूत ने भारत-ब्राजील साझेदारी पर बल दिया, जिसमें ऊर्जा, कृषि, स्वास्थ्य, बौद्धिक सम्पदा और आतंकवाद विरोध शामिल हैं। इस सम्बन्ध में प्रधानमंत्री मोदी ने ग्लोबल साउथ सहयोग, डीपीआई, सतत विकास और दक्षिण-दक्षिण सहयोग को प्राथमिकता दी है। इनमें (1-) न्यू डेवलपमेण्ट बैंक (एनडीबी) और सीआरए जैसे तंत्र आईएमएफ की शर्तों से मुक्त विकास वित्तपोषण प्रदान करेंगे।
(2-) डी-डॉलरीकरण, (3-) स्थानीय मुद्रा व्यापार और (4- ) यूपीआई जैसे मॉडल सीमा-पार भुगतान सुगम बनाएंगे।
ब्रिक्स जलवायु वित्तपोषण पर केन्द्रित है, जहाँ विकासशील देशों को पश्चिमी प्रतिबन्धों से मुक्ति चाहिए। कज़ान घोषणा में गाजा और लेबनान संकटों पर चिन्ता व्यक्त की गयी, तथा योजना है कि ब्रिक्स अनाज एक्सचेंज की स्थापना से खाद्य सुरक्षा मजबूत होगी। भारत बिग कैट्स संरक्षण के लिए इण्टरनेशनल बिग कैट एलायंस को बढ़ावा देगा।
आर्थिक सहयोग और वित्तीय लचीलापन :
ब्रिक्स बहुपक्षीय व्यापार को बढ़ावा देता है, जहाँ ‘स्विफ्ट’ का विकल्प बनने की क्षमता है। एनडीबी ने 2015 से 30 अरब डॉलर की परियोजनाएँ वित्तपोषित की हैं। साक्षात्कार में अमेरिकी व्यापार युद्ध के खिलाफ बहुपक्षवाद और नियमों का पालन पर जोर दिया गया।
आतंकवाद और सुरक्षा चुनौतियाँ :
पलाम हमले का उल्लेख करते हुए राजदूत ने ब्रिक्स से आतंकवाद की निन्दा और राज्य प्रायोजित आतंक पर कार्रवाई की माँग की। कज़ान में आतंकवाद विरोध और बहुपक्षवाद पर बल दिया गया। उम्मीद है कि भारत-चीन सीमा समझौते (डेपसांग, डेमचोक) से क्षेत्रीय स्थिरता बढ़ेगी।प्रौद्योगिकी और स्वास्थ्य नवाचार, एआई वैश्विक नियमन और स्वास्थ्य साझेदारी ब्रिक्स 2025 की प्राथमिकताएँ हैं, जो भारत के डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ेंगी। आपूर्ति शृंखला, ऊर्जा और आपदा प्रबन्धन में लचीलापन सुनिश्चित होगा।
भू-राजनीतिक सन्दर्भ और भारत की कूटनीति :
यूक्रेन युद्ध और ईरान-इजरायल संघर्षों में ब्रिक्स संवाद को प्राथमिकता देता है, न कि धमकियों को। भारत ग्लोबल साउथ और पश्चिम के बीच पुल का काम करेगा, वैश्विक संस्थाओं में सुधार की वकालत करेगा। पश्चिमी प्रतिबन्धों के विघटनकारी प्रभावों की निन्दा की गयी है।
चुनौतियाँ और भविष्य दृष्टि :
सदस्यों की विविधता (ईरान बनाम यूएई) निर्णय लेने को जटिल बनाती है। आर्थिक असमानताएँ एकता में बाधक हैं, परन्तु एनडीबी जैसी संस्थाएँ सफल रही हैं। भारत की अध्यक्षता में वाणिज्य, प्रौद्योगिकी, सुरक्षा सहयोग मजबूत होगा।
साक्षात्कार से ये तथ्य उभरे हैं कि सभी सदस्य एक मत से—आतंकवाद निन्दा, व्यापार स्थिरता, बहुपक्षवाद—भारत के एजेण्डे को मजबूत करते हैं। ब्रिक्स बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था का प्रतीक बनेगा, जहाँ ग्लोबल साउथ की आवाज बुलन्द होगी।
डॉ० मत्स्येन्द्र प्रभाकर
स्वतंत्र पत्रकार
