डॉ. सुधाकर आशावादी प्राकृतिक आपदाएं पूर्व सूचना देकर नहीं आती। यदि आपदाओं के कारण होने वाले विनाश का पूर्वाभास हो जाए, तो उससे निपटने के प्रयास भी किए जा सकते हैं। बरसात में जल प्रलय के दृश्य यदा कदा उपस्थित होते रहते हैं। प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक विदोहन भले ही इस प्रलय का बड़ा कारण बनता हो, मगर किसी भी आपदा से निपटने के लिए आम आदमी का एकजुट होना अपेक्षित होता है। हाल ही में जम्मू कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड सहित मैदानी प्रदेशों पंजाब में हुई जल प्रलय, बादल फटना व बाढ़ जैसी विभीषिका ने इन क्षेत्रों का जन जीवन अवरुद्ध कर दिया है, किन्तु कुछ लोग इस आपदा में भी राजनीति करने से बाज नहीं आ रहे हैं। एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगाकर अपने कर्तव्य की पूर्ति कर रहे हैं। उनकी हरकतों को देखकर ऐसा प्रतीत होता है, कि जैसे उनमें मानवीय संवेदनाएं रत्ती भर भी शेष नहीं रह गई हैं। यदि मानवीय संवेदनाएं होती तो वे आपदा से प्रभावित लोगों की सहायता करने के लिए खुले मन से कार्य करते, न कि सत्ता पक्ष या एक दूसरे राजनीतिक दलों पर ऊँगली उठाते। पंजाब बहुत समृद्ध राज्य है,जिसे अपने अन्न उत्पादन पर बहुत गर्व है। इसमें कोई संदेह भी नहीं है कि पंजाब के समृद्ध किसानों व विभिन्न फसलों की आढ़त करने वाले समृद्ध आढ़तियों ने अनेक आंदोलनों में अपनी उदारता का परिचय देते हुए कई बार देश की राजधानी को घेरा है तथा लंगर लगाकर आंदोलनकरियों का पेट भरा है। लाखों ट्रैक्टरों में वातानुकूलित तथा आधुनिक सुविधाओं का उपयोग करके पंजाब की समृद्धि का परिचय दिया है। ऐसे में वे सभी उदारमना समृद्ध किसान व आड़ती बाढ़ पीडि़तों के प्रति संवेदनाएं व्यक्त करते हुए उनकी सहायता कर ही रहे होंगे। ऐसे में समृद्ध किसानों व आढ़तियों के योगदान को नकारते हुए जो नकारात्मक राजनीति की जा रही है तथा सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी जिस प्रकार से केंद्र सरकार के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण दर्शा रही है, उसे किसी भी स्थिति में उचित नहीं ठहराया जा सकता। यही नहीं अपने राजनीतिक अस्तित्व को बचाने के लिए कुछ दल इस विपदा की घड़ी में भी जिस प्रकार धरना प्रदर्शन और रैलियों का खेल खेल रहे हैं,उससे भी यही सन्देश समूचे राष्ट्र में जा रहा है, कि देश के अधिकांश राजनीतिक दलों को प्राकृतिक आपदाओं या आम नागरिकों की समस्याओं से कोई सरोकार नहीं रह गया है। यह स्थिति वास्तव में दुर्भाग्यपूर्ण है और निंदनीय भी।