मुक्ति का मार्ग श्रीराम

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भगवान श्रीराम भारतीय जनमानस में समग्र चेतना का रूप हैं। श्रीराम नाम के साथ एक मंत्र है, जो सभी को पार उतार देता है। श्रीराम एकत्व और समूह सभी का स्वरूप हैं। हमारे साथ श्रीराम हैं और श्रीराम के साथ हम हैं अर्थात हम में श्रीराम हैं और श्रीराम में हम हैं। सिय राम मय सब जग जानी। श्रीराम हर एक वस्तु में हैं. चारों ओर देखे तो हर दिशा और लोक में श्रीराम के ही दर्शन होते हैं। श्रीराम सकल संसार के तारण हार हैं। श्रीराम नाम जिसने भी गाया-सुना है, वह पार उतर गया है।

 

श्रीराम भजन सुमिरन जितना किया जाए, उतना ही कम लगता है। अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि पर भव्य, दिव्य, अलौकिक श्रीराम मंदिर का निर्माण लगभग 500 वर्ष बाद हुआ है। श्रीराम मंदिर एक मंदिर होने के साथ-साथ त्रेतायुग से और वर्तमान युग तक के सभी प्रमाण, आस्था, विश्वास, भक्ति, योग, साधना, व्रत और साधु, संत, महात्माओं के संकल्प का प्रतीक है। श्रीराम हमारे रोम-रोम में बसे हैं।

 

भारत भूमि का हर एक खंड तीर्थ है। विचार करें तो अयोध्या धाम हर युग में तीर्थ स्थल रहा है और आगे भी रहेगा। इसकी कितनी ही कथाएं हमारे वेदों, शस्त्रों आदि में लिखी हैं। हमारे पूज्य संतों ने इसके बारे में बताया भी है। तीर्थ नगरी में संतों के यज्ञ, तप का ही फल है कि वहां दिव्य अवतार होते हैं। महात्मा परम पूज्य ऋष्यश्रृंग ने अग्नि से भगवान श्रीराम के पैदा होने वाले उसे दिव्य, अद्भुत पदार्थ का पान तीनों माताओं को कराया। माता कौशल्या को प्रभु श्रीराम ने गर्भ में ही दर्शन दिए लेकिन माता ने शिशु लीला करने की बात कही और प्रभु ने इसे स्वीकार किया। प्रभु श्रीराम सहज, सरल, सौम्य आदि दिव्य गुणों से भरे हुए हैं। अयोध्या में भगवान श्रीराम के जन्म के साथ भगवान की बाललीला और राज के बारे में संत-महात्मा कथाओं में बताते हैं।

 

आज भी विश्व में किसी राज में सुशासन की बात होती है तो वह रामराज की ही बात होती है। गांधी जी भी भारतवर्ष में रामराज की बातें करते रहें। वर्तमान में देश के यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी की सरकार में श्रीराम मंदिर बनकर तैयार हुआ है, साथ ही श्रीराम मंदिर की नींव रखने से लेकर धर्म ध्वज लहराते तक की यात्रा में मोदी जी हर कार्य में उपस्थित रहे हैं। संत समागम और सामान्य जन की उपस्थिति में यह सभी मांगलिक कार्य समयानुसार हुए हैं। धर्म ध्वज मंदिर के शिखर पर लहराने के साथ-साथ भारतीय जनमानस के हृदय में भी लहरा रही है। जब देश का प्रधान सेवक राममय होकर कार्य करता है तो वहां रामराज ही दिखाई देता है। भगवान श्रीराम की असीम कृपा के चलते ही सुयोग्य पात्र को ही श्रीराम मंदिर के सभी मांगलिक कार्य करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है।

 

श्रीराम आस्था, विश्वास, भक्ति के साथ-साथ लोगों के साथ सीधे जुड़े हुए हैं। जितने भी साधु, संत, महात्मा आदि जल और वायु को ही ग्रहण करके अपने दिव्य संकल्प, व्रत के साथ राम मंदिर निर्माण में लग रहें, उन सबका संकल्प भी पूरा हुआ है। कितने ही समाधि में चले गए, इस संकल्प को पूरा करने के लिए। भगवान श्रीराम की दिव्य जन्मभूमि पर जिसके भी चरण पड़ते हैं वह राममय हो जाता है। मां सरयू के पावन पुनीत तट पर कितने ही साधु, संत, महात्माओं का तप इस दिव्य भूमि को और भी अधिक उज्जवल तथा प्रकाशवान बना देता है।

 

अयोध्या धाम भगवान श्रीराम के अवतार और राज के साथ-साथ दिव्य यज्ञ, तप, व्रत आदि की भूमि है। श्रीराम के दर्शन अयोध्या के कण-कण में दिखाई देते हैं। श्रीराम हमारी आत्मा हैं। जब हमारे अंदर श्रीराम नाम का प्रकाश आता है तो हमारे सारे ताप, अंधकार और विकार मिट जाते हैं। श्रीराम का भजन करने से संकटों का नाश हो जाता है। गोस्वामी तुलसीदास सुंदरकांड के अंत में लिखते हैं,सकल सुमंगल दायक रघुनायक गुणगान। सादर सुनहिं तेतरहिं भव सिंधु बिना जलजान।। भगवान श्रीराम का भजन करते रहो, जीवन में जो भी मिलना-मिलाना है और जो आवागमन का चक्कर है उससे मुक्ति मिल जाएगी।

 

श्रीराम स्वयं रचना करते हैं, श्रीराम ही शब्द देते हैं. वही प्राण तत्व हैं। अपनी इच्छा से नहीं, प्रभु इच्छा से हमें कार्य करना चाहिए। भगवान स्वयं संतों से मार्ग जानते हैं. हमें भी संतों की सेवा करनी चाहिए और भागवत भजन करते रहना चाहिए। श्रीराम का नाम है तो मार्ग और मुक्ति दोनों हैं, वरना मनुज मृत्यु और मुश्किल के जंजाल में फंसा रहता है।

 

डॉ. नीरज भारद्वाज



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