रात कितनी भी अंधेरी क्यों न हो, सुबह जरूर होती है : योगेन्द्र यादव
Focus News 12 January 2026 0
नयी दिल्ली, 12 जनवरी (भाषा) देश के मौजूदा राजनीतिक घटनाक्रम की पृष्ठभूमि में क्रांतिकारी और समाजवादी नेता जय प्रकाश नारायण को उद्धृत करते हुए सामाजिक विज्ञानी, चुनाव विश्लेषक और स्वराज अभियान संगठन के नेता योगेन्द्र यादव ने कहा कि निराशा के बादल छंटते हैं, और रात कितनी भी अंधेरी क्यों न हो, सुबह जरूर होती है।
योगेन्द्र यादव ने यहां अंतरराष्ट्रीय विश्व पुस्तक मेले में जयप्रकाश नारायण की किताब ‘मेरी जेल डायरी’ पर चर्चा के दौरान कहा कि यह किताब हमें “लोकतंत्र का नाटक करके लोकतंत्र को खत्म करने वाले तानाशाह के बारे में सचेत करती है और उनकी यह चेतावनी आज के बारे में बहुत कुछ कहती है।”
‘मेरी जेल डायरी’ जयप्रकाश नारायण ने जुलाई 1975 से 15 नवंबर 1975 तक चंडीगढ़ के पीजीआई अस्पताल में नजरबंद रखे जाने के दौरान लिखी थी।
उन्होंने आपातकाल के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के विरोध में ‘पूर्ण आंदोलन’ का नेतृत्व किया था जो स्वतंत्र भारत में हुए तब तक के आंदोलनों में सबसे बड़ा था और जिसने सरकार की चूलें हिला दी थीं।
योगेन्द्र यादव ने जयप्रकाश के उसी आंदोलन की पृष्ठभूमि में कहा, ‘‘ पचास साल बाद लोग उन छुटभैये नेताओं को याद नहीं करते जो उस जमाने के बड़े बड़े मंत्री थे, जिनके बड़े बड़े नाम थे, जिनकी बडी बड़ी फोटो लगती थीं। यहां मैं आया, यहां भी मैंने कुछ लोगों की बड़ी बड़ी फोटो लगी देखीं। लोग पचास साल बाद इन बड़ी फोटो को याद नहीं रखेंगे। उस एक शख्स को याद रखेंगे जिसे चुपचाप एक एकांत कमरे में, बंद करके रखा गया है। ताले में बंद करके रखा गया है।’’
उन्होंने रविवार की शाम आयोजित चर्चा में, किसी का नाम लिए बिना परोक्ष तौर पर कहा, ‘‘इस पर किस किस की तस्वीर आपकी आंखों के सामने घूमती है जिसे आज बंद करके रखा गया है? जिसके बारे में आज सुप्रीम कोर्ट चुप है, जिसके बारे में सत्ता इशारा कर रही है। सत्ता आंख मार रही है और कोर्ट कचहरी चुप हैं।’’
‘मेरी जेल डायरी’ का संदर्भ देते हुए स्वराज इंडिया के नेता योगेन्द्र यादव ने कहा, ‘‘ यह किताब हमें भरोसा देती है कि आज से पचास साल बाद ये लोग जो बड़ी -बड़ी कुर्सियों पर बैठे हैं, दुनिया उनका नाम याद नहीं रखेगी, उस उमर खालिद का नाम याद रखेगी जो आज बंद है।’’
राजपाल एंड संस प्रकाशन ने ‘मेरी जेल डायरी’ को सबसे पहले 1977 में
प्रकाशित किया था और इस वर्ष इसे पुन: प्रकाशित किया गया है।
यादव ने कहा कि आज हर तरह के विरोध को, प्रदर्शन तो छोड़िए, विरोध की अभिव्यक्ति तक को देशद्रोह की संज्ञा दी जा रही है, लेकिन इसी का आह्वान जयप्रकाश नारायण ने किया था। ‘‘मैं यह बात इसलिए कह रहा हूं कि जयप्रकाश जी की बात का विरोध करना इन लोगों के लिए (सत्ता पक्ष) कठिन हो जाएगा क्योंकि आजकल ये जयप्रकाश को अपना हीरो बनाना चाहते हैं।’’
उन्होंने किताब के हवाले से कहा कि एक समय जयप्रकाश नारायण के मन
में निराशा उत्पन्न हो गई थी। उनको लगता था कि कुछ नहीं बदलने वाला।
यादव ने कहा लेकिन यह किताब हमें याद दिलाती है कि निराशा के क्षणों के बाद सुबह होती है।
उन्होंने किताब का संदर्भ देते हुए कहा कि उस समय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी भी कहती थीं कि अवज्ञा आम तौर पर विरोधी दल के कार्यक्रम का भाग नहीं है, वह चुनाव लड़ें और सामान्य तरीके से विरोध करें। लेकिन जयप्रकाश नारायण ने कहा था कि कुछ मौकों पर जहां सरकार लगातार बुराइयां करती जाती है तो विरोधी दल को लाचार हो कर अवज्ञा करनी पड़ती है।
यादव ने कहा कि सामाजिक आर्थिक प्रश्न कुछ ऐसे क्षेत्र हैं जहां केवल नागरिक अवज्ञा ही नहीं, बल्कि सत्याग्रह भी आवश्यक हो जाता है।
उन्होंने अंत में किताब में लिखी एक कविता पढ़ी :
‘‘चारों ओर जिन उल्लू और गीदड़ों के चिल्लाने और गुर्राने की आवाजें हम सुनते हैं,
उनके लिए यह दावत का दिन है
चाहे रात कितनी भी गहरी क्यों न हो, सुबह अवश्य होती है।’’
