नववर्ष 2026 : समय के आईने में अपनी ‘असलियत’ से एक मुलाक़ात

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कैलेंडर की दीवार पर टंगी पुरानी तारीखें उतर चुकी हैं। एक और वर्ष हमारी स्मृतियों की अलमारी में सहेज दिया गया है। हम 2026 की दहलीज पर खड़े हैं। बीता हुआ समय अब केवल तारीख़ नहीं, बल्कि अनुभवों, सफलताओं, टूटे हुए सपनों और फिर से खड़े होने के हौसलों की एक गठरी बन चुका है।

अक्सर हम कहते हैं, “नया साल आ गया।” लेकिन क्या सच में? सूर्य वही है, धरती वही है, और आकाश भी वही। अगर कुछ बदलना है, तो वह तारीख नहीं, बल्कि ‘हम’ हैं। नया वर्ष कोई जादुई चाबी नहीं जो जीवन के सारे ताले खोल दे; यह तो एक ‘संकेत’ है – भागती हुई ज़िंदगी में एक पल ठहरने का, भीतर झाँकने का और अपनी दिशा तय करने का।

समय नहीं बीतता, हम बीत रहे हैं

हमारी सबसे बड़ी गलतफहमी यह है कि समय बीत रहा है। सच यह है कि समय अपनी गति से स्थिर है, बीत तो ‘हम’ रहे हैं। हमारी आयु का एक-एक क्षण रेत की तरह मुट्ठी से फिसल रहा है। समय इस ब्रह्मांड की एकमात्र ऐसी मुद्रा (Currency) है जिसे न तो कमाया जा सकता है, न बचाया जा सकता है, इसे केवल ‘जिया’ जा सकता है।

नववर्ष 2026 हमें आईने के सामने खड़ा होकर एक कठोर प्रश्न पूछने का साहस देता है: “क्या मैं अपने अनमोल पलों को जी रहा हूँ, या सिर्फ खर्च कर रहा हूँ?”

आभासी चमक और खोती हुई वास्तविकता

आज की विडंबना देखिए, हमारे पास संपर्क (Connection) के साधन असीमित हैं, लेकिन आत्मीय संवाद (Communication) शून्य हो गया है। हम एक ऐसे ‘डिजिटल मृगतृष्णा’ (Digital Mirage) में जी रहे हैं जहाँ ‘लाइक्स’ और ‘व्यूज़’ हमारे आत्म-सम्मान का पैमाना बन गए हैं।

दूसरों की एडिट की हुई, फिल्टर लगी तस्वीरों को देखकर अपनी साधारण ज़िंदगी को कोसना, यह आज की पीढ़ी की सबसे बड़ी मानसिक त्रासदी है। हम भूल गए हैं कि सोशल मीडिया पर दिखने वाली ‘चमक’ अक्सर जीवन के अंधेरों को छिपाने का प्रयास होती है। 2026 में हमें यह संकल्प लेना होगा कि हम तकनीक के ‘स्वामी’ बनेंगे, उसके ‘गुलाम’ नहीं।

सावधानी : लालच और विवेक का द्वंद्व

डिजिटल युग ने हमें सुविधाएँ दी हैं, तो नए जाल भी बिछाए हैं। ‘डिजिटल अरेस्ट’, लॉटरी के मैसेज और साइबर ठगी के मामले सिर्फ़ पुलिस का विषय नहीं हैं, यह हमारे ‘विवेक’ और ‘लालच’ का विषय है। “कम समय में ज़्यादा मुनाफा”, इस विचार ने हमारी तर्कशक्ति को कुंद कर दिया है।

नववर्ष चेतावनी देता है – सुरक्षा एंटीवायरस में नहीं, आपकी जागरूकता में है। जब हम लालच छोड़ते हैं, तो ठगी के आधे रास्ते अपने आप बंद हो जाते हैं। 2026 में हमें एक ‘सतर्क नागरिक’ बनना होगा, जो न भ्रम में आए, न भय में।

रिश्तों में उपस्थिति : सबसे बड़ा उपहार

मोबाइल और इंटरनेट दूरियों को पाटने आए थे, लेकिन विडंबना यह है कि उन्होंने पास बैठे लोगों के बीच मीलों की दीवार खड़ी कर दी है। परिवार एक छत के नीचे है, पर हर कोई अपनी-अपनी स्क्रीन की दुनिया में कैद है। यह ‘डिजिटल सन्नाटा’ रिश्तों को खोखला कर रहा है।

इस वर्ष, अपने प्रियजनों को कोई महँगा तोहफा देने के बजाय, अपना ‘समय’ दीजिए। जब माँ-पिता या जीवनसाथी बात करें तो फोन को उल्टा रख दीजिए। उनकी आँखों में देखकर बात करना, यही वह संजीवनी है जो मरते हुए रिश्तों में प्राण फूँक सकती है।

सफलता की अंधी दौड़ और मानवीय संवेदना

आज समाज ने सफलता का पैमाना केवल ‘पद’ और ‘पैसा’ बना दिया है। यही कारण है कि हमारे युवा हताशा, नशे और मानसिक तनाव की गिरफ्त में हैं। हमें समझना होगा कि असफलता जीवन का ‘पूर्णविराम’ नहीं, बल्कि एक ‘अल्पविराम’ है। गिरना शर्म की बात नहीं, गिरकर न उठना चिंता का विषय है।

लेकिन क्या सफलता केवल अपनी जेब भरने तक सीमित है? हमारे आसपास ऐसे असंख्य लोग हैं जिनके लिए एक वक्त का भोजन भी सपना है। नववर्ष 2026 तभी सार्थक होगा जब हमारी संवेदना का दायरा बढ़ेगा। किसी ठिठुरते को कंबल देना, किसी भूखे को भोजन कराना, या किसी हताश व्यक्ति के कंधे पर हाथ रखना, यही सच्ची मनुष्यता है। हम इंसान बने रहें, यह आज के दौर की सबसे बड़ी उपलब्धि है।

प्रकृति और भविष्य : एक अनिवार्य साझेदारी

अंत में, उस घर की बात जिसे हम ‘पृथ्वी’ कहते हैं। पर्यावरण संरक्षण अब कोई फैशन नहीं, बल्कि अस्तित्व की शर्त है। बेमौसम बारिश और आपदाएँ प्रकृति की चेतावनी हैं। हमें अपनी उपभोगवादी संस्कृति पर लगाम लगानी होगी। पानी बचाना, बिजली बंद करना और प्लास्टिक का त्याग – ये छोटे कदम ही हमारे बच्चों के भविष्य की गारंटी हैं।

दृष्टि बदलो, वर्ष बदलेगा

मित्रों, 2026 का सूरज उगने वाला है। यह सिर्फ़ कैलेंडर बदलने की घटना नहीं है। यह अवसर है, अपनी पुरानी चमड़ी उतार फेंकने का। यह अवसर है, विज्ञान को विवेक के साथ, और तकनीक को संवेदना के साथ जोड़ने का।

आइए, इस नववर्ष पर हम बड़े-बड़े संकल्पों का शोर न करें। बस एक मौन प्रतिज्ञा करें कि हम हर दिन कल से थोड़ा बेहतर बनने का प्रयास करेंगे। हम सुनेंगे ज़्यादा, बोलेंगे कम। हम जुड़ेंगे दिल से, डिवाइस से नहीं।

याद रखें, जब हमारी ‘दृष्टि’ बदलती है, तभी समय का असली अर्थ बदलता है।

आप सभी को एक जागरूक, सार्थक और रूपांतरकारी नववर्ष की असीम शुभकामनाएँ।

उमेश कुमार साहू

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