बाबूलाल नागा
मकर संक्रांति केवल एक पर्व नहीं, बल्कि भारतीय समाज की सामूहिक चेतना, कृषि संस्कृति और सामाजिक समता का प्रतीक है। यह त्योहार सूर्य के उत्तरायण होने का उत्सव है, जो अंधकार से प्रकाश, ठंड से ऊष्मा और निराशा से आशा की ओर बढ़ने का संकेत देता है। भारत जैसे विविधताओं से भरे देश में मकर संक्रांति अलग-अलग नामों और परंपराओं के साथ मनाई जाती है—कहीं पोंगल, कहीं उत्तरायण, कहीं खिचड़ी तो कहीं माघ बिहू—लेकिन इन सभी के मूल में जो भाव निहित है, वह है आपसी जुड़ाव, साझेदारी और सामूहिकता। यही भाव हमारे संविधान में निहित बंधुता, समता और भाईचारे के मूल्यों से सीधा संवाद करता है।
मकर संक्रांति का सामाजिक स्वरूप इस बंधुता को व्यवहार में उतारता है। इस दिन लोग तिल-गुड़ बांटते हैं, एक-दूसरे को शुभकामनाएं देते हैं और यह संदेश देते हैं कि जीवन की कड़वाहट को मिठास में बदलना ही सामाजिक जीवन की सार्थकता है। “तिल-गुड़ घ्या, गोड-गोड बोला” केवल एक कहावत नहीं, बल्कि सामाजिक सौहार्द का संदेश है।
मकर संक्रांति का सीधा संबंध कृषि से है। यह किसान के श्रम, धरती और प्रकृति के साथ उसके रिश्ते का उत्सव है। खेतों में नई फसल आने की खुशी में यह पर्व मनाया जाता है। कृषि भारतीय समाज की वह साझा विरासत है, जो जाति, वर्ग और धर्म की सीमाओं से परे है। किसान की मेहनत किसी एक वर्ग के लिए नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए अन्न का स्रोत होती है। इस दृष्टि से मकर संक्रांति समता के संवैधानिक मूल्य को रेखांकित करती है, जहां श्रम की गरिमा और संसाधनों की साझेदारी को सम्मान दिया जाता है।
समता का अर्थ केवल कानूनी समानता नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक समानता भी है। मकर संक्रांति पर खिचड़ी, पोंगल या सामूहिक भोज की परंपरा इस समता का प्रतीक है। एक ही चूल्हे पर बना भोजन, एक साथ बैठकर खाने की संस्कृति सामाजिक ऊंच-नीच की दीवारों को कमजोर करती है। ग्रामीण समाज में यह पर्व सामूहिकता को मजबूत करता है, जहां अमीर-गरीब, छोटे-बड़े का भेद गौण हो जाता है। यही भावना संविधान के उस उद्देश्य से मेल खाती है, जो एक समतामूलक समाज की स्थापना की बात करता है।
भाईचारा मकर संक्रांति का एक और महत्वपूर्ण आयाम है। पतंगबाजी की परंपरा केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि संवाद और मेल-जोल का माध्यम भी है। छतों पर खड़े लोग अनजान होते हुए भी एक-दूसरे से जुड़ते हैं, हंसी-मजाक करते हैं और साझा आनंद का अनुभव करते हैं। यह भाईचारा उस सामाजिक ताने-बाने को मजबूत करता है, जिसकी आज के समय में सबसे अधिक आवश्यकता है। जब समाज जाति, धर्म और विचारधाराओं के आधार पर बंटने लगता है, तब ऐसे पर्व हमें जोड़ने का काम करते हैं।
संवैधानिक मूल्यों की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे केवल किताबों और भाषणों तक सीमित न रह जाएं। मकर संक्रांति जैसे लोकपर्व इन मूल्यों को जनजीवन में जीवंत बनाते हैं। बंधुता यहां कोई अमूर्त विचार नहीं, बल्कि व्यवहार में दिखने वाली सच्चाई है—जब लोग एक-दूसरे के घर जाते हैं, सुख-दुःख साझा करते हैं और सामूहिक खुशी में शामिल होते हैं। यह सामाजिक समावेशन का वह रूप है, जिसकी कल्पना संविधान निर्माताओं ने की थी।
आज के दौर में, जब सामाजिक विभाजन, असहिष्णुता और असमानता की प्रवृत्तियां बढ़ रही हैं, मकर संक्रांति हमें आत्ममंथन का अवसर देती है। क्या हम वास्तव में बंधुता के भाव को अपने आचरण में उतार पा रहे हैं? क्या समता केवल कागजों तक सीमित है या हमारे सामाजिक व्यवहार में भी झलकती है? क्या भाईचारा केवल त्योहारों तक सीमित है या रोजमर्रा के जीवन में भी मौजूद है? इन प्रश्नों का उत्तर हमें अपने भीतर तलाशना होगा।
मकर संक्रांति का संदेश स्पष्ट है—प्रकृति के साथ संतुलन, समाज के साथ सहयोग और मनुष्यता के साथ प्रतिबद्धता। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि भारतीय संस्कृति की आत्मा विभाजन में नहीं, बल्कि समन्वय में है। संविधान और संस्कृति जब एक-दूसरे से संवाद करते हैं, तब एक सशक्त, न्यायपूर्ण और मानवीय समाज की नींव पड़ती है।
अंततः मकर संक्रांति केवल सूर्य के उत्तरायण होने का उत्सव नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना के उत्तरायण होने की कामना है। यह पर्व हमें प्रेरित करता है कि हम बंधुता को अपनाएं, समता को व्यवहार में उतारें और भाईचारे को अपनी जीवन शैली का हिस्सा बनाएं। यही मकर संक्रांति की सच्ची सार्थकता है और यही भारतीय संविधान के मूल्यों की वास्तविक विजय।
