मातृ भाषा पर गर्व लेकिन भाषायी संकीर्णता का विरोध करता है जेएलएफ : नमिता गोखले

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नयी दिल्ली, 14 जनवरी (भाषा) वैश्विक साहित्यिक आयोजन जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल (जेएलएफ) की सह निदेशक नमिता गोखले का कहना है कि यह सालाना साहित्यिक उत्सव भारत की सभी भाषाओं और उसकी विविध साहित्यिक परंपराओं के प्रति गहरी प्रतिबद्धता रखता है, लेकिन साथ ही भाषायी संकीर्णता का विरोध करता है।

विभिन्न भारतीय भाषाओं के साहित्यिक आदान-प्रदान में अनुवाद की महती भूमिका को रेखांकित करते हुए नमिता गोखले ने यहां ‘भाषा’ को दिए एक ईमेल साक्षात्कार में बताया, ‘‘ जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल अपनी स्थापना से ही अनुवाद के प्रति प्रतिबद्ध रहा है। हम किसी एक भाषा के वर्चस्व को स्वीकार नहीं करते और मानते हैं कि हर भाषा अपनी विशिष्ट संवेदना और दृष्टिकोण लेकर आती है।’’

इस वर्ष 15 से 19 जनवरी के बीच जयपुर में आयोजित होने जा रहे 19वें जेएलएफ की पूर्व संध्या पर उन्होंने कहा, ‘‘हम मातृभाषा के प्रति गर्व को प्रोत्साहित करते हैं, लेकिन भाषाई संकीर्णता का विरोध करते हैं।’’

जेएलएफ की स्थापना से ही उसके साथ जुड़ीं रही वरिष्ठ एवं लोकप्रिय लेखिका नमिता का कहना था कि व्यक्तिगत रूप से उन्होंने अंग्रेज़ी और भारतीय भाषाओं के बीच समझ और दृष्टि के अंतर को महसूस किया, जो उन्हें चिंताजनक लगा।

उनका कहना था, ‘‘मैं चाहती थी कि किताबें दोनों दिशाओं में-भारतीय भाषाओं से अंग्रेज़ी और अंग्रेज़ी से भारतीय भाषाओं में-अनुवाद के माध्यम से पाठकों तक पहुंचें।’’

उनका कहना था कि उच्च गुणवत्ता के अनुवादों की उपलब्धता के कारण यह साहित्य उन पाठकों तक भी पहुंच पाता है जो हिंदी में पारंगत नहीं हैं या अपनी भाषाई जड़ों से कुछ दूर हो चुके हैं।

हिंदी भाषा को और अधिक महत्व देने के लिए जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल की योजनाओं के बारे में किए गए सवाल के जवाब में नमिता गोखले ने कहा कि आज का युवा वर्ग सोशल मीडिया के माध्यम से हिंदी कविता और साहित्य को नए सिरे से खोज रहा है और फिर उसे नियमित पढ़ने और उससे जुड़ने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

उन्होंने कहा कि यह एक सकारात्मक और उत्साहवर्धक प्रवृत्ति है, जिसे जेएलएफ मंच, संवाद और साहित्यिक गतिविधियों के माध्यम से प्रोत्साहित करता है।

हिंदी प्रकाशकों और लेखकों को अधिक अवसर देने संबंधी जेएलएफ की नीति पर उन्होंने बताया कि यहां प्रकाशन-केंद्रित मंच जयपुर बुकमार्क हिंदी प्रकाशन जगत में उभरते रुझानों, नई आवाज़ों और लेखकों व प्रकाशकों के समक्ष मौजूद चुनौतियों पर विशेष ध्यान देता है।

इस सवाल पर कि हिंदी लेखकों के लिए अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंच क्या आज भी एक चुनौती है, जेएलएफ उप निदेशक का कहना था, ‘‘हाल के अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों और रुझानों, तथा डेज़ी रॉकवेल जैसे अनुवादकों के योगदान, विशेषकर गीतांजलि श्री की ‘टॉम्ब ऑफ़ सैंड’ सहित अन्य कृतियों ने हिंदी साहित्य के लिए अंतरराष्ट्रीय बाज़ार और मंचों के द्वार खोले हैं। इसके साथ ही, कई युवा और प्रतिभाशाली अनुवादक भी उभर रहे हैं, जिन्हें हम अपने मंच पर प्रस्तुत और प्रोत्साहित करते हैं।’’

जेएलएफ में कश्मीरी, डोगरी, असमिया, राजस्थानी जैसी क्षेत्रीय भाषाओं को मंच देने के साथ भाषाई समावेशन पर अपनी दृष्टि को साझा करते हुए नमिता गोखले ने कहा,‘‘यह हमारे लिए सांस्कृतिक और राष्ट्रीय गौरव का विषय है कि उपमहाद्वीप और दक्षिण एशिया के विभिन्न हिस्सों की शास्त्रीय और समकालीन साहित्यिक परंपराएं अपनी विशिष्ट पहचान को बनाए रखते हुए आपसी सांस्कृतिक संवाद करें। हमारी थीम और दृष्टिकोण ‘अनेक भाषाएं, एक साहित्य’ की भावना को दर्शाते हैं, जहां परंपरा और परिवर्तन दोनों का समावेश है।’’

भारत में अब भी अंग्रेज़ी को साहित्यिक प्रतिष्ठा का प्रतीक माने जाने की मानसिकता पर उनका कहना था कि अंग्रेज़ी को बहुभाषी संदर्भ में अब अंतरराष्ट्रीय संवाद के एक उपयोगी माध्यम के रूप में देखा जा रहा है। उनका कहना था कि इस अर्थ में अंग्रेज़ी भी वास्तव में एक भारतीय भाषा है, जो देश की भाषाई संस्कृति में समाहित हो चुकी है।

देशभर में भाषाई समावेशन को बढ़ावा देने में जेएलएफ के योगदान पर उन्होंने बताया कि पिछले उन्नीस वर्षों में भारत की सभी 22 अनुसूचित भाषाएं, साथ ही उनकी अनेक बोलियां और रूपांतर, हमारे उत्सव का हिस्सा रही हैं।

उन्होंने बताया, ‘‘इस वर्ष फेस्टिवल में 22 से अधिक भारतीय और अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में सत्र आयोजित किए जा रहे हैं, जिनमें संस्कृत भी शामिल है और जिन पर प्रतिष्ठित विद्वान राधावल्लभ त्रिपाठी श्रोताओं को संबोधित करने वाले हैं। इसके अतिरिक्त, अंतरराष्ट्रीय भाषाओं की भी व्यापक भागीदारी देखने को मिलती है।

अनुवाद को केवल भाषाई अभ्यास नहीं बल्कि सांस्कृतिक आदान-प्रदान का माध्यम बताते हुए नमिता गोखले ने बताया कि जेएलएफ में दुनिया भर से आए प्रतिष्ठित अनुवादकों और अंतरराष्ट्रीय अनुवाद कृतियों को मंच प्रदान किया जा रहा है।

इस वर्ष अनुवाद और द्विभाषी लेखन के क्षेत्र में प्रमुख स्वर के रूप में अनामिका, बानू मुश्ताक, गोपालकृष्ण गांधी, के. आर. मीरा, अनुराधा रॉय, डेज़ी रॉकवेल, दीपा भस्थी और वोल्गा शामिल हैं।

युवा पाठकों को भाषाई विविधता की ओर आकर्षित करने में जेएलएफ की भूमिका पर नमिता गोखले ने बताया कि यह उत्सव की एक बड़ी उपलब्धि है कि युवा पीढ़ी अपनी मातृ भाषाओं और अन्य भारतीय भाषाओं से दोबारा जुड़ रही है। भाषाओं से यह जुड़ाव एक उत्साहजनक और आशाजनक प्रवृत्ति को दर्शाता है।

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