भारत-ईयू एफटीए अमेरिका के लिए रणनीतिक संकेत, लेकिन लाभ दक्षता पर निर्भर: अभिजीत बनर्जी
Focus News 29 January 2026 0
कोलकाता, 29 जनवरी (भाषा) नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अभिजीत बनर्जी ने कहा है कि भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौता (एफटीए) एक “रणनीतिक दिशा निर्धारण (एलाइनमेंट)” है और यह वाशिंगटन को यह संदेश देता है कि डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन द्वारा लगाए गए उच्च शुल्कों के परिप्रेक्ष्य में “अमेरिका जितना समझता है, भारत को उसकी उतनी जरूरत नहीं है।’’
हालांकि, उन्होंने आगाह किया कि ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ कहे जा रहे इस समझौते से तब तक व्यापक लाभ नहीं होंगे, जब तक भारत अपनी दक्षता और लॉजिस्टिक्स क्षमता में उल्लेखनीय सुधार नहीं करता।
बनर्जी ने ‘‘पीटीआई-भाषा’’ को दिए एक साक्षात्कार में कहा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका के रुख को भारत अभी पूरी तरह समझ नहीं पाया है। उन्होंने कहा कि व्यापार तनाव के दौर में अमेरिका की ओर से संभावित समझौतों के दावों के बावजूद भारत के साथ बातचीत में उसकी रुचि सीमित रही।
उन्होंने कहा, “यह निश्चित रूप से एक रणनीतिक दिशा निर्धारण है। यह यूरोप और भारत की ओर से अमेरिका को संकेत देता है कि हमें अमेरिका की उतनी जरूरत नहीं है, जितना वह समझता है। यदि उद्देश्य अमेरिका को बातचीत की मेज पर लाना है, तो यह उपयोगी हो सकता है।” हालांकि, उन्होंने इस बात को लेकर संदेह भी जताया कि इससे वास्तव में कितना दबाव बनेगा।
हाल में संपन्न भारत-ईयू एफटीए के तहत करीब दो अरब लोगों का साझा बाजार बनेगा। इस पर टिप्पणी करते हुए बनर्जी ने कहा कि व्यापार समझौते केवल शुरुआत होते हैं।
उन्होंने कहा, “व्यापार समझौते महज एक प्रारंभिक कदम हैं। अंततः आपके पास बेचने के लिए उत्पाद होने चाहिए और बाजार में उनकी मांग भी होनी चाहिए।”
उन्होंने जोर दिया कि आज प्रतिस्पर्धा केवल शुल्क तक सीमित नहीं है।
अधिकारियों के अनुसार, यह समझौता वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद के लगभग एक-चौथाई हिस्से को कवर करेगा। इसके तहत भारत के 99 प्रतिशत निर्यात पर यूरोपीय संघ में शुल्क कम होगा, जबकि यूरोपीय संघ के 97 प्रतिशत से अधिक निर्यात पर भारत में शुल्क में कटौती की जाएगी।
इस एफटीए से भारत के वस्त्र, परिधान, चमड़ा, हस्तशिल्प, जूते और समुद्री उत्पाद जैसे क्षेत्रों को लाभ मिलने की संभावना है, जबकि यूरोप को वाइन, ऑटोमोबाइल, रसायन और फार्मास्यूटिकल्स जैसे क्षेत्रों में फायदा होने की उम्मीद है।
बनर्जी ने कहा कि भारत वस्त्र, चमड़ा और आभूषण जैसे क्षेत्रों पर जोर दे रहा है, हालांकि इन क्षेत्रों में परिणाम अलग-अलग हो सकते हैं। उन्होंने कहा, “आभूषण और चमड़े में हम निश्चित रूप से प्रतिस्पर्धी हैं, जबकि वस्त्रों में यह इस बात पर निर्भर करता है कि किस तरह के वस्त्र हैं।”
उन्होंने यह भी कहा कि वियतनाम और बांग्लादेश जैसे देश भी प्रतिस्पर्धी हैं और कुछ मामलों में भारत से आगे हैं।
उन्होंने कहा कि असली बाधा आपूर्ति श्रृंखला की दक्षता और डिलीवरी की गति है। बनर्जी ने कहा, “जब मैं अमेरिका के खुदरा विक्रेताओं से बात करता हूं, तो वे कहते हैं कि भारतीय धीमे हैं। हमारी परिवहन व्यवस्था दक्ष नहीं है, बंदरगाहों पर देरी होती है—ये सभी बातें मायने रखती हैं।”
अभिजीत बनर्जी यहां ‘एक्साइड कोलकाता लिटरेरी मीट’ में अपनी पुस्तक ‘पुअर इकोनॉमिक्स’ पर चर्चा के लिए आए थे।
