नेपाल में अपने विरोध प्रदर्शन के बाद बनी सरकार से खफा जेन जेड आंदोलनकारी
Focus News 7 January 2026 0
काठमांडू, सात जनवरी (एपी) मुकेश आवस्ती सितंबर में ऑस्ट्रेलिया जाकर सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई शुरू करने वाले थे, लेकिन इसके बजाय वह नेपाल में भ्रष्टाचार के खिलाफ युवाओं के विद्रोह में शामिल हो गए। इस दौरान सुरक्षा बलों की गोली लगने से उन्होंने एक टांग खो दी।
राजधानी काठमांडू के नेशनल ट्रॉमा सेंटर में 22 वर्षीय आवस्ती की टांग काटनी पड़ी थी। वह कहते हैं कि इतने लोगों के बलिदान के बाद जो थोड़ा-बहुत हासिल हुआ है, उसके लिए उन्होंने बहुत कुछ गंवा दिया और उन्हें इसका अफसोस है।
काठमांडू में आठ सितंबर से शुरू हुए हिंसक प्रदर्शनों में 76 लोगों की मौत हो गई और 2,300 से ज्यादा लोग घायल हुए।
‘जेन जेड’ कार्यकर्ताओं के नेतृत्व में हुए इन विरोध प्रदर्शनों के दबाव के चलते 12 सितंबर को उच्चतम न्यायालय की सेवानिवृत्त न्यायाधीश सुशीला कार्की को नेपाल की पहली महिला प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया। इसके बाद कार्की ने मार्च में नए चुनाव कराने का वादा किया।
‘जेन जेड’ उस पीढ़ी को कहा जाता है जो 1997 से 2012 के बीच पैदा हुई है। यह वह युवा वर्ग है जो तकनीक, इंटरनेट और सोशल मीडिया के साथ बड़ा हुआ है। इन्हें डिजिटल नेटिव्स भी कहा जाता है क्योंकि इनका जीवन स्मार्टफोन, इंटरनेट और सोशल मीडिया से जुड़ा माना गया है।
देश में बड़े बदलाव की उम्मीद में विरोध प्रदर्शनों में शामिल होने वाले लोग अब अंतरिम सरकार और उसके नेतृत्व की आलोचना कर रहे हैं।
आवस्ती कहते हैं, “मुझे विरोध प्रदर्शन में शामिल होने का फैसला अब गलत लग रहा है, क्योंकि हमने जो नयी सरकार बनवाई, उससे अब तक कुछ भी हासिल नहीं हुआ। भ्रष्टाचार खत्म होना चाहिए था, जो नहीं हुआ। जिन्होंने प्रदर्शनकारियों पर गोलियां चलाईं, उन्हें गिरफ्तार किया जाना चाहिए था, लेकिन वह भी नहीं हुआ।”
उन्होंने कहा कि अब तक सरकार की भ्रष्टाचार-रोधी एजेंसी ने सिर्फ एक बड़ा मामला दर्ज किया है, जिसमें प्रमुख राजनीतिक हस्तियों के नाम ही नहीं हैं।
आवस्ती ने कहा कि जिन नेताओं पर प्रदर्शनकारियों ने भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे, वे आने वाले चुनावों की तैयारी कर रहे हैं।
सितंबर में विद्रोह के समय सत्ता में रहे नेताओं के खिलाफ भी कोई मामला दर्ज नहीं हुआ है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि नयी सरकार ने वादे पूरे नहीं किए।
हाल के हफ्तों में दर्जनों प्रदर्शनकारी उसी सरकार के खिलाफ फिर सड़कों पर उतरे हैं, जो उनके विरोध प्रदर्शन के बाद बनी थी। प्रधानमंत्री कार्यालय के बाहर हुए इन प्रदर्शनों के दौरान कुछ प्रदर्शनकारियों को पुलिस ने तितर-बितर कर दिया।
दाईं टांग टूटी होने के कारण बैसाखी के सहारे चल रहे सुमन बोहरा कहते हैं, “हम फिर सड़कों पर इसलिए उतरे हैं क्योंकि सरकार अपने वादे पूरे करने में नाकाम रही है। जिन परिवारों ने अपने प्रियजन को खोया, जो घायल हुए, सरकार ने उनके लिए क्या किया? कुछ भी नहीं। हम मजबूरी में यहां आए हैं।”
व्यापक भ्रष्टाचार, अवसरों की कमी, बेरोजगारी और कुशासन के खिलाफ आठ सितंबर को हजारों युवा प्रदर्शनकारी काठमांडू में जुटे थे। सोशल मीडिया पर प्रतिबंध से भड़के इन प्रदर्शनों में लोगों ने पुलिस अवरोधक फांदकर संसद में घुसने की कोशिश की, लेकिन सुरक्षा बलों ने गोलियां चला दीं।
अगले दिन देशभर में आक्रोश फैल गया। गुस्साई भीड़ ने प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के कार्यालय, पुलिस थानों और शीर्ष नेताओं के घरों में आग लगा दी। कई नेताओं को जान बचाकर सेना के हेलीकॉप्टरों से भागना पड़ा। हालात संभालने के लिए सेना को तैनात किया गया और बातचीत के बाद कार्की की नियुक्ति हुई, जिनकी प्रमुख जिम्मेदारी संसदीय चुनाव कराना तय की गई।
सरकार का कहना है कि वह इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध है।
प्रधानमंत्री कार्की ने कहा है, “दुनिया पांच मार्च को होने वाली चुनाव प्रक्रिया पर नजर रखे हुए है। मैं भरोसा दिलाती हूं कि हम ये चुनाव कराएंगे। हमारी तैयारियां लगभग पूरी हैं और सुरक्षा व्यवस्था भी काफी बेहतर हो चुकी है।”
वहीं जेन जेड समूहों में स्पष्टता की कमी भी बताई जा रही है।
युवा प्रदर्शनकारियों के अलग-अलग समूहों से अलग-अलग मांगें सामने आई हैं। इन मांगों में प्रधानमंत्री का प्रत्यक्ष चुनाव, मौजूदा संविधान को खत्म करना, और सभी पुराने नेताओं को जेल भेजना शामिल है। प्रदर्शनकारियों का न तो कोई एक नेता है और न ही कोई एक संगठन। कई लोग खुद को ‘जेन जेड’ आंदोलन के अगुवा बताते हैं।
विश्लेषकों के मुताबिक, सितंबर के बाद से प्रदर्शनकारियों की मांगों में स्पष्टता की कमी नेपाल में एक बड़ी समस्या बन गई है।
काठमांडू के पॉलीगॉन पत्रकारिता एवं जनसंचार महाविद्यालय के प्राचार्य अबीरल थापा कहते हैं, “नेपाल में मौजूदा भ्रम की वजह यही है कि जेन जेड समूहों को खुद स्पष्ट नहीं है कि वे क्या चाहते हैं।”
कुछ लोग मार्च में होने वाले चुनावों का विरोध करने लगे हैं। लोगों का कहना है कि उनका आंदोलन सिर्फ नयी संसद के चुनाव के लिए नहीं था, बल्कि भ्रष्टाचार खत्म करने और भ्रष्ट नेताओं को तुरंत गिरफ्तार करने के लिए था।
वहीं, दूसरे समूह चाहते हैं कि चुनाव हों ताकि नए जनप्रतिनिधि आकर ये काम करें।
यह भी साफ नहीं है कि अंतरिम सरकार कितनी शक्तिशाली है। अंतरिम सरकार के गठन के समय राष्ट्रपति ने कहा था कि उसका मुख्य उद्देश्य संसद के चुनाव कराना है।
थापा बताते हैं कि नेपाल के संविधान में अंतरिम सरकार बनाने का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है। संविधान में एक पंक्ति है—“राष्ट्रपति का मुख्य कर्तव्य संविधान का पालन करना और उसकी रक्षा करना है।”
थापा कहते हैं, “प्रदर्शन शुरुआत से ही बहुत योजनाबद्ध नहीं थे। वे भ्रष्टाचार खत्म करने और सोशल मीडिया पर लगे प्रतिबंध हटाने की मांग से शुरू हुए थे। ऐसा लगा कि जैसे लोग हिरन का शिकार करने गए हों और बाघ मार बैठे हों। सरकार गिर गई और आंदोलन की दिशा भी बदल गई।”
थापा के मुताबिक, मार्च में चुनाव हो पाएंगे या नहीं इसको लेकर अब भी संदेह है, लेकिन चुनाव के अलावा कोई और विकल्प भी नहीं है।
