GDP बनाम NDP बनाम GNH: विकास को मापने का सही पैमाना कौन-सा?

xcdfrewdsx

किसी भी देश की प्रगति, नीति- निर्माण और भविष्य की दिशा तय करने के लिए यह अत्यंत आवश्यक होता है कि विकास को मापने के लिए सही संकेतकों का चयन किया जाए। आर्थिक इतिहास में लंबे समय तक जीडीपी को विकास का सबसे प्रमुख और लगभग सर्वमान्य पैमाना माना गया। सरकारें, अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ और निवेशक सभी जीडीपी के आँकड़ों के आधार पर किसी देश की आर्थिक स्थिति का मूल्यांकन करते रहे हैं। लेकिन समय के साथ-साथ यह प्रश्न गहराता गया कि क्या केवल उत्पादन, आय और बाजार गतिविधियाँ ही विकास का वास्तविक माप हो सकती हैं? क्या बढ़ती अर्थव्यवस्था अपने-आप नागरिकों के जीवन को बेहतर, सुखी और सुरक्षित बना देती है? इन्हीं प्रश्नों के उत्तर खोजने की प्रक्रिया में एनडीपी मतलब नेट घरेलू उत्पाद और आगे चलकर जीएनएच सकल राष्ट्रीय खुशी जैसे वैकल्पिक और अधिक व्यापक संकेतक सामने आए। यह लेख जीडीपी, एनडीपी और जीएनएच तीनों की अवधारणा, उनकी उपयोगिता, सीमाओं और परस्पर तुलना को सरल रूप से प्रस्तुत करता है तथा ढूंढता है कि कि आज के समय में विकास को मापने का सबसे उपयुक्त दृष्टिकोण क्या होना चाहिए। जीडीपी की बात करें तो विकास मापने का यह पश्चिम द्वारा विकसित पारंपरिक पैमाना है. यह किसी देश की भौगोलिक सीमाओं के भीतर एक निश्चित अवधि, सामान्यतः एक वर्ष में, उत्पादित सभी अंतिम वस्तुओं और सेवाओं के कुल मौद्रिक मूल्य को दर्शाता है। यह कृषि, उद्योग और सेवा तीनों क्षेत्रों की आर्थिक गतिविधियों को एक संख्या में समेट देता है। इसे विकास का पैमाना इसलिए माना गया क्योंकि यह आर्थिक गतिविधि और उत्पादन क्षमता का एक स्पष्ट संकेत देता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगभग सभी देशों द्वारा इसे अपनाए जाने के कारण देशों के बीच तुलना भी आसान हो जाती है। निवेशक यह समझ पाते हैं कि कौन-सी अर्थव्यवस्था तेज़ी से बढ़ रही है, सरकारें कर-संग्रह और रोजगार सृजन का अनुमान लगा पाती हैं और नीति-निर्माताओं को विकास दर का एक त्वरित संकेत मिल जाता है। लेकिन जीडीपी की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि यह मात्रा को महत्व देता है, गुणवत्ता को नहीं। यह यह नहीं बताता कि आय का वितरण समाज में कितना समान या असमान है। यदि जीडीपी बढ़ रहा है, तो भी हो सकता है कि उसका लाभ केवल सीमित वर्ग तक सिमट जाए। पर्यावरणीय क्षति, प्रदूषण, वनों की कटाई और प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन को जीडीपी विकास मान लेता है। शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा, मानसिक संतोष और जीवन-स्तर की गुणवत्ता जैसे मानवीय पहलुओं को यह नज़रअंदाज़ करता है। वास्तव में जीडीपी यह तो बताता है कि “कितना उत्पादन हुआ” पर यह नहीं बताता कि उस उत्पादन से लोगों का जीवन कितना बेहतर, सुरक्षित और सुखद हुआ। इसके अलावा, विध्वंस और विकास दोनों प्रकार की गतिविधियाँ जीडीपी की गणना में शामिल हो जाती हैं। किसी प्राकृतिक आपदा के बाद पुनर्निर्माण से भी जीडीपी बढ़ सकता है, जबकि वास्तविकता में समाज को भारी नुकसान हुआ होता है। इस दृष्टि से जीडीपी सस्टेनेबिलिटी आधारित अर्थव्यवस्था के लिए एक अपूर्ण माप है। वहीँ एनडीपी नेट घरेलु उत्पाद जीडीपी का अधिक यथार्थवादी रूप है. नेट घरेलू उत्पाद, जीडीपी की कुछ प्रमुख सीमाओं को सुधारने का प्रयास करता है, जैसे कि एनडीपी की गणना में जीडीपी से मूल्यह्रास घटा दिया जाता है। मूल्यह्रास मतलब मशीनों, भवनों, कारखानों, संसाधनों और अन्य पूंजीगत संपत्तियों की समय के साथ होने वाली टूट-फूट और क्षरण। इस दृष्टि से एनडीपी यह दर्शाता है कि उत्पादन प्रक्रिया में लगी पूंजी को बनाए रखने के बाद देश ने वास्तव में कितना नया मूल्य सृजित किया। इसलिए इसे जीडीपी की तुलना में अधिक यथार्थवादी माना जाता है। यह दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता का बेहतर संकेत देता है और यह नीति-निर्माताओं को यह समझने में मदद करता है कि विकास टिकाऊ है या केवल संसाधनों के क्षरण पर आधारित है। हालाँकि, एनडीपी भी विकास की संपूर्ण तस्वीर प्रस्तुत नहीं करता। यह भी मानव कल्याण, सामाजिक संतुष्टि और खुशहाली को सीधे मापने में असमर्थ है।पर्यावरणीय संतुलन, सामाजिक न्याय और जीवन की गुणवत्ता जैसे तत्व इसमें शामिल नहीं होते। इस प्रकार, एनडीपी आर्थिक दृष्टि से जीडीपी से बेहतर अवश्य है, लेकिन यह भी विकास के मानवीय और नैतिक पक्ष को पूरी तरह नहीं समेट पाता। यह बताता है कि अर्थव्यवस्था कितनी स्वस्थ है, पर यह नहीं बताता कि आम नागरिक का जीवन अनुभव कैसा है। अब आते हैं जीएनएच पर विकास के मानवीय और सनातन दृष्टिकोण का. जीएनएच मतलब सकल राष्ट्रीय खुशी । जीएनएच की अवधारणा विकास को केवल धन, उत्पादन और उपभोग से नहीं जोड़ती, बल्कि इसे मानव सुख-समृद्धि और उसकी सततता से मापती है। यह मानती है कि अर्थव्यवस्था का अंतिम उद्देश्य केवल वस्तुओं का उत्पादन नहीं, बल्कि मनुष्य को सुखी, संतुलित और सम्मानजनक जीवन प्रदान करना है। जीएनएच के अनुसार खुशहाली का आधार सुख है, और सुख ही विकास का अंतिम लक्ष्य होना चाहिए। इसके प्रमुख घटक मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य, शिक्षा की गुणवत्ता और समान अवसर, पर्यावरणीय संतुलन और प्रकृति के साथ सामंजस्य, सुशासन, पारदर्शिता और सामाजिक विश्वास, कार्य-जीवन संतुलन और सामुदायिक संबंध, सांस्कृतिक मूल्य और सामाजिक समरसता है. जीएनएच का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह विकास को मानव-केंद्रित बनाता है। यह नीति-निर्माताओं को याद दिलाता है कि आर्थिक वृद्धि साध्य नहीं, बल्कि साधन है। हालाँकि, जीएनएच की भी अपनी चुनौतियाँ हैं। जैसे खुशी और संतोष को मापना स्वभावतः कठिन है। यह अधिकतर गुणात्मक आकलन पर आधारित होता है। वैश्विक स्तर पर इसके व्यापक रूप से न अपनाए जाने के कारण अंतरराष्ट्रीय तुलना जटिल हो जाती है। त्वरित नीतिगत निर्णयों में इसे सीधे लागू करना आसान नहीं है। इसके बावजूद, आधुनिक समय में जब मानसिक तनाव, सामाजिक विघटन और पर्यावरण संकट बढ़ रहे हैं, जीएनएच का दृष्टिकोण अत्यंत प्रासंगिक हो जाता है। अब आते हैं कौन-सा पैमाना बेहतर है? इस प्रश्न का उत्तर एक शब्द या एक संकेतक में नहीं दिया जा सकता। जीडीपी आवश्यक है एक आंकड़े के रूप में क्योंकि बिना आंकड़े के कोई भी देश शिक्षा, स्वास्थ्य या सामाजिक सुरक्षा में निवेश नहीं कर सकता लेकिन इसे विकास का अंतिम पैमाना नहीं माना जा सकता क्योंकि यह विनाशकारी गतिविधियों को भी विकास की गणना में शामिल कर लेता है। एनडीपी अधिक व्यावहारिक और यथार्थवादी है, क्योंकि यह वास्तविक आर्थिक स्थिति और पूंजी क्षरण को दर्शाता है लेकिन यह भी सुख को विकास का आधार नहीं बनाता। अंत में जीएनएच यह स्पष्ट करता है कि आर्थिक प्रगति का अंतिम उद्देश्य क्या होना चाहिए मानव सुख, संतोष और सम्मानजनक जीवन। मेरे मत में जीडीपी और एनडीपी विकास के साधन हैं जबकि जीएनएच विकास का उद्देश्य है। नीति-निर्माण का अंतिम लक्ष्य जीएनएच होना चाहिए। इसके लिए खुशी और जीवन-गुणवत्ता को मापने की वैज्ञानिक और व्यावहारिक विधियों का विकास आवश्यक है। सच्चा विकास वही है जहाँ अर्थव्यवस्था बढ़े, पर्यावरण सुरक्षित रहे और नागरिक मानसिक, सामाजिक और नैतिक रूप से खुश व संतुष्ट हों और यही सनातन अर्थशास्त्र का भी मूल लक्ष्य है। पंकज जायसवाल